सुस्वागतम्

समवेत स्वर पर पधारने हेतु आपका तह-ए-दिल से आभार। आपकी उपस्थिति हमारा उत्साहवर्धन करती है, कृपया अपनी बहुमूल्य टिप्पणी अवश्य दर्ज़ करें। -- नीलम शर्मा 'अंशु

15 सितंबर 2010

दूरदर्शन का स्थापना दिवस



आज   15 सितंबर दूरदर्शन का स्थापना दिवस है। आज ही के दिन 1959  में दूरदर्शन का प्रसारण आरंभ हुआ था। 1959  से  1962 तक रिकॉर्डिंग की व्यवस्था न होने के कारण प्रोग्राम लाईव पेश किए जाते थे।


आज बहुत से गैर हिन्दी भाषी व्यक्ति टी. वी. चैनेलस् के धारावाहिको को श्रेय देते हैं कि इनकी वजह से हम हिन्दी सीख पा रहे हैं। लेकिन  इसकी पहल तो दूरदर्शन से हुई। दूरदर्शन ने साहित्य को आम आदमी से जोड़ा। श्रेष्ठ साहित्यिक कृतियो को धारावाहिक रूप में प्रस्तुत किया। दूरदर्शन से प्रसारित पहला धारावाहिक था प्लेटफार्म जिसका निर्देशन गंगाधर शुक्ल ने किया था।  1982 में दूरदर्शन से रंग जुड़े। हमलोग पहला रंगीन धारावाहिक था। 

याद कीजिए, वे दिन भी क्या दिन थे जब हम बेसब्री से चित्रहार, रंगोली और शनिवारी हिन्दी फ़िल्म का इंतज़ार किया करते थे।  

रामायण, महाभारत के वक्त तो लोग घरों में सिमट जाया करते थे,  सड़कें और बाज़ार की दुकानें तक सूनी हो जाया करती थीं।   

आजकल टी.वी. देखने का ज़्यादा वक्त नहीं मिलता, सिर्फ़ समाचार ही देख पाती हूँ। हां, अब भी  हर रविवार को रंगोली ज़रूर याद से देखती हूँ।   



अब तक दूरदर्शन ने 51 वर्षों का सफ़र तय कर लिया है।

21 अगस्त को कोलकाता दूरदर्शन ने अपनी स्थापना के 50 वर्ष पूरे किए। 

आज महान साहित्य शिल्पी शरत चन्द्र का जन्म दिन भी है। 

आज इंजिनियर दिवस भी है। 





प्रस्तुति - नीलम शर्मा अंशु

14 सितंबर 2010

हिन्दी दिवस




हर हिन्दुस्तानी और हिन्दी प्रेमी को हिन्दी प्रेमी को
हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं !



दृश्य – एक


सुबह-सुबह सवा सात बजे कुहु का फोन आया -  ‘बुआ, जै माता दी (वैसे पहले वह जै माता दी ही कहा करती थी और इधर कुछ दिनों से अपने मम्मी-पापा की देखादेखी पैरीपैणा कहना शुरू कर दिया था)  मैं अज्ज स्कूल जा रहीं आं, खाणा लैके। मैंने पूछा, खाणे विच्च की लै के जा रही एं। उसने शायद राईस कहा। (वह इतनी तीव्र गति से बोलती है कि अभी भी उसका स्वर स्पष्ट समझ में नहीं आता)। फिर, कहा, मेरी बस्स आ गई। मैंने कहा, ठीक है, स्कूलों मुड़ के आ के गल्ल करीं।’ तो यह थी कुहु की आज हिन्दी दिवस के दिन स्कूली जीवन के पहले दिन की शुरूआत। बच्चों में स्कूल जाने का कितना उत्साह है। वैसे पहले के ज़माने में हम बच्चों को रोते हुए ही स्कूल जाते और लौटते देखते थे।
 आकाशवाणी पर बजने वाला एक विज्ञापन मुझे बहुत ही अच्छा लगता है -  


सुबह सुबह जब चिड़िया जगतीं,
मेरी मां भी मुझे उठाती,
अभी न उठने को मन करता,
थोड़ा सोने को जी करता।
तब मां मुझे गोद उठाती,
प्यार से मुझे वो समझाती,
पढ़-लिख कर जग में छा जाओ
उठो चलो तुम स्कूल जाओ।
सौ बातों में बात सही है,
स्कूल की ही राह सही है
उठो चलो तुम स्कूल जाओ।


कुहु के स्कूल जाने का मतलब है अनायास ही हिन्दी भी सीख लेना। मैंने भाई से कहा था कि उससे पंजाबी में ही बात किया करो, हिन्दी तो स्कूल जाकर भी सीख लेगी। अपनी ज़बान तो घर से ही सीखेगी। मुझे नहीं याद आता कि हमने हिन्दी और बांगला कैसी सीखी।  
  
कुहु के पापा का जन्म बंगाल में ही हुआ था लेकिन जब वह डेढ़-दो साल का था तब हम पंजाब चले गए थे और वापिस जब प. बंगाल आए तो वह चौथी में पढ़ता था। पढ़ता मॉडल स्कूल में था हिन्दी, अंग्रेजी सब। लेकिन वहां स्कूल में पंजाबी ही बोली जाती थी। परिणाम- स्वरूप उसे हिन्दी में बात करने का अभ्यास नहीं था। जब चौथी में वह वापिस बंगाल आया तो हमारे डैडी के कुलीग्ज़ कहते, अरे पंडित जी आपके बड़े बच्चे तो ठीक हैं, पर छोटे बेटे के साथ तो बात भी नहीं हो पाती। वह हिन्दी बोलता ही नहीं। कमाल है हिन्दी पढ़ता है, लिखता है लेकिन बोलता क्यों नहीं। खै़र धीरे-धीरे उसे फिर से हिन्दी और बांगला बोलने का अभ्यास हो गया।



दृश्य – दो

बंगाल में ‘हिन्दुस्तानी’ का अर्थ हिन्दी भाषी से लिया जाता है। अच्छे-खासे शिक्षित व्यक्ति भी इस शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में करते हैं। मेरे पड़ोस में रहता है नन्हा रिक, उम्र होगी लगभग दस वर्ष की। जब वह छोटा था और स्कूल नहीं जाया करता था, तब मेरे पास अक्सर आ जाया करता था। घर वाले कहते कि तुम पिशीमोनी (बुआ) को तंग करोगे, लेकिन वह ज़िद करके आ जाता। मैं कंप्यूटर पर काम करती और उसके लिए गाने चला देती, वह बैठकर सुनता। उनके घर में उन दिनों हिन्दी का माहौल न के बराबर ही था। फिल्म बंटी और बबली का गीत धड़क धड़क धुआं उड़ाए रे, सीटी बजाए रे उसे बहुत पसंद था। पहली बार गीत सुनकर उसने कहा, पिशीमोनी इसमें रेल चल रही है। मैंने चौंककर पूछा - कहां ? उसने कहा, कंप्यूटर के भीतर। मुझे हैरानी हुई कि उसे हिन्दी नहीं आती लेकिन उसने संगीत से समझ लिया कि रेल चलने की बात हो रही है। वह जब भी आता कहता, वो धड़क धड़क वाला गाना बजाओ। कभी-कभी कहता रेडियो पर भी बजाना हां। मैंने वह गीत उसे कॉपी करके सीडी में डाल कर दे दिया। फिर उसने स्कूल में दाखिला लिया। दूसरी कक्षा से उसके स्कूल में हिन्दी एक विषय के रूप में थी। मैंने देखा कि पहले वह हिन्दी में सवाल पूछने पर समझ लिया करता था और जवाब बांगला मे देता था। स्कूल में हिन्दी पढ़ना सीखने के बाद वह हिन्दी में जवाब भी देने लगा। और कहता है कि मेरी माँ को हिन्दी नहीं आती, मेरी मां मुझसे सीखती है।(उसकी मां अध्यापिका हैं लेकिन स्कूल में कभी हिन्दी नहीं पढ़ी)।

एक दिन मै उसके घर गई तो वह हिन्दी किताब का वर्णक्रम वाला पेज खोले बैठा था। मैंने पूछा, क्या कर रहे हो? उसने कहा अल्फाबेट पढ़ रहा हूँ हिन्दी का। मुझे बच्चों से मस्ती करने में मज़ा आता है, मैंने पूछा वह क्या होता है। उसने कहा, अरे राम यह भी नही जानती। मैंने कहा कि हमें तो स्कूल में नहीं पढ़ाया गया। उसने झट से कहा, ऐसा कैसे हो सकता है, तुम तो इतनी बड़ी हो। मैंने कहा, भई हमारे स्कूल में नहीं पढ़ाया। फिर उसने कहा, लेकिन तुम तो हिन्दुस्तानी हो। मैंने कहा, तुम भी तो हिन्दुस्तानी हो। तब पास बैठी उसका माँ और दादी कहने लगी, ऐसा नहीं कहते। सोचने वाली बात यह है कि उसने यह शब्दावली सीखी कहाँ से? खैर, दरअसल वह कहना चाहता था कि तुम तो हिन्दी में पारंगत हो, हिन्दी में पढ़ाई-लिखाई की है लेकिन उसने भी स्थानीय चलन के हिसाब से हिन्दुस्तानी शब्द का प्रयोग किया। अब वे दोनों भाई हिन्दी पढ़ और समझ लेते हैं तो मैं उन्के जन्मदिन के उपहार के तौर पर उन्हें हिन्दी की राईमस सीडी और कहानियों की किताबें देती हूँ, जिसे उनका परिवार बहुत पसंद करता है कि आप इनके काम की चीजें देती हैं। उन्होंने अभी से मेरे पास देख कर फादर कामिल बुल्के का अंग्रेजी-हिन्दी शब्दकोश और एक हिन्दी शब्दकोश भी खरीद लिया है बच्चों के लिए जो कि जिंदगी भर उनके लिए उपयोगी साबित होगा।


दृश्य – तीन

मुझे जब भी कोई कविता, नज़म या ग़ज़ल अच्छी लग जाती है तो मैं उन्हें डायरी में नोट कर लेती हूँ। हिन्दी दिवस पर ऐंकरिंग के लिए कल रात डायरी के पन्ने टटोले तो इसी क्रम में  हमारे कलकत्ते के कवि, लेखक सेराज खान बातिश जी की यह ग़ज़ल दिख गई। हलांकि यह ग़ज़ल तब से डायरी में दर्ज़ है जब उनसे परिचय भी नहीं था। आईए आप सबकी नजर है वह ग़ज़ल –


शहर के ग़ज़ालों में दिलबरी नहीं मिलती,
दोस्तों में रहकर भी दोस्ती नहीं मिलती।

चुप पड़े अंधेरे में गुम हुए हुनर कितने,
बिन किसी सहारे के नामवरी नहीं मिलती।

कितनी ख़ाक छानी हमने तब ये शेर आए हैं,
बस ग़ज़ल की कोशिश में शायरी नहीं मिलती।

प्यार चाहने वालो ज़िंदगी गंवाओं भी,
दो घड़ी की चाहत में उर्वशी नहीं मिलती।

तुम भरी जवानी में गो कलन्दरी ले लो,
पर जवान उम्रों में सादगी नहीं मिलती।

राम बनके आए हो तो वन गमन ज़रूरी है
रहके सिर्फ़ महलों में ईश्वरी नहीं मिलती।

उसने नागरी पढ़ कर कौन तीर मारा है,
कह दो उससे हिन्दी से अफसरी नहीं मिलती।

हां, हमारे हिस्से का दिन मिला मगर बातिश
काग़ज़ी चिरागों से रोशनी नहीं मिलती।

० ० ०


'उसने नागरी पढ़ कर कौन तीर मारा है, कह दो उससे हिन्दी से अफसरी नहीं मिलती।' बातिश साहब की इन पंक्तियों से मैं सहमत नहीं हो पा रही। आज कल तो हिन्दी पढ़कर अफसरी मिल रही है भले ही वे हकीक़तन इस काबिल हों या न हों। भले ही उन्हें खुद को यह न पता हो कि तूफान आता है या आती है/पुरस्कार मिलता है या मिलती है/ ए. सी. चल रहा है या चल रही है/ सही उच्चारण, विभाग होगा या बिभाग, भाषा होगा या भासा, शहर या सहर। लेकिन साहब अफसरी तो ज़रूर मिल जाती है भले ही लोग डिजर्व करते हों या नहीं क्योंकि हिन्दी की योग्यता वाले कम मिलते हैं न सो अंधों में काना राजा। कई लोग मुझसे सहमत नहीं होंगे, लेकिन यह क़ोरी गप्प भी नहीं है आस-पास के अनुभव से यह जाना है।



ख़ैर, हिन्दी के चाहने वालों को पुन: हिन्दी दिवस की शुभ कामनाएं, लेकिन हिन्दी केवल हिन्दी दिवस तक ही सिमट कर न रह जाए, यह कोशिश भी हमारी ही होनी चाहिए।



- नीलम शर्मा अंशु

07 सितंबर 2010

तसलीमा नसरीन - मेरे विरोधी तलवार लेकर चलते हैं और मैं क़लम लेकर ।



बात 1993-94 की है। मैं उन दिनों मध्यमग्राम (कोलकाता का निकटवर्ती एक उपनगर) में रहा करती थी। कोलकाता में हर जगह उन दिनों तसलीमा नसरीन का ज़िक्र सुनने को मिलता था। यहां तक कि उपनगरीय बनगांव लोकल के महिला कूपे में यह नाम अकसर सुनने को मिलता था। फिर धीरे-धीरे तसलीमा के विषय में विस्तार से जानने का मौका मिला। मैंनें उन्हें पत्र लिख कर ‘लज्जा’ के हिन्दी अनुवाद की अनुमति चाही थी । अचानक नौ महीनों बाद मुझे उनका पत्र मिला जिसके द्वारा सूचित किया गया था कि मेरा कॉपी राईट अमुक प्रकाशक के पास है, आप उनसे संपर्क करें। ढाका में भूमिगत रहने के कारण पत्रोतर में विलंब के लिए क्षमा याचना की थी। जब मैं उनके बांग्ला प्रकाशक से मिली तो पता चला कि हिन्दी अनुवाद हेतु किसी अन्य को अनुमति दी जा चुकी है। ख़ैर ! क्या किया जा सकता था।

........... ऐसे में सालों बाद एक दिना अचानक पता चला कि तसलीमा शहर में हैं और पीयरलेस इन में ठहरी हैं, दो सप्ताह रहेंगी। रोज़ नियमित रूप से सुबह - शाम  पब्लिक बूथ के सिक्के वाले फोन से उन्हें फोन करती। पता नहीं कितने सिक्के खर्च किए। उनका एक ही जवाब होता, अच्छा आप अमुक समय फोन कीजिएगा। उन दिनों मेरे एकाध अनूदित आलेख छपने शुरू हुए थे जनसत्ता में । कोई विशेष पहचान भी नहीं थी मेरी शहर में । मैं सिर्फ एक बार उस महिला को साक्षात़् देखना चाहती थी, जिसने सारी दुनिया में हलचल मचा रखी थी, जिसका नाम सबकी जुबां पर था। मेरे भी धैर्य का जवाब नहीं। मैं रोज धैर्य सहित उन्हें फोन करती। अंतत: जिस दिन वे कलकत्ते से जाने वाली थीं, उस दिन सबह नौ बजे की मुलाक़ात का समय उन्होंने दे ही दिया। (सोचा होगा कि यह कन्या इतने दिनों से डटी है मोर्चे पर तो मिल ही लिया जाए।) साधारण सी उभरती हुई अनुवादक थी, कोई स्थापित पत्रकार तो थी नहीं। ख़ैर निर्धारित समयानुसार अपनी एक दोस्त (मेरी वजह से उसे भी तसलीमा नसरीन को देखने का सुअवसर मिल गया) को साथ ले मैं पीयरलेस इन पहुंची। रिसेप्शन से फोन लगाया तो उन्होंने ऊपर आने के लिए कहा। ऊपर पहुंचने पर लोगों का इतना जमघट देख मैंने अपनी उस दोस्त से कहा, चलो वापस चलते हैं, मुझे नहीं मिलना। उस ने पलट कर कहा, बेवकूफ हो, रोज फोन करती रही, और अब मौका आया है तो वापस जाने की बात करती हो। तब तक कमरे से निकलती तसलीमा दिखीं, आते ही उन्होंने भीड़ की तरफ मुख़ातिब हो कहा, आप में से नीलम शर्मा कौन है, जिन्होंने फोन किया था। और हमें साथ ले कमरे में चली गई। भीतर जाते ही उन्होंने कहा, आज तो आमी चोले जाबो, आमी आमीर जिनिश गुलो गोछाते-गोछाते तोमार सौंगे कौथा बोले निच्छी केमोन ? यानी आज तो मैं वापिस जा रही हूं, मैं अपना सामान सहेज लूं, साथ-साथ हम बातें भी कर लेते हैं।

छूटते ही मैंने उन पर सवाल दागा, अच्छा बताईए तो बांग्ला में 'शुए आछे' का अर्थ क्या है ( मुझे अच्छी तरह बांग्ला आती है, लेकिन उनकी पुस्तक ‘लज्जा’ के हिन्दी अनुवाद के पहले वाक्य का तरजुमा ही ग़लत था, यह बात अनुवादक स्व मुनमुन सरकार से मैंने कभी नहीं कही जो कि मुझसे ज़्यादा अनुभवी रही हैं और उनकी तो मातृभाषा भी बांग्ला थी जबकि मेरी नहीं। अब मौक़ा था तो सीधे लेखिका से मैंने सवाल किया। तसलीमा ने कहा, इसका अर्थ है लेटना। मैंने कहा - बिलकुल सही कहा आपने। लेटा हुआ व्यक्ति सोच-विचार में तल्लीन हो सकता है, सोया हुआ व्यकित क़तई नहीं। उन्होंने कहा, मैं सहमत हूं तुमसे। मैंने कहा आपके अनुवादक ने तो सुरंजन को सुला दिया जबकि वह लेटा हुआ था और अंग्रेजी अनुवाद में भी यही लिखा है Suranjan was sleeping. उन्होने कहा कि हां वह हिन्दी से अंग्रेजी में अनूदित हुआ है, इसलिए वही ग़लती उसमें रिपीट हो गई है। (मुझे नहीं पता इसके बाद हिन्दी और अंग्रेजी वर्जनस् में इस ग़लती को सुधारा गया या नहीं या अब तक इसी तरह प्रकाशित किया जा रहा है।) इस दौरान मैंने देखा कि काम और बातें करते हुए उन्होंने एक के बाद एक कई सिगरेट सुलगाए। (कहां मुझे स्मोक से एलर्जी और कहां चेन स्मोकर तसलीमा। ) यानी यह थी एक आम पाठक  की हैसियत से(चूँकि उन दिनों मैंने पत्रकारिता शुरु नहीं की थी) इतनी चर्चित हस्ती से बगैर किसी बिचौलिए के पहली मुलाक़ात ।

दूसरी मुलाकात हुई, मार्च 2000 को होटल ताज बंगाल में, बकायदा prior appointment लेकर। छह वर्ष पूर्व (1994) में कोलकाता के पीयरलेस इन होटल के कक्ष में जिस तसलीमा नसरीन से मुलाक़ात की थी, आज की तसलीमा उससे कहीं अलग, कहीं ज़्यादा आत्मविश्वास से परिपूर्ण दिखीं। मैंने उनका इंटरव्यू लिया जिसे पंजाब केसरी ने प्रकाशित किया था। इस इंटरव्यू के लिए मुझे देश के कई हिस्सों से पत्र प्राप्त हुए थे। कुछ तो उर्दू में थे । कुछ पत्र तसलीमा नसरीन के लिए मिले जो मैंने तीसरी मुलाक़ात के दौरान उन्हें सौंप दिए थे । यहां तक कि लंदन के ‘अमरदीप वीकली’ ने भी वह इंटरव्यू प्रकाशित किया, जिसके विषय में मुझे लंदन से हिन्दी के जाने-माने लेखक तेजेन्द्र जी ने बताया कि भई वाह, आप तो लंदन में भी छपने लगीं और उसकी कटिंग भी भेजी।

तीसरी मुलाक़ात तो और भी मज़ेदार रही। इस बार वे ग्रेट ईस्टर्न होटल में थीं।  यह मुलाक़ात संभवत: साल भर बाद हुई। हुआ यूं कि मेरे पत्रकार भाई को ‘प्रभात ख़बर’ के लिए उनका साक्षात्कार चाहिए था। संपादक साहब का हुक्म था कि चाहे जैसे भी आपको उनका interview लेना ही है हर क़ीमत पर। भाई ने कई बार ग्रेट ईस्टर्न होटल जहां उन दिनों वे ठहरी हुई थीं फोन लगाया पर बात नहीं बनी। भाई ने मुझसे कहा दीदी, आप बात करके appointment दिलवाईए, आपको तो वे जानती हैं। अंतत: मैंने फोन लगा कर कहा, दीदी मुझे आपसे मिलना है । उन्होंने अगले दिन का समय दे दिया । प्रभात खबर जैसे बड़े और राष्ट्रीय स्तर के अख़बार के पत्रकार को मैंने appointment लेकर दिया । आज वही भाई प्रभात खबर - अमर उजाला से रिपोर्टर का सफ़र तय करते हुए दैनिक भास्कर में चीफ न्यूज़ एडीटर के पद पर आसीन है। अब तो तसलीमा नसरीन कई बार कोलकाता आईं, लेकिन उनसे मिलना अब नामुमकिन सा है । अब तो खुद तसलीमा नसरीन को ही नहीं पता होता कि उन्हें कहां ठहराया गया है । आज की तारीख़ में नीलम शर्मा नाम उनके ज़ेहन में है भी या नहीं, पता नहीं। 

प्रस्तुत है फ्लैश बैक में लौटते हुए पंजाब केसरी में प्रकाशित उस साक्षात्कार के कुछ चुनिंदा अंश
(इस पोस्ट को 31-05-2009  को मैंने लगाया था, कुछ दोस्तों के आग्रह पर  इसे पुन:  लगा रही हूँ।) :-


पांच सितारा होटल ताज बंगाल में दो मार्च 2000 की शाम साढ़े छह बजे उनसे बातचीत का सिलसिला कुछ यूं शुरू हुआ –

0 आज आपका इतना नाम है, लोकप्रियता है, लोग आपसे स्नेह करते हैं। आपके प्रति लोगों में एक अलग सा आकर्षण है, यह सब देखकर कैसी अनुभूति होती है ?

05 सितंबर 2010

शिक्षक दिवस पर शिक्षकों को नमन व शुभकामनाएं !





आज शिक्षक दिवस है,  सभी शिक्षकों को शुभकामनाएं।  

हमारा सबसे पहला गुरु या शिक्षक माँ होती है, उसके बाद फिर स्कूली शिक्षक या अन्य व्यक्ति। शिक्षक कोई भी हो सकता है बस आप में सीखने की ललक होनी चाहिए। एक नन्हें-मुन्ने बच्चे से भी हम बहुत कुछ सीख सकते हैं।   


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शिव बाड़ी प्राईमरी स्कूल








जैसा कि मैंने शुरू में कहा कि पहला शिक्षक मां होती है। हमने भी हिन्दी अपनी मम्मी से सीखी और आज आलम यह है कि हम भाई-बहन उनसे कहते हैं कि मम्मी आपने ही हमें हिन्दी सिखाई और अब आप ग़लत हिन्दी बोलती हैं। वे कहा करती हैं मुझसे सीख                 कर मेरी ही ग़लतियां निकालते हो। 

मैं अपनी ठीक-ठाक हिन्दी के लिए माँ के साथ-साथ अपने अलीपुद्वार जंशन  स्थित प्राईमरी स्कूल के उन अध्यापकों का भी शुक्रिया अदा करना चाहूंगी जिनसे हम भाई-बहन चौथी क्लास तक पढे। उनके साथ आत्मीयता का आलम यह था कि 1975-76 में उस स्कूल से निकल जाने के बाद 1989 में नियु्क्ति पाकर कलकत्ते आने तक नियमित संपर्क बना रहा। वसंत पंचमी के दिन उस स्कूल में सरस्वती पूजा होती थी। उस दिन पूजा भ्रमण के बाद घर लौटते वक्त उनका संयुक्त परिवार हमारे घर होकर जाता क्योंकि साल में एक बार ही सारे सदस्य एक साथ स्कूल के आयोजन में शिरकत करने आते और लौटते वक्त हमारे घर हमसे मिलकर जाते, भले ही रात के नौ या साढ़े नौ क्यों न बज रहे हों।
शिव बाड़ी (शिव मंदिर)

मंदिर से सटा बरगद का पेड़। हमने इसके पके गूलर खूब खाए हैं और
जड़ें किताबों में सहेज कर रखी जाती थीं ताकि विद्या बढ़े।
स्कूल के साथ ही शिव मंदिर है, जिसे शिव बाड़ी कहा जाता है। बचपन में हम मम्मी की उंगली थामे उस मंदिर में जाया करते थे। आस-पास की रेलवे कॉलोनी की महिलाएं मेरी मम्मी को शिव बाड़ी जाने वाली पंजाबी महिला के तौर पर ही जानती थीं। शहर में पंजावी परिवारों की संख्या बहुत कम थी। जब हम बड़े हो गए यानी ग्रेजुएट होने के बाद भी वे लोग हमें कहा करते  थे कि याद है मम्मी की उंगली थाम तुम भाई–बहन मंदिर जाया करते थे। उसी दौरान मैंने भगवान से उसी मंदिर में फ़रियाद की थी कि मुझे भी दीदी कहने वाला कोई छोटा सा भाई या बहन दे दो, मैं दस पैसे और केला चढ़ाऊंगी(तब अपनी पॉकेट मनी इतने की ही इजाज़त देती थी न)। भगवान ने भाई दिया भी और फिर मैंने मंदिर में वो चीज़ें भगवान को अर्पित भी की । बड़ा होकर भाई कहा करता कि भगवान भी कैसा है दस पैसे में तुम्हारी बात मान ली, बड़ा लोभी है भगवान, इतनी सी रिश्वत में मान गया। अभी अगस्त 2010 में बंगाल के अपने जन्म स्थल या गृहनगर अलीपुर द्वार जंशन गई थी लगभग सोलह सालों बाद। उन अध्यापकों के घर जाने का पर्याप्त समय नहीं था लेकिन मैं अपने उस स्कूल भवन के पास से गुज़र कर बचपन की यादें ताज़ा करके आई। उस शिव बाड़ी में मत्था भी टेका और मज़े की बात यह रही कि पुजारी जी (भजु राम) के दर्शन भी हो गए। वे मुझे नहीं पहचान पाएंगे यही सोचकर मैंने उन्हें बताया कि अमुक जगह हमारा घर था, मम्मी के साथ हम मंदिर आया करते थे और आप भी हमारे घर आते थे। उन्होंने पूर्ववत् पीतल का बड़ा सा वही त्रिशूल सर से स्पर्श कर आशीष दी।








अलीपुरद्वार जंशन में कल्याण भईया के घर पर ठहरी थी। मैंने उनसे कहा था कि इतने सालों बाद आई हूँ, समय ज्यादा नहीं है, इसलिए किसी के घर नहीं जा पाऊंगी आप मुझे बाईक पर बस शहर की सड़कों पर घुमा दें और सारे पुराने इलाके, कॉलोनियां फिर से दिखा दें, जहां मैं परिचितों के घरों में आया करती थी ताकि मैं बचपन की यादों की उन गलियों का भ्रमण कर लूं। जब मैंने स्कूल भवन और शिव बाड़ी की तस्वीर ली तो मैंने कल्याण दा से कहा, आप सोच रहे होंगे न कि क्या पागलपन कर रही है यह लड़की। उन्होंने कहा - मुझे पता है, तुम कुछ न कुछ लिखोगी। इसीलिए यह सब कर रही हो।


कल्याण भईया की कमर्शियल में मैं उनसे इंगलिश शॉर्ट हैंड सीखा करती थी। वे 100 की स्पीड में डिक्टेशन देते और कहते 60  की स्पीड में था। 120  की स्पीड में देकर कहते  80 की स्पीड में था। 120 से ऊपर देकर कहते यह मात्र 100  की स्पीड थी।  मेरे साथ वाली स्टुडेंटस कहा करतीं, जानती हो, यह सौ और एक सौ बीस की स्पीड में था। मैं चूंकि आसानी से लिख लिया करती थी इसलिए मुझे यकीन ही नहीं होता था कि यह इतनी हाई स्पीड में था और बाकियों के कई शब्द छूट जाया करते थे। मुझे लगता कि जब हाथ में कोई दर्द नहीं हुआ, और मैंने आसानी से लिख लिया तो स्पीड 60  से ऊपर क़तई हो ही नहीं सकती। अब अपनी उस कला के पीछे छूट जाने का दु:ख तो बहुत होता है। मेरे साथ जो लोग प्रैक्टिस किया करते थे उनमें से किसी का भी मेरी तरह चयन नहीं हो पाया था। यह अलग बात है कि अब स्टेनोग्राफी काफी पीछे छूट गई है। मुझे याद है कि जब उस शहर में एक मात्र मैंने परीक्षा में क्वालीफाई किया था तो शहर में सबको पता चला गया था। छोटे शहरों में रहने के यही फायदे हैं।  फाईनल स्टेनोग्राफी टेस्ट से चार दिन पहले कॉल लेटर मिला था और कल्याण दा मुझे शाम को स्पेशल प्रैक्टिस करवाते थे। एक दिन लिखते-लिखते मेरा हाथ जवाब दे गया, मैंने कहा - आमी पारबो न (मुझसे नहीं होगा)। भईया ने कहा, तुम किए कराए पर पानी फेर रही हो, तुमसे किसने कहा कि तुमसे नहीं होगा। मैंने उन्हें बता दिया कि सीनियर्स में से अमुक ने अमुक से कहा है कि यह तो फट से नर्वस हो जाती है, बेकार ही इस पर इतनी मेहनत की जा रही है, इसके बस का नहीं है, इससे नहीं होने वाला। भईया ने मुझे डांट लगाई - तुम दूसरों की बातों पर ध्यान देती हो, किसने क्या कहा। और जब मेरा चयन हो गया तो उन्होंने मुझे कहा कि तुमने मेरी मेहनत और विश्वास की लाज रखी और मुझे खुशी है कि तुम्हें उन सीनियर्स से पहले नौकरी मिली, सबका मुंह बंद कर दिया। मज़े की बात यह है कि मुझे शहर से इतनी दूर महानगर में नियुक्ति मिली अपनी काबलियत के बल पर और उस सीनियर लड़के को उसके पिता ने उन दिनों बीस हजार रुपए देकर रेलवे में नौकरी दिलवाई उसी शहर में। ऑफिस में ज्वॉयन करने के बाद पता चला कि मैंने पूरे ईस्टर्न जोन में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। ख़ैर अगर उसी शहर में रह जाती तो संभवत: नीलम शर्मा ही रह जाती, अंशु न बन पाती। मैं भी वहीं क्लास लिया करती थी। स्टुडेंट्स मुझसे पूछा करतीं, दीदी कुछ टिप्स दो न, आप कैसे प्रैक्टिस करती हैं। जवाब में कल्याण भईया कहा करते, इसके घर जाकर देखो, इसका एक हाथ दाल के पतीले में कड़छी घुमा रहा होता है और दूसरे में शॉर्टहैंड की बुक। उन दिनों मेरी मां काफ़ी बीमार रहा करती थीं और एक साल के बेड रेस्ट पर थीं। घर के सारे काम मैं ही करती। कल्याण दा कभी-कभी मम्मी का हाल-चाल पूछने आते तो मैं उनसे कहा करती, जाते-जाते आप मुझे दो-चार डिक्टेशन क्यों नहीं दे जाते। इसके बाद से वे घर में आते ही कहते, नोट बुक तैयार रखो। कल्याण भईया मेरे सामने कभी नहीं कहते थे कि तुम बहुत अच्छी प्रैक्टिस करती हो। हाँ कलकते में नियुक्ति के बाद अपने स्थानीय रिश्तेदारों के बच्चों से ज़रूर कहा करते कि इससे स्टेनोग्राफी सीखो यह बहुत एक्सपर्ट है। कल्याण भईया के साथ स्टुडेंट के तौर पर बना रिश्ता बाद में उनके परिवार का अंग बन गया छोटी बहन के रूप में। आज शिक्षक दिवस के अवसर पर उन्हें भी नमन !


भाग्यशाली हूं कि बहुत अच्छी स्टुडेंट तो नहीं थी, लेकिन प्राईमरी, मिशन हाई स्कूल और फिर पंजाब के कॉलेज में अध्यापकों, प्रोफेसरों की नज़र में अलग पहचान अवश्य बनी रही।













































































































अलीपुर द्वार जंशन के निर्मला गर्लस् हाई स्कूल में पांचवी से आठवीं तक पढ़ाई की। वहां भी हिन्दी की अध्यापिका सिस्टर टेरेसा और इंगलिश टीचर हीरामनी टोप्पो बहुत चाहती थीं मुझे। जब मैं आठवीं के बाद पंजाब चली गई और वहां से सिस्टर टेरेसा को ख़त लिखती तो वे मेरे ख़त पूरी क्लास को पढ़ सुनाया करती कि देखो, नीलम की चिट्ठी आई है।  टोप्पो टीचर का तरीका यह था कि क्लास में अगर कोई एक बच्चा किसी शब्द का उच्चारण ग़लत करता तो पूरी क्लास को वह शब्द एक हजार बार कॉपी पर लिखने की सज़ा मिलती। एक बार पूरी क्लास को सिंगुलर और प्लूरल शब्द एक-एक हज़ार बार लिखने की सज़ा दी गई। घर पर मैं लिख रही थी कि  डैडी ने पूछा क्या लिख रही हो। वास्तविकता पता चलने पर उन्होंने लिखने से मना किया। पिता से तो हम भाई-बहन बहुत डरते थे। डर कर मैंने वह काम पूरा नहीं किया। सज़ा का वह काम पूरा न होने के कारण टोप्पो टीचर ने अगले दिन स्कूल की छुट्टी के बाद हॉस्टल के अपने कमरे में बिठाकर वह काम पूरा करवाया। बांग्ला के अध्यापकों में हुआ करते थे शांता टीचर और मदन मोहन डे सर, किंडो सर, तिवारी सर आदि। तो निर्मला गर्लस् के मेरे इन सभी अध्यापकों को भी मेरा नमन।
एकदम बाएं सिस्टर लीना, एकदम दाएं सिस्टर तेरेसा,
जनवरी 2005 को मेरी ग्रेश की शादी के दिन ली गई तस्वीर।
           जाते-जाते एक बात और। मेरी दोस्त मेरी ग्रेस टोप्पो मेरी शॉर्टहैंड की स्टुडेंट हुआ करती थी वहीं अलीपुर द्वार जंशन में कल्याण भईया की कमर्शियल में लेकिन कालांतर में यह रिश्ता दोस्ती में बदल गया। विगत बाईस वर्षों से हम अच्छे दोस्त हैं। उसने मेरे नाम पर अपने बेटे का नाम अंशुमान रखा है।
         
दोस्त मेरी ग्रेस के साहबजादे अंशुमान टोप्पो मिंज (सिलीगुड़ी 16-08-2010)  


 और अब बात करते हैं  सितंबर  की, जी हाँ सितंबर का महीना यानी हिंदी के नाम। 

हिंदी के बारे में कहा जाता है कि इसकी देवनागरी लिपि इतनी वैज्ञानिक है कि जैसे उच्चरित होता है, वैसा ही लिखा जाता है। अंग्रेजी में ऐसा नहीं है, put होता है तो कभी but। हिंदी के साथ बहुत बड़ी सुबिधा यही है कि जैसा उच्चरित होता है वैसा लिखा जाता है। कुछ लोग लिखते वक्त तो शुद्ध हिन्दी लिखते हैं, लेकिन बोलते वक्त चलताऊ रूप में ही बोलते हैं।

मैं हिंदी को हिंदी की तरह ही बोलने की कोशिश करती हूँ। वैसे व्यक्ति जिस प्रदेश विशेष का होता है उसके हिन्दी संबंधी accent से ही उसके उस प्रदेश से संबंधित होने की पुष्टि हो जाती है, स्थानीय शब्द भी उसमें शामिल हो जाते हैं। जैसे बिहार, यू. पी., बंगाल, पंजाब, हरियाणा-हिमाचल और दिल्ली अंचल वालों की पहचान आसानी से हो जाती है।

मैं दावा नहीं करती कि मैं शु्द्ध हिन्दी बोलती हूँ, हाँ सही बोलने की कोशिश करती हूँ। मुझे आवश्यकता या प्रयोजन  जैसे शब्दों के बदले ज़रूरत शब्द का प्रयोग करना अच्छा लगता है। (इसकी क्या आवश्यकता है/ कोई आवश्यकता नहीं)

यहां कोलकाता में जब किसी से नया परिचय होता है तो अक्सर लोग पूछ बैठते हैं कि आप बहुत अच्छी हिन्दी बोलती हैं, आप मूलत कहां की हैं? पलट कर मैं सवाल उछाल देती हूँ कि आप ही बताईए कहाँ की लगती हूँ? लोग बिहार, यू. पी. से आगे नहीं पहुंच पाते। बिहार, यू. पी वाले लोग हम का प्रयोग ज़्यादा करते हैं जैसे – हम गए थे, हम कहे, हम देखे आदि। ज़्यादातर लोग स और श का सही उच्चारण नहीं कर पाते। लिखेंगे भाषा और कहेंगे भासा, लिखेंगे शहर और कहेंगे सहर। (माफी चाहूंगी, लेकिन सच यही है)।

एक बार किसी सम्मेलन में एक राजभाषा अधिकारी ने जवाब में कहा था – हरियाणे की लगती हैं। मैंने कहा, आप बहुत क़रीब पहुंच कर रुक गए। मैं पंजाब से हूँ। उन्होंने कहा, पंजाब वाले इतनी अच्छी हिन्दी नहीं बोलते। वे तो पंजाबी टोन में बोलते हैं।

मुझे याद है, दो साल पहले अमृतसर गई हुई थी और पहली बार किसी से फोन पर बात हो रही थी, हिन्दी में (चूंकि दूसरी तरफ से हिन्दी में शुरूआत हुई थी)। उधर से अंत में कहा गया, यह हिन्दी तो यहां की नहीं लगती। मैंने भी हंस कर कहा, जी हाँ, बिलकुल यहां की नहीं लगती। आप बताईए कहां की हिन्दी लगती है? उन्होंने कहा – दिल्ली की। मैंने कहा – माफ कीजिएगा मैं दिल्ली वालों की तरह मेरे को, तेरे को नहीं कहती। उन्होंने कहा, तो कहाँ की हिन्दी है? मैंने कहा, यह किसी स्थान विशेष की न होकर हिन्दी वाली हिन्दी है। उन्होंने कहा अमृतसर से इतनी अच्छी हिन्दी सुनने को मिल रही है। मैंने कहा आपने बातचीत हिंदी में शुरू की, पंजाबी में करते तो पंजाबी में जवाब मिलता। उधर से कहा गया – एह होई न गल्ल।

मेरा भाई अक्सर फोन करते हुए दूसरों से कहता, परभात खबर से अमुक बोल रहा हूँ। मैं उसे कहा करती कि प्रभात क्यों नहीं कहते। तो वह कहता, अरे लोगों को पता चलना चाहिए न कि पंजाबी पुत्तर है।

एक बार पंजाब के अपने गाँव के पोस्ट मास्टर साहब को मुझे यह समझाने में आधा घंटा लगा कि प्रदीप और परदीप में क्या फर्क है। मैं जब उनसे कहूं कि आप Pradeep/प्रदीप लिखिए तो उन्होंने अंग्रेजी में pardeep लिख कर कहा कि प्रदीप ही तो लिखा है। मजबूरन मुझे उन्हें गुरुमुखी में Spelling लिख कर स्पष्ट करना पड़ा कि यह फ़र्क है।





आज शिक्षक दिवस के अवसर पर, जीवन के इस मोड़ पर आकर, हर उस व्यक्तित्व के प्रति आभारी हूँ, जिन्होंने किसी न किसी तरह से कोई न कोई सीख देने में अहम् भूमिका निभाई है।

साथ ही उन दोस्तों का भी आभार, जिन्होंने मुझे अंतरजाल की इस दुनिया से जोड़ा और आवश्यक मार्गदर्शन किया।


अब तक के इस जीवन में आए सभी शिक्षकों को शुभ कामनाएं।


 प्रस्तुति - नीलम शर्मा 'अंशु'