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शिव बाड़ी प्राईमरी स्कूल
जैसा कि मैंने शुरू में कहा कि पहला शिक्षक मां होती है। हमने भी हिन्दी अपनी मम्मी से सीखी और आज आलम यह है कि हम भाई-बहन उनसे कहते हैं कि मम्मी आपने ही हमें हिन्दी सिखाई और अब आप ग़लत हिन्दी बोलती हैं। वे कहा करती हैं मुझसे सीख कर मेरी ही ग़लतियां निकालते हो। |
मैं अपनी ठीक-ठाक हिन्दी के लिए माँ के साथ-साथ अपने अलीपुद्वार जंशन स्थित प्राईमरी स्कूल के उन अध्यापकों का भी शुक्रिया अदा करना चाहूंगी जिनसे हम भाई-बहन चौथी क्लास तक पढे। उनके साथ आत्मीयता का आलम यह था कि 1975-76 में उस स्कूल से निकल जाने के बाद 1989 में नियु्क्ति पाकर कलकत्ते आने तक नियमित संपर्क बना रहा। वसंत पंचमी के दिन उस स्कूल में सरस्वती पूजा होती थी। उस दिन पूजा भ्रमण के बाद घर लौटते वक्त उनका संयुक्त परिवार हमारे घर होकर जाता क्योंकि साल में एक बार ही सारे सदस्य एक साथ स्कूल के आयोजन में शिरकत करने आते और लौटते वक्त हमारे घर हमसे मिलकर जाते, भले ही रात के नौ या साढ़े नौ क्यों न बज रहे हों।
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| शिव बाड़ी (शिव मंदिर) |
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मंदिर से सटा बरगद का पेड़। हमने इसके पके गूलर खूब खाए हैं और
जड़ें किताबों में सहेज कर रखी जाती थीं ताकि विद्या बढ़े। |
स्कूल के साथ ही शिव मंदिर है, जिसे शिव बाड़ी कहा जाता है। बचपन में हम मम्मी की उंगली थामे उस मंदिर में जाया करते थे। आस-पास की रेलवे कॉलोनी की महिलाएं मेरी मम्मी को शिव बाड़ी जाने वाली पंजाबी महिला के तौर पर ही जानती थीं। शहर में पंजावी परिवारों की संख्या बहुत कम थी। जब हम बड़े हो गए यानी ग्रेजुएट होने के बाद भी वे लोग हमें कहा करते थे कि याद है मम्मी की उंगली थाम तुम भाई–बहन मंदिर जाया करते थे। उसी दौरान मैंने भगवान से उसी मंदिर में फ़रियाद की थी कि मुझे भी दीदी कहने वाला कोई छोटा सा भाई या बहन दे दो, मैं दस पैसे और केला चढ़ाऊंगी(तब अपनी पॉकेट मनी इतने की ही इजाज़त देती थी न)। भगवान ने भाई दिया भी और फिर मैंने मंदिर में वो चीज़ें भगवान को अर्पित भी की । बड़ा होकर भाई कहा करता कि भगवान भी कैसा है दस पैसे में तुम्हारी बात मान ली, बड़ा लोभी है भगवान, इतनी सी रिश्वत में मान गया। अभी अगस्त 2010 में बंगाल के अपने जन्म स्थल या गृहनगर अलीपुर द्वार जंशन गई थी लगभग सोलह सालों बाद। उन अध्यापकों के घर जाने का पर्याप्त समय नहीं था लेकिन मैं अपने उस स्कूल भवन के पास से गुज़र कर बचपन की यादें ताज़ा करके आई। उस शिव बाड़ी में मत्था भी टेका और मज़े की बात यह रही कि पुजारी जी (भजु राम) के दर्शन भी हो गए। वे मुझे नहीं पहचान पाएंगे यही सोचकर मैंने उन्हें बताया कि अमुक जगह हमारा घर था, मम्मी के साथ हम मंदिर आया करते थे और आप भी हमारे घर आते थे। उन्होंने पूर्ववत् पीतल का बड़ा सा वही त्रिशूल सर से स्पर्श कर आशीष दी।
अलीपुरद्वार जंशन में कल्याण भईया के घर पर ठहरी थी। मैंने उनसे कहा था कि इतने सालों बाद आई हूँ, समय ज्यादा नहीं है, इसलिए किसी के घर नहीं जा पाऊंगी आप मुझे बाईक पर बस शहर की सड़कों पर घुमा दें और सारे पुराने इलाके, कॉलोनियां फिर से दिखा दें, जहां मैं परिचितों के घरों में आया करती थी ताकि मैं बचपन की यादों की उन गलियों का भ्रमण कर लूं। जब मैंने स्कूल भवन और शिव बाड़ी की तस्वीर ली तो मैंने कल्याण दा से कहा, आप सोच रहे होंगे न कि क्या पागलपन कर रही है यह लड़की। उन्होंने कहा - मुझे पता है, तुम कुछ न कुछ लिखोगी। इसीलिए यह सब कर रही हो।
कल्याण भईया की कमर्शियल में मैं उनसे इंगलिश शॉर्ट हैंड सीखा करती थी। वे 100 की स्पीड में डिक्टेशन देते और कहते 60 की स्पीड में था। 120 की स्पीड में देकर कहते 80 की स्पीड में था। 120 से ऊपर देकर कहते यह मात्र 100 की स्पीड थी। मेरे साथ वाली स्टुडेंटस कहा करतीं, जानती हो, यह सौ और एक सौ बीस की स्पीड में था। मैं चूंकि आसानी से लिख लिया करती थी इसलिए मुझे यकीन ही नहीं होता था कि यह इतनी हाई स्पीड में था और बाकियों के कई शब्द छूट जाया करते थे। मुझे लगता कि जब हाथ में कोई दर्द नहीं हुआ, और मैंने आसानी से लिख लिया तो स्पीड 60 से ऊपर क़तई हो ही नहीं सकती। अब अपनी उस कला के पीछे छूट जाने का दु:ख तो बहुत होता है। मेरे साथ जो लोग प्रैक्टिस किया करते थे उनमें से किसी का भी मेरी तरह चयन नहीं हो पाया था। यह अलग बात है कि अब स्टेनोग्राफी काफी पीछे छूट गई है। मुझे याद है कि जब उस शहर में एक मात्र मैंने परीक्षा में क्वालीफाई किया था तो शहर में सबको पता चला गया था। छोटे शहरों में रहने के यही फायदे हैं। फाईनल स्टेनोग्राफी टेस्ट से चार दिन पहले कॉल लेटर मिला था और कल्याण दा मुझे शाम को स्पेशल प्रैक्टिस करवाते थे। एक दिन लिखते-लिखते मेरा हाथ जवाब दे गया, मैंने कहा - आमी पारबो न (मुझसे नहीं होगा)। भईया ने कहा, तुम किए कराए पर पानी फेर रही हो, तुमसे किसने कहा कि तुमसे नहीं होगा। मैंने उन्हें बता दिया कि सीनियर्स में से अमुक ने अमुक से कहा है कि यह तो फट से नर्वस हो जाती है, बेकार ही इस पर इतनी मेहनत की जा रही है, इसके बस का नहीं है, इससे नहीं होने वाला। भईया ने मुझे डांट लगाई - तुम दूसरों की बातों पर ध्यान देती हो, किसने क्या कहा। और जब मेरा चयन हो गया तो उन्होंने मुझे कहा कि तुमने मेरी मेहनत और विश्वास की लाज रखी और मुझे खुशी है कि तुम्हें उन सीनियर्स से पहले नौकरी मिली, सबका मुंह बंद कर दिया। मज़े की बात यह है कि मुझे शहर से इतनी दूर महानगर में नियुक्ति मिली अपनी काबलियत के बल पर और उस सीनियर लड़के को उसके पिता ने उन दिनों बीस हजार रुपए देकर रेलवे में नौकरी दिलवाई उसी शहर में। ऑफिस में ज्वॉयन करने के बाद पता चला कि मैंने पूरे ईस्टर्न जोन में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। ख़ैर अगर उसी शहर में रह जाती तो संभवत: नीलम शर्मा ही रह जाती, अंशु न बन पाती। मैं भी वहीं क्लास लिया करती थी। स्टुडेंट्स मुझसे पूछा करतीं, दीदी कुछ टिप्स दो न, आप कैसे प्रैक्टिस करती हैं। जवाब में कल्याण भईया कहा करते, इसके घर जाकर देखो, इसका एक हाथ दाल के पतीले में कड़छी घुमा रहा होता है और दूसरे में शॉर्टहैंड की बुक। उन दिनों मेरी मां काफ़ी बीमार रहा करती थीं और एक साल के बेड रेस्ट पर थीं। घर के सारे काम मैं ही करती। कल्याण दा कभी-कभी मम्मी का हाल-चाल पूछने आते तो मैं उनसे कहा करती, जाते-जाते आप मुझे दो-चार डिक्टेशन क्यों नहीं दे जाते। इसके बाद से वे घर में आते ही कहते, नोट बुक तैयार रखो। कल्याण भईया मेरे सामने कभी नहीं कहते थे कि तुम बहुत अच्छी प्रैक्टिस करती हो। हाँ कलकते में नियुक्ति के बाद अपने स्थानीय रिश्तेदारों के बच्चों से ज़रूर कहा करते कि इससे स्टेनोग्राफी सीखो यह बहुत एक्सपर्ट है। कल्याण भईया के साथ स्टुडेंट के तौर पर बना रिश्ता बाद में उनके परिवार का अंग बन गया छोटी बहन के रूप में। आज शिक्षक दिवस के अवसर पर उन्हें भी नमन !
भाग्यशाली हूं कि बहुत अच्छी स्टुडेंट तो नहीं थी, लेकिन प्राईमरी, मिशन हाई स्कूल और फिर पंजाब के कॉलेज में अध्यापकों, प्रोफेसरों की नज़र में अलग पहचान अवश्य बनी रही।
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अलीपुर द्वार जंशन के निर्मला गर्लस् हाई स्कूल में पांचवी से आठवीं तक पढ़ाई की। वहां भी हिन्दी की अध्यापिका सिस्टर टेरेसा और इंगलिश टीचर हीरामनी टोप्पो बहुत चाहती थीं मुझे। जब मैं आठवीं के बाद पंजाब चली गई और वहां से सिस्टर टेरेसा को ख़त लिखती तो वे मेरे ख़त पूरी क्लास को पढ़ सुनाया करती कि देखो, नीलम की चिट्ठी आई है। टोप्पो टीचर का तरीका यह था कि क्लास में अगर कोई एक बच्चा किसी शब्द का उच्चारण ग़लत करता तो पूरी क्लास को वह शब्द एक हजार बार कॉपी पर लिखने की सज़ा मिलती। एक बार पूरी क्लास को सिंगुलर और प्लूरल शब्द एक-एक हज़ार बार लिखने की सज़ा दी गई। घर पर मैं लिख रही थी कि डैडी ने पूछा क्या लिख रही हो। वास्तविकता पता चलने पर उन्होंने लिखने से मना किया। पिता से तो हम भाई-बहन बहुत डरते थे। डर कर मैंने वह काम पूरा नहीं किया। सज़ा का वह काम पूरा न होने के कारण टोप्पो टीचर ने अगले दिन स्कूल की छुट्टी के बाद हॉस्टल के अपने कमरे में बिठाकर वह काम पूरा करवाया। बांग्ला के अध्यापकों में हुआ करते थे शांता टीचर और मदन मोहन डे सर, किंडो सर, तिवारी सर आदि। तो निर्मला गर्लस् के मेरे इन सभी अध्यापकों को भी मेरा नमन।
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एकदम बाएं सिस्टर लीना, एकदम दाएं सिस्टर तेरेसा,
जनवरी 2005 को मेरी ग्रेश की शादी के दिन ली गई तस्वीर। |
जाते-जाते एक बात और। मेरी दोस्त मेरी ग्रेस टोप्पो मेरी शॉर्टहैंड की स्टुडेंट हुआ करती थी वहीं अलीपुर द्वार जंशन में कल्याण भईया की कमर्शियल में लेकिन कालांतर में यह रिश्ता दोस्ती में बदल गया। विगत बाईस वर्षों से हम अच्छे दोस्त हैं। उसने मेरे नाम पर अपने बेटे का नाम अंशुमान रखा है।
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| दोस्त मेरी ग्रेस के साहबजादे अंशुमान टोप्पो मिंज (सिलीगुड़ी 16-08-2010) |
और अब बात करते हैं सितंबर की, जी हाँ सितंबर का महीना यानी हिंदी के नाम।
हिंदी के बारे में कहा जाता है कि इसकी देवनागरी लिपि इतनी वैज्ञानिक है कि जैसे उच्चरित होता है, वैसा ही लिखा जाता है। अंग्रेजी में ऐसा नहीं है, put होता है तो कभी but। हिंदी के साथ बहुत बड़ी सुबिधा यही है कि जैसा उच्चरित होता है वैसा लिखा जाता है। कुछ लोग लिखते वक्त तो शुद्ध हिन्दी लिखते हैं, लेकिन बोलते वक्त चलताऊ रूप में ही बोलते हैं।
मैं हिंदी को हिंदी की तरह ही बोलने की कोशिश करती हूँ। वैसे व्यक्ति जिस प्रदेश विशेष का होता है उसके हिन्दी संबंधी accent से ही उसके उस प्रदेश से संबंधित होने की पुष्टि हो जाती है, स्थानीय शब्द भी उसमें शामिल हो जाते हैं। जैसे बिहार, यू. पी., बंगाल, पंजाब, हरियाणा-हिमाचल और दिल्ली अंचल वालों की पहचान आसानी से हो जाती है।
मैं दावा नहीं करती कि मैं शु्द्ध हिन्दी बोलती हूँ, हाँ सही बोलने की कोशिश करती हूँ। मुझे आवश्यकता या प्रयोजन जैसे शब्दों के बदले ज़रूरत शब्द का प्रयोग करना अच्छा लगता है। (इसकी क्या आवश्यकता है/ कोई आवश्यकता नहीं)
यहां कोलकाता में जब किसी से नया परिचय होता है तो अक्सर लोग पूछ बैठते हैं कि आप बहुत अच्छी हिन्दी बोलती हैं, आप मूलत कहां की हैं? पलट कर मैं सवाल उछाल देती हूँ कि आप ही बताईए कहाँ की लगती हूँ? लोग बिहार, यू. पी. से आगे नहीं पहुंच पाते। बिहार, यू. पी वाले लोग हम का प्रयोग ज़्यादा करते हैं जैसे – हम गए थे, हम कहे, हम देखे आदि। ज़्यादातर लोग स और श का सही उच्चारण नहीं कर पाते। लिखेंगे भाषा और कहेंगे भासा, लिखेंगे शहर और कहेंगे सहर। (माफी चाहूंगी, लेकिन सच यही है)।
एक बार किसी सम्मेलन में एक राजभाषा अधिकारी ने जवाब में कहा था – हरियाणे की लगती हैं। मैंने कहा, आप बहुत क़रीब पहुंच कर रुक गए। मैं पंजाब से हूँ। उन्होंने कहा, पंजाब वाले इतनी अच्छी हिन्दी नहीं बोलते। वे तो पंजाबी टोन में बोलते हैं।
मुझे याद है, दो साल पहले अमृतसर गई हुई थी और पहली बार किसी से फोन पर बात हो रही थी, हिन्दी में (चूंकि दूसरी तरफ से हिन्दी में शुरूआत हुई थी)। उधर से अंत में कहा गया, यह हिन्दी तो यहां की नहीं लगती। मैंने भी हंस कर कहा, जी हाँ, बिलकुल यहां की नहीं लगती। आप बताईए कहां की हिन्दी लगती है? उन्होंने कहा – दिल्ली की। मैंने कहा – माफ कीजिएगा मैं दिल्ली वालों की तरह मेरे को, तेरे को नहीं कहती। उन्होंने कहा, तो कहाँ की हिन्दी है? मैंने कहा, यह किसी स्थान विशेष की न होकर हिन्दी वाली हिन्दी है। उन्होंने कहा अमृतसर से इतनी अच्छी हिन्दी सुनने को मिल रही है। मैंने कहा आपने बातचीत हिंदी में शुरू की, पंजाबी में करते तो पंजाबी में जवाब मिलता। उधर से कहा गया – एह होई न गल्ल।
मेरा भाई अक्सर फोन करते हुए दूसरों से कहता, परभात खबर से अमुक बोल रहा हूँ। मैं उसे कहा करती कि प्रभात क्यों नहीं कहते। तो वह कहता, अरे लोगों को पता चलना चाहिए न कि पंजाबी पुत्तर है।
एक बार पंजाब के अपने गाँव के पोस्ट मास्टर साहब को मुझे यह समझाने में आधा घंटा लगा कि प्रदीप और परदीप में क्या फर्क है। मैं जब उनसे कहूं कि आप Pradeep/प्रदीप लिखिए तो उन्होंने अंग्रेजी में pardeep लिख कर कहा कि प्रदीप ही तो लिखा है। मजबूरन मुझे उन्हें गुरुमुखी में Spelling लिख कर स्पष्ट करना पड़ा कि यह फ़र्क है।
आज शिक्षक दिवस के अवसर पर, जीवन के इस मोड़ पर आकर, हर उस व्यक्तित्व के प्रति आभारी हूँ, जिन्होंने किसी न किसी तरह से कोई न कोई सीख देने में अहम् भूमिका निभाई है।
साथ ही उन दोस्तों का भी आभार, जिन्होंने मुझे अंतरजाल की इस दुनिया से जोड़ा और आवश्यक मार्गदर्शन किया।
अब तक के इस जीवन में आए सभी शिक्षकों को शुभ कामनाएं।
प्रस्तुति - नीलम शर्मा 'अंशु'