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14 मार्च 2014

शुक्रिया मेरे शहर, तेरा बार - बार शुक्रिया।





सोचा था 21 को लिखूंगी, लेकिन हर तरफ होली की रंगीनी देख कर फिर सोचा कि लिख ही डाला जाए। 21 मार्च 1989 को होली से दो दिन पहले शुक्रवार की सुबह 6 बजे कामरूप एक्सप्रेस में अलीपुरद्वार जंशन से आकर कलकत्ते की सरज़मीं पर क़दम रखा था, भारत सरकार के नियुक्तिपत्र के साथ। शुक्रवार ज्वॉयन किया, शनि -रवि की छुट्टी थी। रविवार को संभवत: होली थी उस वर्ष।  25 वर्ष पूरे हो गए इस शहर में।  भारत सरकार ने तो नीलम शर्मा को कोलकाता में बुलाया लेकिन इसी कोलकाता ने नीलम शर्मा को नीलम शर्मा 'अंशु' बनाया। शुक्रिया मेरे शहर, तेरा सौ बार शुक्रिया।

12 मार्च 1989 का दिन – घर में गहमागहमी थी। लाउड स्पीकर पर बड़े भाई ने गीत लगा रखे थे। उनके मित्र नूपुर दा ने पूछा – नीलम बताओ न आज क्या है, कुछ तो है तुम लोग छुपा रहे हो। किस का जन्म दिन है? लाउड स्पीकर क्यों? मैंने कहा, बस ऐसे ही। फिर उन्होंने चंदन से पूछा, तुम्हारा जन्मदिन है क्या? चंदन भी बड़ी महारत से टाल गया। कहा, नहीं मुझे तो नहीं पता। मम्मी के मन मुताबिक सुबह ब्रह्म भोज हो चुका था। पंडित जी भोजन करके जा चुके थे। अब दोपहरी में हमारी मस्ती की बारी थी। अचानक पोस्ट मैन काकू हरिपदो पधारे। हस्ताक्षर करवा के खाकी रंग का  रजिस्टर्ड लिफाफा थमाते हुए कहा, ग्वर्मेंट का ऐप्येंटमेंट लेटर है। मैंने कहा, कहाँ काकू जो लेटर आना था, उसका तो समय निकल गया अब कहाँ से आएगा। पता नहीं इसमें क्या है। खोला तो देखा, सचमुच नियुक्ति पत्र था। प्रतियोगी परीक्षा का परिणाम तो दिसंबर में घोषित हो गया था। एंप्लॉमयमेंट न्यूज़ में परिणाम देखा था। उम्मीद के विपरीत मेरा रोलनंबर नज़र नहीं आया। रो-धो कर शाम तक मन को समझा लिया था कि पूरे हिंदुस्तान में पता नहीं कितने लोगों ने परीक्षा दी होगी। परीक्षा बहुत अच्छी हुई थी। अब ये नियुक्ति पत्र इतने दिनों बाद.... खैर, भाई ने तो नाचना शुरू कर दिया कि देखो मेरे जन्मदिन के दिन तुम्हें कितना अच्छा तोहफ़ा मिला है। उस दिन तो वो नाच रहा था लेकिन हफ्ते भर बाद उसे डैडी के पास मैं और मम्मी कोलकाता के लिए रवाना हो गए। तब उसे थोड़े पता था कि परिवार के संग उसका यह अंतिम जन्म दिन था। उसके बाद बड़े भाई बहन उसे छोड़ अपने-अपने पोस्टिंग स्थल पर चले आए थे।





कोई अपना न था, इस शहर में। अजनबी शहर - अजनबी लोग। डैडी इतनी दूर अकेले भेजने को राज़ी न थे। बीमार माँ साथ आईं कि कहीं रहने का बंदोबस्त कर वापिस घर लौट जाएंगी क्योंकि भाई बहुत छोटा था।  मगर ये हो न सका। कोई  भी वर्किंग लेडीज़ हॉस्टल पसंद नहीं आया रहने के लिए, तो घर वाले ज़बरदस्ती कैसे हॉस्टल के हवाले कर देते। जन्म से बंगाल में रहना हुआ, कोई रिश्तेदार तक इधर नहीं। लिहाज़ा, अपना घर छोड़ किसी के घर जाकर एक भी दिन रहने की आदत नहीं, तो होस्टल कैसे रास आता। खैर, कलकत्ते में अलीपुरद्वार के कल्याण भईया के रिश्तेदारों के यहाँ मध्यमग्राम में उन्होंने हमारे रहने का इंतज़ाम करवा दिया था। हावड़ा स्टेशन से सीधे अपनी चचेरी बहन के घर हमें ले जाकर कहा था, दीदी मेरी ये बहन यहाँ नौकरी करने आई है, तुम इनके लिए घर का बंदोबस्त करके दो। वे अपने भतीजे के घर ले गई, जिनका ऊपरी मंजिल पर घर बन तो गया था लेकिन दरवाज़े खिड़कियां लगने बाकी थे। उन्होने कहा, ऊपर रह लोगे। मेरे मना करने पर उन्होंने नीचे अपने दो कमरों में से एक कमरा हमें दे दिया खाली करके और कहा बरामदे में रसोई का काम चला लेना। साथ वाले कमरे में वे माँ और छोटा बेटा सोते। बड़ा बेटा और बहू ऊपर बने अधूरे कमरों में। होली वाले दिन उनका घर देखने गए थे। तीन महीने उसे घर में रहने के बाद हमें दूसरा घर मिल गया। इस घर में  नलकूप था, पानी भरते-भरते हालत खराब। माँ को तो नीचे झुकने तक की मनाही थी। उन लोगों ने राशन के लिए दुकान दिखा दी थी। दुकान वाले से कह दिया था कि ये हमारे किराएदार हैं, इन्हें किसी तरह की तकलीफ़ न हो। फिर उसी दुकानदार को एक दिन माँ ने कहा कि हमें कोई नया घर बताओ, जहाँ नल लगे हों, नलकूप नहीं। सुनकर तुरंत पास खड़े एक गाहक ने कहा, इन्हें हमारे घर भेज दीजीए मेर साथ। बस उनका घर देखा, नीचे  एक कमरा था, उस के साथ ही उन्होंने क छोटी सी रसोई भी बना दी हमारे लिए। इस दौरान भईया का नियुक्ति पत्र आ चुका था और उन्हें ट्रेनिंग पर साल भर रहना था खड़गपुर। इस तरह लोकल ट्रेन में सफ़र करना सीखा, लोकल वह भी बनगाँव  लोकल। हम किसमत को रोते कि जिनके अपने मकान यहाँ हैं उनकी तो ट्रेन में धक्के खाना मजबूरी है, हमें कहाँ से ला पटका यहाँ। सोचा नहीं था कभी कि इधर से निकल कर प्रॉपर कलकत्ते में रहना भी हो पाएगा । 1989 से अक्तूबर 96 तक लोकल ट्रेन के धक्के झेले। फिर एक कलीग को क्वार्टर मिला टालीगंज में तो उन्होंने मुझे तुरंत कहा - कवार्टर लेना है तो बताईए दिया। फिर ऑफिशियली शेयर बेसिस पर पास करवा कर क्वार्टर मुझे दे दिया और खुद वे सपिरवार रिसड़ा में रहते।  अपने क्वार्टर के लिए एस्टेट मैनेजर वाले कहते - अभी सीनियॉरिटी के हिसाब से बारी आने में देर है। भारत सरकार घरों से बेघर कर नौकरी पर बुला तो लेती है लेकिन रहने को घर नहीं देती। सीनियॉरटी के हिसाब से पहला क्वार्टर मिला सॉल्टलेक में। मैं तो देखने तक भी नहीं गई। माँ कहे देख तो आ। मैं कहती, मुझे इतनी दूर सूट नहीं करता, रात-बिरात मैं इतनी दूर आवाजाही नहीं कर सकती। यह टालीगंज का किराये पर ही ठीक है। अपने नाम न सही लेकिन है तो इंडीपेंडेट रूप से अपना ही। फिर साथ वाले कैंपस में टाइप थ्री में अपना क्वार्टर मिला नवंबर 1999 में और नवंबर 2004 में  पाँच साल रहने के बाद छोड़ कर फ्लैट में शिफ्ट किया। 

याद आता है, अलीपुरद्वार में जब मिशन स्कूल में पढ़ती थी सातवीं में, तो दो बहनें साथ पढ़ती थीं। उनके माता-पिता कुछ दिनों के लिए उन्हें स्कूल के बोर्डिंग में छोड़ कर गाँव गए थे। मैंने भी माँ से कहा कि मुझे भी बोर्डिंग में उनके साथ रहना है। रात को जब यूं ही बातों-बातों में डैडी ने पूछा कि बोर्डिंग में जाओगी सहेलियों के साथ। बस पूछना भर था कि रोना शुरूमानों भेज ही दिया गया हो। बेहद दुबली-पतली सी थी उन दिनों तो सिस्टर्स कहा करती थीं कि माँ खाने को नहीं देती है क्या। बोर्डिंग में आ जाओमोटी करके भेजेंगे।                                                                                   
ख़ैर, शुरु-शुरु में कलकत्ते में अच्छा नहीं लगता था क्योंकि मैंने दिल्ली का ऑप्शन दिया था और शायद बंगाल निवासी देखकर महिला होने के नाते कलकत्ते में पोस्टिंग दे दी गई हो। ज्वॉयन करने के बाद ऑफिस आकर पता चला कि मेरी रैंकिंग फर्स्ट थी। सोचती थी फर्स्ट आने पर यानी टॉप पर रहने पर ऐसा विभाग मिलता है जिसके कार्यालय सिर्फ चार शहरों दिल्ली, बंबई, कलकत्ता और मद्रास के सिवाए कहीं न हों। आम आदमी ने जिस विभाग का नाम तक सुन न रखा हो। सुनकर पूछे यह कौन सा विभाग है, क्या गतिविधियां है इस विभाग की।(हमारे शहर में सिर्फ विवेकानंद कॉलेज के एक कलर्क ने सही-सही बताया था इस विभाग के बारे में। कलकत्ते में भी ज़्यादातर लोग नहीं जानते इस दफ्तर को, हाँ बिजनेस वाले फिर भी जानते हैं।) ज्वॉयनिंग के लिए भेजते वक्त डैडी ने कहा था कि ज्वॉयन कर लो बाद में ट्रांसफर करवा कर इधर ले आएंगे। उधर यानी नॉर्थ बंगाल में ऑफिस होता तो न ट्रांसफर मिलता। याद आता है, नौकरी के लिए ऐप्लाई करते वक्त हर जगह ऐप्लाई करती थी, चाहे परीक्षा के वक्त जाना संभव हो पाए या नहीं, वो बाद की बात है, ऐप्लाई तो कर दिया जाए। साथी कंपीटीटर मज़ाक करते - जहाँ कोई ऐप्लाई नहीं करता, नीलम वहाँ भी ऐप्लाई करती है, फिर परीक्षा देने नहीं जाती। परीक्षा देने जाने के वक्त, कोई ले जाने वाला नहीं मिलता। कलकत्ते में एक परीक्षा देने आना था तो डैडी ने बडे भाई को आसाम से छु्ट्टी दिलवा कर बुलाया कि बहन को कलकत्ते ले जाओ, मैं कहाँ खाक छानूंगा अब कलकत्ते की। कलकत्ते में एक परीक्षा देने आई थी दिसंबर 1988 में। धर्मतल्ला (एसप्लानेड) ट्राम डिपो में घंटा भर बैठे रहे कि बस में नहीं ट्राम में ही जाना है और बिजली की कुछ प्रॉब्लम के कारण ट्राम सेवा एक घंटे के लिए बंद थी। उस वक्त डैडी के कलीग के घर राजारहाट में ठहरे थे। तब तो राजारहाट इतना विकसित भी नहीं हुआ था। अगले दिन भईया के किसी दोस्त के घर से वापसी में बस में किसी ने भईया का पर्स उड़ा लिया और पहले दिन परीक्षा सेंटर जाते राजारहाट से जो बस ली थी उसमें से उतरते  वक्त भईया ने पीछे से उतर कर सोचा कि बहन को सामने से बुला लूंगा और सामने की तरफ भीड़ होने के कारण वे मुझे उतरवा नहीं पाए(मुझे को मालूम ही नहीं था कि उतरना कहाँ है) और बस चल पड़ी। जब लगभग बस खाली हो गई तो मैंने सोचा कि इतना लंबा-चौड़ा भाई नज़रा क्यों नहीं आ रहा कहीं भी बस में। कंडक्टर ने टिकट के पैसे मांगे तो मैंने कहा पीछे मेरे भाई ने ले लिया है। तब कंडक्टर ने कहा, अच्छा वो, वो तो उतर गए। मैं सोचूं कि भईया को मालूम है कि मैं पहली बार कलकत्ते आई हूँ और कुछ भी नहीं जानती, भला मुझे छोड़ कर कैसे उतर सकते हैं। खैर उल्टाडांगा पहुंच कर बस वाले ने मेरे सेंटर का पता पूछ कर कहा कि यहाँ से दूसरी बस ले लो। वह मुझे समझा ही रहा था कि तब तक भईया पहुंच गए। मैंने कहा इनका किराया तो दे दो। बोले, किराया इनकी तो जूते से पिटाई करूं, इन्होंने सुनकर भी बस चला दी, रोकी नहीं। मैं टैक्सी पकड़ कर पीछे से फॉलो करके आया हूँ तब तुम्हें पाया। अब ऐसे अनुभवों के साथ कलकत्ते से लौट कर सोचा कि अब कलकत्ता सेंटर  हो तो ऐप्लाई नहीं करना है। एक की परीक्षा हो तो दो को आना पड़ता है, दुहरा खर्च लेकिन, भगवान ने तीन महीनों बाद मार्च 1989 में स्थाई तौर पर यहाँ भिजवा दिया।


और दफ्तर, उसी ट्राम डिपो के सामने। यह परीक्षा दी थी, कूचबिहार सेंटर में। करियर की यही पहली परीक्षा थी वही सफल हो गई। इसके बाद बहुत परीक्षाएं दीं कलकत्ते से निकलने के लिए ताकि होम टाउन में वापसी हो सके लेकिन ईश्वर को शायद महानगर में रखना ही मंजूर था। चलो मेरे कारण हर रिश्तेदार ने कलकत्ता भी देख लिया। डैडी जो परीक्षा दिलवाने के लिए बड़े बेटे से कहते थे कि इस उम्र में कहाँ कलकत्ते में धक्के खाते हुए इसे लेकर फिरूंगा, तू साथ चला जा।  बाद में हमारे यहाँ सेटल होने पर छुट्टियों में उन्हें भी यहाँ आना पड़ता। पाँच सालों तक तो हर बार दुर्गा पूजा में अलीपुरद्वार जाना ही मेरी प्राथमिकता में शामिल रहता था क्योंकि वहाँ एक हर पंडाल में किसी दोस्तों, परिचितों से मुलाकात होती, कलकत्ते में कौन, कोई नहीं।  फिर 1995 से जाना छूट गया। 1995 के बाद 2005 में जाना हुआ था सहेली की शादी में। फिर 2009 में इन्कम टैक्स विभाग में तैनाती के दौरान सरकारी काम से जलपाईगुड़ी जाना हुआ तो अलीपुर द्वार भी गई थी। यानी पाँच साल हो गए। अलीपुरद्वार वापसी हो जाती तो बस शायद नौकरी के लायक ही रहती कोलकाता आकर जो इतने नए आयाम मिले क़तई न मिल पाते वहाँ तो तब आज का अख़बार तक अगले दिन पहुंचा करता था। अलीपुरद्वार वालों को थोड़े ही पता है कि जनसत्ता में 90 के दशक में छपने वाला नाम नीलम शर्मा अंशु वहीं का है। 2005 में जब गई थी तो भईया के दोस्त उमा जी ने कहा भी था कि मैं तो यहाँ तुम्हारा प्रोग्राम रेडियो पर हरदम सुनता हूँ पर मुझे थोड़े ही पता था कि यह नीलम शर्मा, प्रदीप शर्मा की वही बहन है (पता नहीं वे किस सिस्टम से सुना करते थे) । मज़े की बात यह है कि नीलम शर्मा को जानने वाले नीलम शर्मा अंशु को नहीं जानते और अंशु को जानने वाले नीलम शर्मा को नहीं जानते। जब कभी एफ. एम. वाला प्रोग्राम बहुत अच्छा होता था तो हमारे पेक्स पोद्दार साहब पूछा करते, नीलम जी आपके दोस्तों ने क्या कहा प्रो. सुनकर। मैं कहती, सर मेरे ज़्यादातर दोस्त साहित्यिक क्षेत्र के हैं और वे एफ. एम. नहीं सुनते। बेचारे सर इतने जोश से पूछते और मेरा जवाब उन्हें मायूस कर देता। एफ. एम. पर नीलम शर्मा को सुनते  हैं वे नीलम शर्मा अंशु को नहीं जानते और नहीं पढ़ते। दोनों क्षेत्रों की अलग-अलग धाराएं हैं।

छोटे शहरों में रहने के अपने फायदे हैं। जब नौकरी के लिए चयन हुआ था तो सारे शहर को खबर हो गई थी। जिससे मुलाकात होती वही कहता, सुना है तुम्हारा सेलेक्शन हो गया है, कलकत्ते जा रही हो। कलक्ते में जब दिसं. 1988 में परीक्षा देने आई थी तो परीक्षा केंद्र पर ही दमदमवासी सपना दी से परिचय हुआ था। बाद में स्थाई तौर पर यहाँ आ जाने पर उनसे संपर्क कायम किया। वे अक्सर ऑफिस में मिलने आतीं। एक दिन मेरे ऑफिस में बैठे-बैठे उनके मुँह से अनायास ही निकल गया, नीलम तुम भाई बहनों ने नॉर्थ बंगाल से आकर कितनी अच्छी नौकरी जुगाड़ कर ली। मैंने कहा, नहीं सपना दी आप ग़लत कह रही हैं, हमने यहाँ आकर नौकरी जुगाड़ नहीं की बल्कि नौकरी हमें यहाँ लेकर आई है। फिर धीरे-धीरे उनका आना कम होता गया और आज की तारीख में पता नहीं वे कहाँ हैं, शायद हम एक दूसरे अब पहचान भी न पाएं। मुझे तो उनकी शक्ल तक याद नहीं।

दफ्तर में एक दिन अपू दा का फोन आया तो अधिकारी महोदय ने बात करने के लिए बुलाया। फोन पर बात हो गई तो उन्होंने कहा, ये लड़का कह रहा था कि तुम्हारा भाई है। मैंने तो उसे कहा कि नीलम शर्मा का तो एक ही भाई है और मैं उसे जानता हूं। मैंने कहा, सर आप ग़लती कर रहे हैं, मैं उन्हें दादा कह कर बुलाती हूँ। वैसे भी मेरे गृहनगर का कोई होगा और बड़े भाई की उम्र का होगा तो भाई ही कहेगा न। अपू दा एक दिन ऑफिस में आए तो मैं टेबल पर सर झुका रखा था। उनकी आवाज़ सुनकर सर उठाया तो आँखें नम थीं। उन्हें देख चौंक पड़ी। उन्होंने पूछा, रो क्यों रही हो। मैंने कहा, छोटे भाई की याद आ गई थी । बाद में जब अलीपुरद्वार गई तो वहाँ अपू दा ने दुर्गापूजा में मिलने पर दूसरे दोस्तों को हंसते हुए बताया कि एई बोका मेयेटी कोलकातार ऑफिसे बोशे भाई एर जन्नो कांदे (ये बेवकूफ़ लड़की कलकत्ते के दफ्तर में बैठकर छोटे भाई को याद कर रोती है)।

फिर 91-92 में एक दिन लंच टाइम में सेक्शन में लौटने पर एक कलीग ने बताया कि एक सरदार जी आए थे तुमसे मिलने। मैंने कहा, मैं तो किसी को नहीं जानती। बोले, वो जल्दी में थे, किसी दिन फिर आएंगे। इस तरह वो सज्जन दो बार और आए, लेकिन संयोग से मुलाकात का सबब नहीं बन पड़ा। फिर एक दिन अचानक सेक्शन में प्रवेश करते ही देखा कि मेरी सीट के पास एक सरदार जी बैठे हैं (नाम अब तो मुझे याद नहीं ) मैं सीधे उस कलीग के पास गई जिन्होंने इसके पहले मुझे सूचनाएं दी थीं। उन्होंने कहा, हाँ यही है जो तुम्हें इतने दिनों से ढूंढ रहा है। मैंने कहा, मैं नहीं जानती उनको, मुझे डर लग रहा है। उन्होंने कहा, जाओ बात करो न। हम लोग तो हैं ही सेक्शन में। जाकर मैंने सरदार जी से हिन्दी में बात की (स्वभाव के विपरीत क्योंकि पंजाबी जानने वालों से में पंजाबी में बात करनी पसंद  करती हूं।) उन्होंने मुझे एक पर्ची दिखाई और कहा, ग्वालियर में आपका कजिन (ममेरा भाई) लक्की मिला था बस में, उसी ने आपका पता देकर कहा था कि मेरी दीदी वहाँ रहती है, आप मिल लेना। तब साँस में साँस आई। मैंने उनसे कहा कि आप ने अपना फोन नंबर तक नहीं छोड़ा था कि आदमी फोन पर ही बात कर ले, जब देखो एक मैसेज मिल जाता कि सरदार जी आए थे। और मैं पिछले दो हफ्तों से टेंशन में थी कि पता नहीं कौन है। (तब अंशु का जन्म नहीं हुआ था कि शहर में इतने परिचित लोग हों कि मिलने आते रहें।) उन दिनों फोन का ज़माना नहीं था कि घर-घर फोन हो। डैडी को चिट्ठी लिखकर माज़रा बताया तो फिर उन्होंने मामा जी से कहा कि बच्चों को समझाएं। दरअसल बस में जैसे ही सरदार जी ने कलकत्ते का नाम लिया तो भाई ने तपाक से कहा कि वहाँ मेरी दीदी नौकरी करती है आप मिल लेना। संयोग से सरदार जी का दफ्तर भी करीब ही ता एस. एन. बनर्जी रोड पर तो इसलिए आते-जाते मौका मिलने पर वे संदेश पहुंचाने आ गए। फिर जब 92 में दूसरे कजिन की शादी में लक्की से मुलाकात हुई तो, लक्की तो माने न कि दीदी मैंने तुम्हारा पता दिया था। मैंने कहा देखो, मैंने आप लोगों को पते में DTE. लिख कर भेजा था। हर रिश्तेदार इसी तरह लिखता है, सिर्फ तुम हो जो चिट्टी पर भी ग़लत लिखते हो और सरदार जी को दी गई पर्ची में भी इसी तरह लिखा था यानी D. T. E.  तुम्हारे इन्कार करने से कुछ नहीं होता। तुम्हें क्या लगता है कि कलकत्ता तुम्हारा मुरैना या मेरा अलीपुरद्वार है कि सभी एक दूसरे को जानेंगे। इतने बड़े महानगर पड़ोसी को नहीं जानता।

अब आप सोच सकते हैं कि इतनी सी बात पर इतना झमेला क्यों? दरअसल मेरे ज्वॉयन करने के दो हफ्तों बाद भईया भी यहीं आ गए थे इस इंतज़ार में कि उनका भी भारतीय रेलवे से नियुक्ति पत्र आने वाला है और पोस्टिंग इधर ही होनी थी। तब तक उन्होंने एक प्राइवेट कंपनी ज्वॉयन कर ली थी इस शर्त पर कि नियुक्ति पत्र मिलते ही आपकी कंपनी छोड़ दूंगा। कंपनी ने शर्त रखी कि नियुक्ति पत्र मिलने पर बेशक छोड़ सकते हो लेकिन यह नहीं कि किसी दूसरी कंपनी ने 400 रुपए ज़्यादा दे दिए तो वहाँ चले जाओ। हमें शहर में आए अभी महीना भर भी नहीं हुआ था कि एक दिन हमारे घर पर दोपहर में एक हट्टे-कट्टे व्यक्ति ने आकर साथ वाले कमरे में खाना खा रहे मकान मालिक के परिवार से पूछा, नीलम शर्मा, प्रदीप शर्मा यहीं रहते हैं। उन्होंने हमारे कमरे की ओर इशारा कर दिया। अब वो साहब धड़ाक से दरवाज़ा खोल कमरे में प्रवेश कर गए। मां दोपहर को आराम कर रहीं थीं, हड़बड़ाकर उठ बैठीं। उस व्यक्ति ने फटाक से पूछा, प्रदीप कहाँ है। मम्मी ने कहा, वह तो ऑफिस गया है। उसने पता नहीं क्या शर्मा नाम बताया अपना और कहा मैं ट्रक लेकर कलकत्ते आया था, मेरा ट्रक खराब हो गया मुझे कुछ रुपए चाहिए थे, मैं प्रदीप का दोस्त हूँ। मम्मी ने उसे पानी पिलाया तो उसने गिलास मुँह से न लगा कर गिलास ऊँचा उठाकर मुँह में उड़ेल कर पीया। साधारणत: बंगाली लोग ही गिलास से इस तरह पानी पीते हैं। मम्मी ने कहा मेरे पास तो रुपए  हैं नहीं। प्रदीप के पास होंगे तो होंगे। पानी पीकर उल्टे पाँव वो हड़बड़ाहट में निकल गया और पता ही नहीं चला कि किधर को गया। मम्मी ने कमरे से निकल मकान वालों से कहा कि तुम लोगों उसे भीतर क्यों आने दिया। तो रामू दा ने कहा, मासी माँ मैंने सोचा कि मौसा जी होंगे। वह तो नॉनबंगाली ही लग रहा था और प्रदीप की तरह ही लंबा-चौड़ा और हैंडसम भी। खैर, शाम को जब भईया की घर वापसी हुई तो मम्मी ने उन्हें बताया। भईया ने अपनी पूरी डायरी देख कर कहा कि इस नाम को मेरा कोई दोस्त हिंदुस्तान भर में नहीं है। रही बात पैसे देने की तो हम तो खुद ही परदेस में थे, हमें ज़रूरत पड़ेगी तो हम किससे माँगने जाएंगे। अब बेटे के ऐसा कहते ही माँ को फिक्र हुई कि जो घर आ सकता है वह बेटी के ऑफिस में भी जा सकता है। जा बेटा, अब बहन को लेकर आ। दफ्तर तो पास नहीं। सियालदह से शायद मध्यमग्राम (उपनगर) 18 किमी. के लगभग है और सियालदह से एस्पलानेड तीन किमी. होगा। भईया ने लोकल ट्रेन पकड़ी और सियालदह आकर मेरे ऑफिस में फोन किया तो पता चला फोन बंद (ईपीबीएक्स बंद हो चुका था)। अब उन्होंने सोचा कि नीलम से अब संपर्क होने से रहा, ऑफिस पहुंचने तक तो वह निकल चुकी होगा। लिहाज़ा उन्होंने स्टेशन पर घोषणा करवा दी कि नीलम शर्मा आप सीधे घर चली जाएं। मैं घर पहुंची तो माँ ने पूछा प्रदीप कहाँ है। मैंने कहा मुझे क्या पता। अब माँ की चिंता - कि बेटी आ गई तो बेटा नहीं आया। ख़ैर अगले दिन ऑफिस गई तो एक कलीग ने पूछा, तुम क्या कल खो गई थी क्या? सियालदह स्टेशन पर तुम्हारे लिए घोषणा हो रही थी। मैंने जानबूझ कर कहा - नहीं तो, किसी और के लिए होगी। उन्होंने हंसकर कहा  - नीलम शर्मा तो तुम ही हो और तुम शहर में नई आई हो, ज़रूर कहीं खो गई होगी। तब मैंने उन्हें पूरा वाक्या बताया। फिर संयोग से दो हफ्तों के बाद भईया माँ को लेकर कहीं जा रहे थे तो सियालदह स्टेशन पर वह आदमी दिख गया। ये लोग बाहर निकल रहे थे और वह भीतर आ रहा था। माँ ने उसे रोकते हुए उसका कॉलर पकड़ भईया से कहा, यही उस दिन घर पर आया था। उस आदमी ने कहा - नहीं, नहीं मैं तो ट्रक लेकर बाहर (दूसरे शहर से) से आया हूँ। सीन क्रिएट होता देख भईया ने उसे जाने दिया लेकिन माँ श्योर थीं कि यह वही आदमी था और उसने भी ट्रक की बात कही।

बतौर साहित्यिक अनुवादक 21 साल का सफ़र पूरा हो रहा है। जून 1994 में जनसत्ता ने मेरी पहली अनूदित रचना प्रकाशित की थी। पहली रचना नीलम शर्मा आशादीप के नाम से, दूसरी रचना पंजाब केसरी में नीलम शर्मा पंजाबी के नाम से और फिर जनसत्ता में नीलम शर्मा अंशु के नाम से। और यही उपनाम फाइनल हो गया। आशादीप के बारे में संपादक महोदय का कहना था - ऐसा लगता है जैसे किसी भवन का नाम हो या फिर अस्पताल में कोई रोगी पड़ा हो और उसके सिरहाने सैलाइन की बोतल लटक रही हो। मुझे याद है जालंधर से दमन (जगदमन लाल दमन) अंकल ने मेरे अनुरोध पर कई उपनाम सुझाए थे, फिर शब्दकोश देखकर मैंने अंशु का चयन किया। अनूदित रचनाएं प्रकाशित करने के बाद जनसत्ता ने कलम थमा कर मुझसे कई आलेख लिखवा डाले। फिर प्रभात ख़बर ने भी बहुत छापा। लगातार 50 हफ्तों तक महिला शख्सीयतों पर कॉलम लिखवाया। मेरे छोड़ने पर ही लिखना छूटा। मैं मज़ाक में कहा करती, मैं दूसरों के बारे लिखती रहूंगी, मेरा नंबर कब आएगा।


2002 में जब काबुलीवाले की बंगाली बीवी पुस्तक प्रकाशित हुई थी, तो एक दिन पुस्तक मेले के दौरान मैं पुस्तक मेले में थी और एफ. एम. पर अपनी साथी प्रेजेंटर का प्रोग्राम सुन रही थी एक स्टॉल पर बैठ कर कि अचानक किसी श्रोता को उनसे फोन पर इस पुस्तक का ज़िक्र करते पाया। उसने कहा भी कि मैं अमुक-अमुक स्टॉल पर गया था वहाँ ये-ये नई पुस्तकें देखीं और उसने  काबुलीवाले..... का ज़िक्र करते हुए कहा कि हिन्दी में यह किताब खूब बिक रही है और बतौर अनुवादक मेरे नाम का ज़िक्र भी किया लेकिन उस श्रोता के थोड़े ही पता था कि ये अनुवादक और प्रेजेंटर नीलम शर्मा दोनों एक ही हैं। जब मेरे साथी-प्रेजेंटर को ही नहीं पता था तो श्रोता को कैसे पता हो सकता है। मैंने बाद में साथी प्रेजेंटर को फोन करके पूछा कि किसी श्रोता ने कुछ हिन्दी किताबों का जिक्र किया था, मैं उसका नाम नहीं सुन पाई ज़रा बताओ तो। तो उसने मुझे श्रोता का नाम बताया और पूछा - अच्छा नीलम जी, वो नीलम शर्मा अंशु कहीं आप ही तो नहीं।  
ईश्वर ने भारत सरकार का एक नियुक्ति पत्र देकर इस शहर में भेजा था, और इस शहर ने तो मेरी झोली ही भर दी। नीलम शर्मा और अंशु से अपार स्नेह रखने वाले एफ. एम. श्रोताओं और साहित्यिक दोस्तों एवम् लेखनी को रवानगी व प्रोत्साहित करते हुए प्रकाशन का अवसर प्रदान करने वाले संपादकों व पत्र-पत्रिकाओँ  व प्रकाशकों जिन्होंने मेरी पुस्तकों को पाठकों तक पहुंचाया, उन सबके प्रति तह-ए-दिल से आभारी हूँ।

प्रस्तुति - नीलम शर्मा 'अंशु'












09 फ़रवरी 2014

17 वर्षों के मेट्रो के सफ़र में आज का दिन।



मेट्रो में 17 वर्षों के सफ़र में ऐसा अनुभव कभी नहीं हुआ। आज (9 फरवरी) शाम 5.15 से रात 9 बजे तक एफ. एम. पर ड्यूटी थी। हमेशा प्रो. से दो दिन पहले गीतों का चयन कर लिया जाता है लेकिन इस बार व्यस्तताओं के चलते वृहस्पतिवार को नहीं जाना हो पाया आकाशवाणी, फिर शाम को कलीग के सुपुत्र की शादी के रिसेप्शन पर आमंत्रण था। अगले दिन शुक्रवार को पुस्तक मेले में 1 बजे हाज़िरी देनी थी लिहाज़ा वह दिन भी गया। सोचा प्रो. से एक घंटा पहले जाकर हाज़िरी देनी पड़ती है तो चलो और एक घंटा पहले निकला जाए आज। इसलिए 1.55 पर घर से निकल पड़ी। मेट्रो स्टेशन जाकर देखा कि 2.12 वाली ट्रेन मिलेगी। लेकिन ट्रेन दो मिनट देर से आई और फिर हर स्टेशन पर काफ़ी देर रुकती रही भीड़ के कारण।

ट्रेन में ज़बरदस्त भीड़ थी। उस वक्त ज़ेहन में बिलकुल कुछ नहीं आया। भीड़ इतनी कि सीट पर बैठे होने की स्थिति में मेरे सामने खड़े लोगों का दबाब गोद में रखे मेरे बैग से होकर पेट पर पड़ रहा था। तभी भीड़ की अधिकता  को समझ कर मैंने दुपट्टा गले से उतार कर बैग में रख दिया। वर्ना गल भीड़ की धक्का-मुक्की में गला घुट जाना तो तय ही था। चूंकि मेरे सामने के तीन लोगों को पार्क स्ट्रीट उतरना था, (जो कि बाईं तरफ पड़ता है) वो लोग उतर नहीं पाए तो उन्होंने एसप्लानेड की तरफ रुख किया (दाहिने तरफ)। उनके अचानक इस तरफ मुड़ जाने के कारण मेरे स्थिति बदल गई। बाएं हाथ में पर्स और मोबाइल थाम रखा था क्योंकि बैग में रखने से पिक-पॉकेट की आशंका बनी रहती है और दाहिने कंधे पर बैग था। ठीक उतरने के वक्त दरवाज़े के सामने आकर बैग कंधे से स्लिप करके पीछे, नीचे गिर गया, उसे उठा कर आगे बढ़ने तक चढ़ने वाले लोगों का रेला सा आ गया और तांता लग गया। अब कौन किसकी सुनता। इतनी गुज़ारिश की, कि भई उतर लेने दीजिए पर......

अचानक लगा कि अब तो उतरना मुश्किल है, अगले स्टेशन पर देखा जाएगा। वैसे हर स्टेशन का फासला दो मिनटों का होता है, ऐसी स्थिति में दूसरे या तीसरे स्टेशन पर जाकर उतरा ही जा सकता है फिर उधर से दूसरी ट्रेन पकड़ कर लौट आओ। लेकिन जब लगा कि अब यहाँ उतरना संभव नहीं तो कोशिश छोड़ दी। लगा अब तो दम ही घुट जाएगा अगले स्टेशन तक जाते-जाते। चश्मा गिर जाएगा, पर उतारा कैसे जाए, उतार कर रखा भी कहाँ जाए, हाथ में पकड़ने से तो वैसे भी भीड़ के दबाव से चटक जाएगा। अब तो आँखों के सामने तारे नाचते नज़र आ रहे थे। (आइंदा ऐसी नौबत आने पर चश्मा उतार कर बैग में रखकर ही उतरना उचित होगा।) जिन लोगों को पता चला था कि बैग नीचे गिर गया था, उन लोगों ने पूछा, बैग मिला क्या, कहाँ है। मैंने कहा, जी मिला, मेरे हाथ में है। लोगों ने पूछा, उतरना कहाँ है, मैंने कहा यहीं उतरना था एसप्लानेड में (ट्रेन तब भी रुकी हुई थी)। उन लोगों ने सुनकर कहा, उतर जाईए, उतरना ही बेहतर रहेगा। मैंने कहा, चढ़ने वाले लोग उतरने का रास्ता नहीं छोड़ रहे। तो उन लोगों ने चढ़ने वालों को जबरन उतार कर मुझे उतरने में सहायता की। गिरते-पड़ते प्लैटफॉर्म पर उतर कर कुर्सियों के पास जाकर एक सज्जन से बैठने की जगह देने का इशारा किया। इशारा समझ उन्होंने सीट छोड़ दी। मुझसे तीसरी कुर्सी पर बैठी महिला ने मेरी हालत देख पानी की बोतल बढ़ाई। मैंने उन्हें इशारे से समझाया कि फिलहाल पीने की स्थिति में नहीं हूँ, साँस ज़रा दुरुस्त हो जाए।  15-20 मिनट साँस दुरुस्त होने में लगे। आधे लीटर पानी की बोतल जो कि रात नौ बजे तक मेरे काम आती है (यानी कि पानी बहुत कम पीती हूँ) वही बोतल उसी वक्त गटक कर ख़त्म हो गई। तब कहीं बोल पाने की स्थिति में आई। फिर बाहर की ओर कदम बढ़ाए। बाहर आकर साइड में लगी बसों में लोगों को बैठे देख और नीचे फर्श पर खाने की प्लेटें फेंकी पड़ी देख ध्यान आया कि आज तो ब्रिगेड में वाम वालों का समावेश था। ख़ैर, किसी तरह आकाशवाणी पहुंची तो, एक ड्यूटी ऑफिसर ने पूछा बाहर की स्थिति क्या हैमैंने सिर्फ़ इतना कहा, फिलहाल बोल पाने की हालत में नहीं हूँ। उन्होंने तुरंत दूसरे साथी से कहा देखा, बाहर की हालत कितनी ख़राब है, ये बोल पाने की स्थिति में भी नहीं हैं।  फिर कंप्यूटर पर बैठ कर  25-26 गाने चुने, दो कार्यक्रमों में बजाने के लिए। और 5.15 से प्रो. का लाइव प्रसारण शुरू हुआ। तब तक संयत हो चुकी थी, यानी होना ही था। वर्ना प्रो. में गड़बड़ी होगी। इसीलिए मैं हमेशा दो-तीन दिन पहले गाने चुन कर रखती हूं।  ख़ैर, जो अनुभूति आज हुई, उसे शब्दों में बयां कर पाना मुश्किल है, सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है।

सोच रही थी कि मेरे जैसा ऐक्टिव और मीडिया वाले आदमी का अगर आज ये हाल हुआ तो आम लोगों का क्या हाल हुआ। हम लोग तो धक्का-मुक्की और दौड़-भाग के अभ्यस्त हैं। अरे, हम जैसे लोग तो मजबूरी में ड्यूटी बजाने जा रहे थे, बाकी लोग रविवार की छुट्टी के दिन कहाँ झख मारने गए, घर पर बैठा नहीं जाता लोगों से।



ऐसी स्थिति में खुद ही संभलना पड़ता है खुद को, घर आकर बताते भी नहीं बनता वर्ना आगे से जब तक घर नहीं पहुंचो तब तक घर वाले चिंतित। घर बैठे कर ही क्या सकते हैं सिवाय फिक्र करने के। 

कोलकाता के उपनगरीय लोकल ट्रेन सेवा में सबसे बदतर सेवा बनगाँव रूट की है। उस रूट में मैंने सात-आठ साल तक डेली पैसेंजरी की, जो आदमी बनगाँव लोकल की धक्का-मुक्की का अभ्यस्त हो वह आज मेट्रो से ही न उतर पाए। सोचने वाली बात ये है कि सिर्फ भीड़ की अधिकता की वजह से अगर ऐसी घुटन महसूस हुई तो फिर मेट्रो में जब चिंगारी लगने, धुआँ निकलने जैसी स्थितियों में अफ़रा-तफरी मचती होगी तो लोगों की हालत क्या होती होगी?


आज दूसरा रविवार ऐसा बदतर रहा। पिछला रविवार भी ऐसा ही गुज़रा, बल्कि पिछले से आज वाला ज्यादा बदतर रहा।  पिछले रविवार यानी  2 फरवरी को आकाशवाणी की तरफ से पिकनिक पर जाना था कल्याणी। सियालदह स्टेशन से लोकल ट्रेन पकड़नी थी सबको। मैंने तय किया कि सियालदह न जाकर मेट्रो से दमदम स्टेशन जाकर वहाँ से वही ट्रेन पकड़ ली जाए। मैं तो 8 बजे दमदम स्टेशन पहुंच गई मेट्रो से। जो लोग पीछे से आने वाले थे सियालदह स्टेशन से वे वहीं फंस गए, क्योंकि उस दिन दमदम से सियालदह जाने वाले एक लोकल ट्रेन दमदम स्टेशन छोड़ते ही सात बोगियां पटरी से उतर गई, परिणामस्वरूप एक ही लाइन और प्लैटफॉर्म पर सारी ट्रेनों की आवा-जाही हो रही थी। तो सियालदह से आने वालों की ट्रेन 11 बजे दमदम पहुंची और हम गंतव्य पर पौने एक बजे पहुंच पाए। शाम को वापसी के वक्त भी ट्रेन सवा घंटा दमदम स्टेशन से बाहर रुकी रही। जाते वक्त मुझे तीन घंटे उन सबका इंतजार करना पड़ा अकेले, और शाम के सफ़र में सवा घंटा यानी उस दिन कुल सवा चार घंटे बरबाद हुए लेकिन आज का मेट्रो का 20 मिनटों का सफ़र उस दिन से भी ज्यादा कष्टप्रद रहा।

आज की भीड़ को क्या वाम रैली के साथ जोड़ कर देखूं ....... 30 जनवरी की दीदी की रैली थी, तो सुबह 10.30 बजे जो ऑफिस में प्रवेश किया तो फिर शाम 5 बजे ही निकलना हुआ घर लौटते वक्त। फिर मोदी साहब की रैली के दिन सुबह ऑफिस जाते वक्त आस-पास देख कर सोचा कि आज फल वालों ने दुकानें क्यों नहीं सजाई तो ध्यान आया कि अच्छा आज भाजपा की रैली है। लेकिन आज तो रविवार की छुट्टी थी, ऑफिस तो जाना नहीं था, शाम को आकाशवाणी जाना था बस प्रो. के लिए।


-  नीलम शर्मा ‘अंशु

04 फ़रवरी 2014

वसंतोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं।












31 दिसंबर 2013

नव  वर्ष 2014 की मंगलकामनाएं........



22 नवंबर 2013

लोग इतना कुछ याद कैसे रख लेते हैं………..।

लोग इतना कुछ याद कैसे रख लेते हैं………..


मुझे बहुत हैरानी होती है कि लोग इतना कुछ याद कैसे रख लेते हैं। मुझे तो याद नहीं रहता। किसी नए व्यक्ति से अगर लगातार मुलाकातें न होती रहें तो मैं तो भूल ही जाती हूँ। आज शाम मेरे ऑफिस के कैंपस में अचानक किसी ने पीछे से आवाज़ दी (बांगला में) मैडम कैसी हैं ? लिहाज़ा ज़रा सी चाल धीमी हो गई, पीछे मुड़कर देखा और पलट कर पूछा -  आप कैसे हैं ?
उन्होंने कहा, आपने मेरी बात का जवाब नहीं दिया। मैंने कहा, बहुत अच्छी हूँ। फिर उन्होंने पूछा, पहचाना?

मैंने यूं ही रस्मी तौर पर पूछ लिया कि आप आजकल किस ऑफिस में हैं। जवाब में उन्होंने  कहा - आजकल हल्दिया में हूँ । (दफ्तर का नाम मुझे भूल भी गया।) मैंने कहा, ट्रांसफर हो गया क्या दरअसल मैंने उन्हें हमारे लेखा नियंत्रक कार्यालय का स्टाफ समझ लिया था इसलिए मन ही मन सोचा कि वहाँ भी दफ्तर की शाखा है क्या फिर उन्होंने पूछा, आप आजकल मध्यमग्राम में ( समीपवर्ती एक उपनगर, तब कोलकाता के उत्तर 24 परगना जिले में पड़ता था, अब कोलकाता ही कहलाता है।) ही रहती हैं अभी भी। मध्यमग्राम का नाम सुनकर लगा कि ये तो कोई बहुत ही पुराने परिचित हैं। फिर उन्होंने कहा, याद है वो भारतीय भाषा परिषद में मुलाकात हुई थी। अब भी जाती होंगी आप। उनके मुँह से भारतीय भाषा परिषद का नाम सुनकर तो उनका चेहरा बिलकुल भी परिचित सा नहीं लगा बल्कि यह स्पष्ट हो गया कि ये हमारे लेखा नियंत्रक कार्यालय से नहीं हैं। फिर उन्होंने पूछा, लिखना-लिखाना कैसा चल रहा है। मैंने रस्मी तौर पर ही जवाब दिया कि बस ठीक-ठाक। फिर सोच कर मैंने कहा कि मुझे बिलकुल याद नहीं आ रहा, आप अपना नाम बताईए। नाम बताया तो नाम भी जाना-पहचाना नहीं लगा फिर भी मैंने पूछा - कहीं आप वे ही तो नहीं, जो मेरे पास हिन्दी की कविताएँ ऐडिंटिंग के लिए लाया करते थे। वे बांगलाभाषी होकर हिन्दी में कविताएं लिखा करते थे उन दिनों। हालांकि कविताएं लिखने का शौक तब मुझे नहीं था, उनकी कविताओं की वर्तनी वगैरह मैं सुधार दिया करती थी जब भी दो-तीन हफ्तों बाद या महीने भर बाद वे मेरे पास लेकर आते।  फिर अचानक उनका आना बंद हो गया। हो सकता है उसी दौरान उन्होंने हल्दिया में ज्वॉयन कर लिया हो। जब उन्होंने कहा कि हाँ वही हूँ, तो मैंने कहा, अगर आपके पास वक्त हो तो चलिए सीट पर चलकर बैठ कर बात-चीत की जाए। उसी क्रम में उन्होंने बताया कि आपने मुझे गुलज़ार साहब का गीत क़तरा-क़तरा मिलती है बांगला में अनुवाद करके दिया था। यानी ये 1994-95 की बातें थीं। तब मैं नौकरी के साथ जनसत्ता के लिए फ्रीलांसिग किया करती थी और अपनी एम. ए. की पढ़ाई और पंजाबी पुस्तकों के लिए भाषा परिषद के पुस्तकालय में जाया करती थी। यानी जनाब से मुलाकात लगभग 17-18 बरसों बाद हो रही थी। बात-चीत में उन्होंने बताया कि आजकल डोंगरी टू दुबई पुस्तक पढ़ रहा हूँ, इसके बांगला अनुवाद के लिए सोच रहा हूँ। आप हिन्दी में करेंगी (उन्हें मेरे अनुवाद कार्य की जानकारी नहीं थी)। मैंने कहा, आजकल अभी इतना वक्त नहीं है, पहले वाला काम पूरा करना है, उसी के लिए समय नहीं मिल रहा है।  फिर कहा, अब भी तरह-तरह की पत्रिकाएं खरीदता रहता हूँ। फिर उन्होंने याद दिलाया कि उन दिनों आप संजय दत्त का इंटरव्यु करने वाली थीं। फिर कहा मुझे गुलज़ार बहुत पसंद हैं, उनकी कविताएं, शायरी, गीत। मैंने कहा कि मैंने उनका भी इंटरव्यु किया था। फिर मैंने बताया कि आपने क़तरा-क़तरा की बात कही कि मैंने आपको उसका बांगला में अनुवाद करके समझाया था और आजकल मैं श्रोताओं को गीत भी सुनवाती हूं एफ. एम. पर। इतने सालों के बाद मुलाक़ात और बात-चीत के बाद उन्होंने कहा, आपने बहुत प्रगति कर ली है काम के सिलसिले में। मैंने कहा, कि आपने नॉक किया मैं तो पहचान ही नहीं पाती, हाँ कभी-कभार सोचा करती थी कि कविताएं लेकर आऩे वाले उस शख्स ने अचानक आना क्यों छोड़ दिया। उन दिनों फोन और मोबाइल भी नहीं हुआ करते थे। आज वे हमारे कैंपस में विदेश व्यापार के कार्यालय में अपने दफ्तर के काम से आए थे और उधर से मुझे गुज़रते देख आवाज़ दी थी। उन्होंने कहा, आपका व्यक्तित्व ही याद रखने वाला है। फिलहाल बरसों बाद इस तरह अचानक ज़िंदगी की कैसेट रिवांइड हो गई। फोन नंबरों का आदान-प्रदान हुआ और उन्होंने कहा कि कोलकाता आने पर समय मिला तो मुलाकात हुआ करेगी। मेरी अनूदित किताबें देख उन्हें हैरानी हुई और कहा बहुत अच्छा लग रहा है देखकर। मैं आपको एक किताब के अनुवाद के लिए कह रहा था, आपने तो पहले से ही कई कर रखी हैं।  हाल ही दैनिक जागरण के दीपावली विशेषांक की मेरी कहानी देख उन्होंने कहा, इसे मैं ले जा रहा हूँ, पढूंगा और इसका मैं बांगला में अनुवाद भी करूंगा। तो इस तरह एक अनुवादक को अनुवादक भी मिल गया।

और मैं सोच रही थी कि कि लोग इतना कुछ याद कैसे रख लेते हैं………..

(बंगाल में बंगालियों के बीच गैरबांगलाभाषी, और तिस पर पंजाबी होने का फायदा बचपन से ही मिलता रहा है। लोगों का आकर्षण बना रहता है अरे, ये तो पंजाबी हैं।  एक तो लोग आसानी से याद रखते हैं, नाम भी। उत्तर भारत में तो नीलम नाम बेहद कॉमन है, पर बंगाल में नहीं। इसका भी फायदा मिलता है। अभी पिछले महीने जब कश्मीर जाना हुआ तो दिल्ली में हमलोग करोलबाग से लौट कर अपने होटल जा रहे थे तो किसी ने पीछे से नीलौम कह कर आवाज़ दी। नीलम कहा होता तो शायद पलट कर नहीं देखती क्योंकि वहाँ नीलम नाम तो किसी और का भी हो सकता था पर नीलौम उच्चारण तो किसी बांगलाभाषी का ही हो सकता था इसलिए स्वभाविकरूप से पलट कर देखा तो अपने ही सहकर्मियों को सपरिवार वहाँ पाया जो कि कश्मीर से लौट रहे थे और हम जाने वाले थे। जिन्होंने आवाज़ दी थी, उन्होंने कहा कि मैंने तुम्हारी शक्ल नहीं देखी थी बस पीछे से ही देखकर आवाज़ दे दी थी। मैंने भी कहा कि उम्मीद नहीं थी कि ऑफिस के लोग यहाँ मिल जाएँगे सिर्फ अपने नाम का बांगला उच्चारण सुनकर ही पीछे मुड़कर देखा था कि हां यह आवाज़ मेरे लिए ही है।)  

– नीलम शर्मा अंशु

02 नवंबर 2013

आप सभी   को समवेत स्वर की ओर से दीपोत्सव की हार्दिक 

शुभकामनाएं। सबका जीवन सदैव जगमग करता रहे।






20 सितंबर 2013

जन्मदिन पर विशेष

मल्लिका-ए तरन्नुम : नूरजहाँ 


                                                                        


21 सितंबर 1926 को लाहौर से लगभग 40 कि. मी. दूर कसूर कस्बे के एक नाचने- गाने वाले परिवार में एक खूबसूरत सी बच्ची का जन्म हुआ। नाम रखा गया अल्लाह रख्खी। बच्ची को खुदा ने जितनी बेमिसाल खूबसूरती बख्शी थी, उतनी ही पुरकशिश आवाज़ भी। पांच साल की उम्र में जब अधिकांश बच्चे तुतला रहे होते हैं, उस वक्त अल्लाह रख्खी ने तत्कालीन गायकों की शैली में गाना भी शुरू कर दिया था।

मात्र  8 वर्ष की नन्हीं उम्र में कलकत्ते की एक फ़िल्म कंपनी ने उसे प्ले बैक का मौका दिया। निर्माता निर्देशक अभिनेता बिट्ठलदास पांचोटिया के अनुसार 1935 में उन्होंने सबसे पहले मादन थियेटर कलकत्ता द्वारा निर्मित फ़िल्म गैबी गोला में पहली बार अल्लाह रख्खी को बाल कलाकार यानी बेबी नूरजहां के रूप में पेश किया। परंतु संगीतकार गुलाम हैदर के निर्देशन में 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने पंजाबी फ़िल्म गुल-बकावली में पहली बार गाया।


 शुरूआती दौर में नूरजहां ने बहुत सी पंजाबी और हिन्दी फ़िल्मों में काम किया लेकिन जिस फ़िल्म से उन्होंने बतौर नायिका और गायिका पहली बार अपार शोहरत हासिल की, वो थी 1942 में रिलीज़ हुई फ़िल्म खानदान इस फ़िल्म के गीतों ने तो धूम ही मचा दी थी। फ़िल्म में उनके नायक थे प्राण


फ़िल्म खानदान की असाधारण सफलता नूरजहां को उड़ा कर बंबई ले गई।  बंबई फ़िल्म नगरी में वे अकेली नहीं गईं साथ वे अपनी शोख पंजाबीयत भी ले गईं। वहाँ 1943 में सआदत हसन मंटो की कहानी पर शौकत रिज़वी की फ़िल्म नौकर में काम किया जिसमें शोभना समर्थ और चंद्रमोहन ने भी मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं।

1943 में जिया सरहदी द्वारा निर्देशित फ़िल्म नादान प्रदर्शित हुई, जिसमें संगीतकार के. दत्ता के निर्देशन में उन्होंने पहली बार कई गीत गाए। फिर शौकत रिज़वी ने दोस्त का निर्देशन किया, फ़िल्म तो चली नहीं पर सज्जाद हुसैन के गीत काफ़ी हिट रहे। 1945 में नूरजहां अभिनीत चार फ़िल्में रिलीज़ हुई, उनमें ज़ीनत ने बहुत धूम मचाई और फ़िल्म के गीत भी बहुत पसंद किए गए। गीत हैं- नाचो सितारो नाचो/ बुलबुलो मत रो यहां / आंधियां ग़म की और क़व्वाली आहें न भरी शिकवे न किए। संगीतकार श्याम सुंदर ने फ़िल्म विलेज गर्ल में नूरजहां से पहली बार कई खूबसूरत गीत गवाए, जिनमें,  बैठी हूं तेरी याद का लेकर सहारा / किस तरह भूलेगा दिल / ये कौन हंसा / और सजन परदेसी  प्रमुख हैं।


 फिर आई महबूब निर्देशित और संगीतकार नौशाद अली के संगीत से सजी सुपरहिट फ़िल्म अनमोल घड़ी, जो कि प्रेम त्रिकोण पर आधारित थी। 1946 में प्रदर्शित ये एक ऐसी फ़िल्म थी जिसमें नूरजहां की अदाकारी और गीतों ने उनके रुतबे को आसमां तक पहुंचा दिया। इस फ़िल्म का गीत, आवाज़ दे कहां है, दुनिया मेरी जवां है हमेशा-हमेशा के लिए नूरजहां की पहचान बन गया। इसमें नूरजहां के साथ सुरेन्द्र और सुरैय्या ने भी अभिनय किया था। इस फ़िल्म में नूरजहां ने जवां है मुहब्बत/ आ जा मेरी बर्बाद मुहब्बत के सहारे/ मेरे बचपन के साथी/ क्या मिल गया भगवान जैसे कई एकल गीत भी गाए


दरअसल अनमोल घड़ी का संगीत, कहानी का अनूठापन, इसकी कास्ट, महबूब खान का निर्देशन, कुछ ऐसी बातें थीं जो नूरजहां को फ़िल्म Art के field में काफ़ी आगे तक ले गईं। 1946 में नूरजहां की दो फ़िल्में और आईं। एक थी दिल और दूसरी हमजोली। परंतु इन फ़िल्मों के गीत ज़्यादा पॉपुलर नहीं हो सके। इसी साल रिलीज नूरजहां – त्रिलोक कपूर अभिनीत फ़िल्म मिर्ज़ा साहिबा के गीत भी बेहद हिट हुए थे। कुछ गीतों की धुनें हुस्न लाल भगत राम ने बनाई थीं तो कुछ की अमरनाथ ने।

1947 में शौकत रिज़वी के निर्देशन में आई फ़िल्म जुगनु जिसमें दिलीप कुमार नायक थे। फ़िरोज़ निज़ामी द्वारा संगीतबद्ध इस फ़िल्म के गीतों ने अपार शोहरत हासिल की। सर्वाधिक हिट डूयेट था – यहां बदला वफ़ा का सिवाए बेवफ़ाई के क्या है। नूरजहां का साथ दिया था मु. रफ़ी साहब ने।  ये तो आप जानते ही हैं कि रफ़ी साहब का नूरजहां के साथ गाया यह इकलौता गीत है। टोरांटोवासी रफ़ी साहब के बड़े भाई हमीद साहब के अनुसार रफ़ी उस दिन बहुत नर्वस थे। नूरजहाँ जी ने खुद अपने हाथों से उन्हें पानी पिलाया और हौंसला बढ़ाया।

अविभाजित हिन्दुस्तान में जुगनु उनकी अंतिम फ़िल्म थी। देश विभाजन के बाद नूरजहां लाहौर वापिस चली गईँ। जहां कोई गायक या गायिका वहाँ शौकत हसन के साथ मिलकर सटुडियो खोला – शाहनूर। 1951 में शाहनूर के बैनर तले उन्होंने शौकत रिजवी निर्मित पंजाबी फ़िल्म चन्न वे का निर्देशन किया और वे पाकिस्तान की पहली महिला फ़िल्म निर्देशक बन गईं।

1953 में उनकी दो फ़िल्में रिलीज हुईं ‘दुपट्टा’ और ‘गुलनार’। दुपट्टा का संगीत दिया था फिरोज़ निज़ामी ने। मशहूर गीत रहे – जिगर की आग से इस दिल को जलता देखते जाओ चांदनी रातें तुम ज़िंदगी को ग़म का फ़साना बना गए  मैं बन पतंग उड़ जाऊँ।

गुलनार के संगीतकार थे गुलाम हैदरलोकप्रिय गीत थेबचपन की यादगारों मैं तुमको ढूंढती हूं / लो चल दिए हमको तसल्ली दिए बगैर / सखी री नहीं आए सजनवा मोर वगैरह वगैरह।

नूरजहां के समकालीनों में अमीरबाई कर्नाटकी, ज़ोहराबाई अंबालावाली जैसी गायिकाएं और नायिका गायिका खुर्शीद रहीं। अगर वो युग शमशाद बेगम, सुरैया, राजकुमारी, पारुल घोष, काननबाला, जूथिका राय जैसी दिग्गज गायिकाओं का था तो इन सब में नूरजहां ने अपनी अलग पहचान बनाई। भले ही कुंदनलाल सहगल, पहाड़ी सान्याल, सुरेन्दर, जी.एम. दुर्रानी, जगमोहन, के. सी. डे जैसे गायकों का जादू भी लोगों के सर चढ़कर बोल रहा था, फिर भी इन सब में नूरजहां की गायकी की कशिश अलग ही थी।

बकौल सुरेन्दर – नूरजहां की आवाज़ में तिलिस्म ही था, उनके साथ गाते-गाते न जाने कितनी बार ऐसा हुआ कि मैं अपनी लाईन ही भूल जाता, उनकी आवाज़ में खोया रहता।

1951 से 1960 तक उन्होंने 13 फ़िल्मों में काम किया पाकिस्तान में उन दिनों उर्दू के मुकाबले पंजाबी फ़िल्में ज़्यादा बनती थीं। नूरजहां ने उर्दू, पंजाबी, पश्तो, सिंधी भाषा में बनी फ़िल्मों में प्लेबैक का रिकॉर्ड बनाया। उनके इस रिकॉर्ड को कोई अन्य पाकिस्तानी गायिका नहीं तोड़ पाई है।

नूरजहां की लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि लता मंगेशकर भी उनकी प्रशंसक हैं। वे जब पहली बार संगीतकार गुलाम हैदर के पास ऑडिशन देने गई थीं तो उन्होंने फ़िल्म ज़ीनत में नूरजहां जी का गाया गीत -  ‘बुलबुलो मत रो यहां आंसू बहाना हैं मना’ गाकर सुनाया था। इसे सुनकर गुलाम हैदर ने उन्हें फ़िल्म ‘मजबूर’ में गाने का मौका दिया था।


अपनी अदाकारी और गायकी से बहुत शोहरत हासिल कर चुकीं नूरजहां को तमगाए-इम्तियाज़ और Pride of Performance जैसे सम्मानों औरमल्लिका-ए-तरन्नुम के ख़िताब से नवाज़ा गया। लेकिन ये भी सच है कि जो कुछ बंबई Film Industry नूरजहां से करवा या गवा सकी उसका एक चौथाई भी लाहौर Film Industry उनसे हासिल न कर सकी। इस विषय पर संगीतकार एस. मोहिन्दर का कहना था कि लाहौर के संगीत निर्देशक कम अनुभवी नहीं थे परंतु उस फ़िल्म इंडस्ट्री के पास न तो बंबई के level  की तकनीक थी और न ही नए तजुर्बे करने का हौंसला और न ही दिव्य दृष्टि कि वे किसी कलाकार से उसकी निपुणता के अनुसार काम करवा सकती। इसलिए इसमें हैरानी की कोई बात नहीं कि नूरजहां वहां की फ़िल्मों में कला और संगीत की दृष्टि से अपने बंबई के दौर से आगे न जा सकीं। 


एक किस्सा शेयर करना चाहूंगी। टोरांटो वासी मेरे दोस्त श्री इकबाल माहल वहाँ म्युज़िकल शोज़ का आयोजन करते हैं। जगजीत सिंह उनके यहां ठहरे हुए थे। ऐसे में एक बार उन्हें मैडम नूरजहां ने फोन करके जगजीत सिंह का प्रोग्राम सुनने की ख्वाहिश जताई। सोचिए मंच पर जगजीत और दर्शकों में सामने बैठ मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहां उनके गायन का लुत्फ़ उठा रही थीं। नूरजहां का एक प्रशंसक उनके घुटनों के पास आ बैठा। जोश में आकर वह उनके घुटने दबाने लगता। वे अपने घुटने इधर-उधर करके प्रशंसक के उत्साह से बचने की कोशिश कर रही थीं। आखिर नूरजहां जी ने इकबाल जीक के कान में कहा, इस आदमी से पीछा छुड़ाओ


 इकबाल जी ने उस प्रशंसक से कहा, भाई साहब तारीफ़ ज़बान से ही काफ़ी होती है, हाथों से करनी ज़रूरी नहीं । वह झेंप गया। थोड़ी देर बाद नूरजहां जी ने कोई बात कही तो उस आदमी के जोश में उबाल आ गया और फिर से घुटने पकड़ बैठा। इस बार इकबाल जी ने तैश में आकर कहा कि भाई साहब, अगर आप को घुटने नहीं तुड़वाने तो अपने हाथों को संभाल कर रखिए। महफ़िल ख़त्म होने पर वही प्रशंसक लापरवाही से सड़क पार करते समय एक गाड़ी की चपेट में आ गया। उसकी दोनों टाँगे कट गईँ। इकबाल जी को पश्चाताप हो रहा था कि मैंने ऐसी बात मुँह से क्यों निकाली। 


23 दिसंबर, 2000 को नूरजहां इस नूरानी जहां को अलविदा कह गईं। करांची में वे अपनी बेटी और दामाद के हसन सरदार के पास थीं, जो कि मशहूर खिलाड़ी थे। दोपहर बाद तबीयत ज़्यादा ख़राब होने पर अस्पताल ले जाते वक्त रास्ते में उन्होंने तम तोड़ दिया।  उनकी पोती  ने भी नौशाद के संगीत निर्देशन में फ़िल्म ताजमहल The Eternal Love Story में acting की थी, लेकिन फ़िल्म कुछ ख़ास चल नहीं पाई।

नूरजहां जी को इस बात का फ़ख्र रहा है कि हिन्दी फ़िल्मों में सलवार-कमीज़  पोशाक का चलन उन्हीं से शुरू हुआ। पंजाबी संगीत प्रेमियों के लिए ये गर्व की बात रही कि उन्होंने पंजाबी फ़िल्मों के लिए सर्वाधिक प्ले बैक किया। 



                         प्रस्तुति  -  नीलम शर्मा अंशु