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17 जुलाई 2010

उपन्यास परिचर्चा

कृति - दिमाग़ में घोंसले

लेखक - विजय शर्मा


कोलकाता, 17 जुलाई की शाम भारतीय भाषा परिषद में जाने-माने लेखक विजय शर्मा के नए उपन्यास ‘दिमाग़ में घोंसले’ पर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया। परिचर्चा की शुरूआत जीवन सिंह के बीज वक्तव्य से हुई। जीवन सिंह ने कहा कि पाँच भागों में विभक्त उपन्यास की कथा-वस्तु का केन्द्र है ब्रजराज। उन्होंने काफ़ी विस्तार से उपन्यास के विभिन्न पहलुओं पर रौशनी डाली। उन्होंने कहा कि यह उपन्यास आज के दिनों में एक महाकाव्य है तथा इसे आम जनता के बीच वृहत्तर जीवन की खोज क़रार दिया।


कवि तथा कथाकार कुशेश्वर ने कहा कि उपन्यास का शीर्षक बहुत ही सटीक है। घोंसले कई तरह के होते हैं लेकिन बया के घोंसले की कारगरी बहुत ही सुंदर होती है। कौवे के घोंसले में कारीगरी नहीं होती लेकिन बहुत कुछ होता है। उन्होंने कहा कि घोंसले जब दिमाग में तैयार होते हैं तो बहुत ख़तरनाक होते हैं। उनमें पूरी दुनिया को समा लेने या मिटा देने की साज़िश होती है।


परिचर्चा को आगे बढ़ाते हुए कला समीक्षक राज्यवर्द्धन ने कहा कि कलकत्ते को लोग हिन्दी समाज का पिछवाड़ा मानते हैं। जब यहाँ से ज्ञानोदय पत्रिका निकलती थी तब ये मुख्य केन्द्र होता था। वैसे आज कलकत्ते की रचनीशीलता बढ़ी है और यह आशा जगाती है कि कलकत्ते में और रचनाशीलता आएगी। उन्होंने कहा कि जिस तरह चित्रकार पिकासो ने चित्रकारी में चीज़ों को गड्डमड्ड कर दिया था उसी तरह ‘दिमाग़ में घोंसले’ में भी चीज़ें आगे-पीछे हो गई हैं। इसकी भाषा काव्यात्मक है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि पाँच भागों में विभक्त कथा-वस्तु अगर पाँच अलग-अलग कहानियां होतीं तो ज़्यादा सशक्त होता। उपन्यास का क्रमबद्ध विकास नहीं हो पाया है।

इसी क्रम में कहानीकार सेराज खान बातिश ने कहा कि उपन्यास ऐसे समय में आया है जब देश में माओवाद चरम पर है। उपन्यास की भूमि भी माओवाद तथा नक्सलवाद है। ‘दिमाग़ में घोंसले’ का ब्रजराज जब जेल से निकल कर आता है तो उसके सामने वह आंदोलन नहीं है। उन्होंने कहा कि उपन्यास कुल मिलाकर फैज़ का एक शेर ही है :-

‘मुकाम फैज़ कोई राह में जंचा ही नहीं
जो कु-ए-यार से निकले तो सु-ए-दार चले।’



प्रो. आशुतोष ने कहा कि उपन्यास, उपन्यास न होकर 96 पृष्ठों का synopsis है। यह उपन्यास बन नहीं पाया। साथ उन्होंने यह भी कहा कि जब ज्ञानरंजन इस पर स्वीकृति की मोहर लगा चुके हैं तो फिर हमारी आलोचना कोई मायने नहीं रखती। ब्रजराज (उपन्यास का केन्द्रीय पत्र) कोई गंभीर क्रांतिकारी नहीं रहा भले ही उसे बीस साल की सज़ा मिली हो। उन्होंने कहा कि क्रांतिकथा में लेखक ने लेख प्रस्तुत किए हैं। कथा को गंभीर रूप से नहीं लिया गया। लेखक की भी अपनी स्वायत्तता है और पाठक की भी। इसका फार्मेट ऐसा है कि पाठक को कथा के साथ बहने नहीं देता। लेखक यह कहता प्रतीत होता है कि मैं उत्तर-आधुनिक लेखक हूँ। मेरा शिल्प अलग है। उन्होंने आगे कहा कि उपन्यास में अंतर्वस्तु कुछ नहीं हैं, शिल्प का प्रयोग है। अभी इस पर एक अच्छा उपन्यास लिखा जा सकता है। यह उपन्यास न बनकर सिनॉप्सिस मात्र रह गया है।

परिचर्चा को आगे बढ़ाते हुए पत्रकार पुष्पराज ने कहा कि भूतपूर्व लेखक कहे जाने के आघात की चुनौती के मद्द-ए-नज़र उन्होंने यह उपन्यास लिखा। यह सिनॉप्सिस है। जिस बंगाल में वे बैठे हैं, वहाँ जो-जो कुछ हुआ वह इतिहास में दर्ज नहीं हो पाया। उपन्यास का शिल्प बहुत अच्छा है। लेखक अपने पात्र के साथ, पात्र की विचारधारा के साथ प्यार करता है। वह अपने पात्र के मौलिक स्वरूप के साथ छेड़-छाड़ नहीं करता लेकिन कई प्रसंगों में लेखक बचता है, हड़बड़ाहट में है। हड़बड़ाहट में नहीं लिखना चाहिए। विजय शर्मा को अंशकालिक नहीं पूर्णकालिक लेखक होना चाहिए। वे इसे प्रतिबद्धता के तौर पर लें।


शरणबंधु ने कहा कि मुझे धूमिल की पंक्ति याद हो आई है :

‘भूख से तनी हुई मुट्ठी का नाम नक्सलवाद है।’


विस्तार से चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि चीज़ों को देखते हुए गुज़र जाना, उसमें इन्वॉल्व न होना, चीज़ों को क़तई पूर्णता नहीं देता। उन्होंने कहा कि लेखक का रोमांटिक मिजाज़ पूरी तरह से उपन्यास में उभर कर आया है। लेखक के पास काफ़ी कच्चा माल है। कच्चे माल का भविष्य में और भी गहराई से प्रयोग हो तो बेहतर है।


आलोचक-समीक्षक हितेन्द्र पटेल ने अपनी बात रखते हुए कहा कि हिन्दी के नए/युवा लेखकों को पुराने मानदंड से मापा और पुराने चश्मे से देखा जा रहा है। उन्होंने कहा कि उपन्यास का सिनॉप्सिस होना ही उसकी यूनिकनेस है। कथावस्तु 1967-69, 1981 और 2007 तक की है। इसमें उस कालखंड, मोबाईल तथा एस.एम.एस का फ्यूज़न तैयार किया गया है। और इस तरह इसके स्पेक्टरम से जो प्ले तैयार होता है वह चमत्कारपूर्ण है। इस किताब के बहाने हिन्दी में बहस छेड़ी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि हिन्दी वालों ने प्रयोग नहीं किए, अगर किए भी तो उन्हें समझने वाले आलोचक या समीक्षक नहीं मिले। इसके टेक्सट को बारीक़ी से समझे जाने की ज़रूरत है। उन्होंने आगे कहा कि कोई लकीर खींच देना आसान है। लकीर हमारे लिए सीमा-रेखा बन जाती है, लेकिन ज़रूरत है कि नई रेखा खींची जाए तभी रचनात्मकता का सम्मान होगा। विजय शर्मा में चिंगारी तो है लेकिन निष्ठा की कमी है। उनके कथामानस का हार्ड डिस्क कोमल है। पृष्ठ संख्या 58 से 61 तक में इसके दर्शन होते हैं। उनके मन में कई तरह की ज़िद है जिसे स्थापित करने के लिए उन्होंने जो सॉफ्टवेयर लगा रखा है, वह किसी विशेष वर्ग के प्रति व्यक्तिगत ख़ार को दर्शाता है। लेखन में इतनी स्पेस होनी चाहिए कि नया रास्ता दिखाई दे। विजय शर्मा के जीवन के अनुभव वाले प्रसंग बहुत बेहतरीन बन पड़े हैं।

इलाहाबाद से पधारे वरिष्ठ लेखक शेखर जोशी ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि मैं यह देखकर अभिभूत हूँ कि परिचर्चा में अपने साथी की रचना पर सबने पूरी नि:संगता के साथ, ऑब्जेक्टिविटी के साथ अपनी अनुभूतियों को व्यक्त किया। उन्होंने उपन्यास के कथानक के विषय में कहा कि यह वह कालखंड था जब आज़ादी की लड़ाई के बाद पहली बार छात्र, अध्यापक और बौद्धिक लोग सड़कों पर उतर आए। यह आज के माहौल में एक मार्गदर्शक चीज़ है। अगर लेखक ने कुछ भी हमें ऐसा दिया जो उस युग का आभास देता है तो यह हमारे लिए गर्व की बात है। आज बहुत कम लोग उन चीज़ों पर उजास डालते हैं। उन्होंने कहा कि जो विचार आयातित होते हैं उन्हें हम खाँचों में बिठाने की कोशिश करते हैं जबकि लेखक अपने हिसाब से प्रयोग करता है। यह स्वागतयोग्य है।

अंत में विजय शर्मा ने उपस्थित सबके प्रति आभार व्यक्त किया। परिषद के निदेशक डॉ. विजय बहादुर सिंह ने परिचर्चा का संचालन किया। परिचर्चा के दौरान शहर के गण-मान्य साहित्य प्रेमी पाठक उपस्थित थे।

प्रस्तुति : नीलम शर्मा ‘अंशु

17-07-2010, 11.59PM

15 जुलाई 2010


































हैप्पी बर्थडे इन्दु !



जी हाँ, यही कहना चाहूँगी इन्दु से। बार-बार दिन ये आए, बार-बार दिल ये गाए - तुम जीओ हज़ारो साल। आप भी सोच रहे होंगे कि भला ये इन्दु है कौन ? चलिए बताए देती हूँ, इन्दु वही... अरे ! वो राजनीति के ज़रिए जो प्रदेश की मुख्यमंत्री बनती है। यानी क्यूट - क्यूट कैट.... आई मीन.....कैटरीना कै़फ़।



आज है 15 जुलाई, रात के नौ बजने वाले हैं और कल है कैटरीना का जन्म दिन। सुबह चूँकि जल्दी निकलना है और लौटते-लौटते वही शाम के सात-आठ बजेगें। तो ऐसे में ब्लॉगिंग के ज़रिए कैटरीना को विश करने में तो देर हो जाएगी। हाँ, यह अलग बात है कि AIR FM Rainbow पर तो सुबह नौ बजे कोलकातावासी FM प्रेमियों के साथ मिलकर विश तो कर ही लेंगे।


ख़ैर ! 16 जुलाई 1984 को हॉंगक़ॉंग में जन्मी थीं कैटरीना। मात्र चौदह वर्ष की उम्र में ज्वैलरी के लिए मॉडलिंग शुरू की। ऐसे में 2003 में हिन्दी फ़िल्म बूम में काम करने का ऑफर मिला तो उन्होंने बंबई का रुख किया। 2007 में प्रदर्शित नमस्ते लंदन उनकी पहली major हिट रही। फिर तो हमको दीवाना कर गए, पार्टनर, युवराज, वेलकम, अपने, रेस सिंग इज़ किंग, ब्लयु, अजब प्रेम की ग़ज़ब कहानी वगैरह...वगैरह के बाद अब आई राजनीति। दो और फिल्में दिसंबर तक प्रदर्शित होंगी। अब तक कुल सतरह हिन्दी, दो मलयालम और एक तेलगु फिल्म कर चुकी हैं वे। मैंने उनकी फिल्म पहली बार देखी - राजनीति। चर्चाएं तो काफ़ी रहीं। इस फिल्म में निभाए किरदार से उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार की उम्मीद भी है। ख़ैर, छोटे-छोटे कई पुरस्कार तो मिल चुके हैं परंतु कोई उल्लेखनीय पुरस्कार अभी तक उनकी झोली की शोभा नहीं बढ़ा पाया। हमारी शुभकामनाएं उनके साथ हैं। कल की सालगिरह से शुरू हो रहा उनका नया साल उनके लिए और भी मंगलमय हो। यही दुआ है दिल से।


प्रस्तुति - नीलम शर्मा 'अंशु'













































13 जुलाई 2010






1. पुरी रथ - यात्रा
2-3. कोलकाता के भवानीपुर अंचल की रथ-यात्रा की झल्कियां।

आप सबको रथ यात्रा की हार्दिक शुभ कामनाएं !
















11 जुलाई 2010

' कभी ज़िन्दगी में किसी के लिए मत रोना
क्योंकि वह तुम्हारे आँसुओं के काबिल नहीं होगा........
और वह जो इसके काबिल होगा
 तुम्हें कभी रोने नहीं देगा......
'

जिन दिनों हम टालीगंज में रहा करते थे(1996-2004), उन्हीं दिनों एफ. एम. ज्वॉयन किया था। 120 कवार्टरों वाली बिल्डिंग में हम चौदहवीं मंज़िल पर रहते थे। कोई नहीं जानता था कि ये एफ. एम. पर आती हैं। दरअसल कभी कोई पूछता भी तो मैं इन्कार कर देती कि नहीं वो मेरी आवाज़ नहीं है। ऐसे ही एक लड़का छठी-सातवीं में पढ़ता था, वह हमारे घर अख़बार दिया करता था। उसे किसी तरह पता चल गया। अब जिस दिन वह अख़बार देने आता (क्योंकि रोज़ अलग-अलग लड़के आया करते थे), घंटी बजाकर मम्मी से कहता, दीदी से पूछ कर बताईए न कि अगला प्रोग्राम किस दिन है। मैं उसे कहती, अरे पढ़ाई किया करो। प्रोग्राम वगैरह के चक्कर में मत रहो। तो वह कहता, मेरी पढ़ाई का नुकसान मैं नहीं करता, मैं आपके प्रोग्राम से पहले या बाद में पढ़ाई कर लेता हूँ। फिर हमने दिसंबर 2004 में ठाकुरपुकुर इलाके में शिफ्ट किया। यही कोई साल या डेढ़ साल पहले सुबह-सुबह एक दिन साईकिल पर तफ़रीह के लिए जा रही थी तो पास से गुज़र रहे एक युवक ने पुकारा, नीलम दी। रुक कर उसकी तरफ देखा, लंबा-चौड़ा सा युवक। परंतु चेहरा क़तई जाना-पहचाना नहीं लगा। उसके चेहरे पर स्माईल थी। उसने कहा – चीनते पारले न तो (नहीं पहचाना न।) मैं अमुक। आपके घर अख़बार दिया करता था। आप इस इलाके में.....? आजकल इधर रहती हैं क्या ? मेरे पूछने पर कि आजकल क्या करते हो तो उसने कहा, अब मैं इंवनिंग कॉलेज में बी.ए. फर्स्ट ईयर में हूँ, पढ़ाई के साथ-साथ काम भी करता हूँ। मैंने कहा, अब तो देखने में तुम मेरे दादा (भईया) लगते हो, इतने बड़े हो गए हो। कैसे पहचानूं। वैसे भी इतने सालों में वह मेरे ज़ेहन से निकल चुका था। ख़ैर.... उसने मुझे पहचाना क्योंकि बड़ा तो वह हुआ था, (मेरे ज़ेहन में तो उसके बचपन की सूरत ही थी)। मेरे हिसाब से मेरी शक्ल में तो कोई बदलाव नहीं आया। हाँ, यह अलग बात है कि बहुत से लोग कहते हैं कि पहले की तुलना में मेरी पर्सनैलिटी बहुत बदल गई है। तो चलिए धन्यवाद उन दोस्तों का, जिनकी सोहबत में यह बदलाव आया होगा (कहते हैं न, मैन इज़ नोन बाय द कंपनी ही कीप्स)। उस बच्चे ने मुझे पहचाना। अरे.... अरे, हो सकता है अब उसे बच्चा कहलवाना पसंद न आए। ऐसे ही वह मुझे अब भी आते-जाते रास्ते में मिल जाता है, कभी-कभी मेट्रो स्टेशन पर भी। कहता है दीदी, मैं तुम्हें रोक कर बात कर लेता हूँ, तुम बुरा तो नहीं मानती न ? मेरा मोबाईल नंबर ले रखा है। एस. एम. एस. और फोन भी कर लेता है। अक्सर कहता है - दीदी, प्लीज़ कोई सैड सॉन्ग सुनवाना। और प्रोग्राम की डेट बता दिया करें। मैं कहती हूँ, मुझे सैड सॉन्ग सुनवाना क़तई पसंद नहीं। ये क्या बात हुई कि सबको मनोरंजन के नाम पर सैड कर दो। जब तक स्क्रिप्ट की बहुत ज़्यादा माँग न हो, मैं सैड सॉन्ग नहीं रखती। बच्चे हो, अभी से कौन से दु:खों का पहाड़ टूट पड़ा ? उसने कहा, नहीं ज़िंदगी में बहुत दु:ख देखे हैं। मैंने कहा, अभी तो बहुत बड़ी ज़िंदगी बाकी है, अभी से हार गए तो कैसे चलेगा। उसके एस. एम. एस. भी सैड होते हैं। मैंने उसे मना किया, एस.एम.एस.भेज कर पैसे मत बर्बाद किया करो, क्योंकि मेहनत की कमाई है उसकी तथा साथ-साथ वह पढ़ाई भी तो करता है। यानी अभी जीवन में स्थापित होने के लिए संघर्षरत है।उसकी माँ ने अकेले ही उसकी परवरिश की है । आज भी  पिछले प्रोग्राम से पहले मैं तैयारी कर रही थी तो उसके एक के बाद एक पाँच मैंसेज आए। 02 जुलाई को जब मैं मुहम्मद अज़ी़ज़ पर प्रोग्राम कर रही थी तो उसका मैसेज आया, दीदी तुमने बताया ही नहीं लेकिन देखो मैं तुम्हारा प्रोग्राम सुन रहा हूँ।


लेकिन, आज सुबह बस यूं ही कंप्यूटर पर काम करते-करते अचानक किसी बात पर आँखें नम हो आईं (बहुत ही इमोशनल हूँ न, ये दिल है कि मानता ही नहीं, यह जानते हए भी कि मुझ जैसे लोग आज की सोसायटी में मिसफिट हैं)। अचानक उसी वक्त मोबाईल का एसएमएस बीप बज उठा। देखा 9. 25 पर उसी नीलकमल का एस. एम. एस. था। नीलकमल बंगलाभाषी है, लेकिन इलैक्ट्रॉनिक मीडिया की बदौलत यह पीढ़ी हिन्दी भी सीख गई है। एस. एम. एस. रोमन हिन्दी में था, लिखा था –


' कभी ज़िंदगी में किसी के लिए मत रोना
क्योंकि वह तुम्हारे आँसुओं के काबिल नहीं होगा........
और वो जो इसके काबिल होगा
वो तुम्हें कभी रोने नहीं देगा......
'


और मेरे होठों पर मुस्कान खेल गई कि अनजाने में ही कितने सही वक्त पर पहली बार उसने कितना माकूल मैसेज भेजा ( कहाँ तो मैं उसे कहा करती हूँ कि मैसेज भेजने में पैसे बर्बाद मत किया करो)। ख़ैर ! आँखें नम होने की वजह चाहे जो भी रही हो लेकिन मैंने तुरंत आँखे पोंछ डाली।


एक दिन मैंने उसे ऑफिस में बुलवाया और उसे यह आलेख पढ़वाया। चूँकि उसने संस्कृत पढ़ी है तो जोड़-जोड़ कर धीरे-धीरे हिन्दी का यह आलेख भी उसने पढ़ लिया। बातों के दौरान उसने फिर कहा कि मुझे सैड सॉंग बहुत पसंद है, तुम प्रोग्राम में सुनवाती ही नहीं हो। मैंने उससे कहा कि देखो मेरा प्रोग्राम ज्यादातर सुबह नौ बजे होता है, सुबह-सुबह लोगों को सैड स़ॉंग सुनवाना उचित नहीं लगता। फिर उसने कहा कि नहीं जिंदगी में इतने दु:ख देखे हैं और उसने बताया कि किस तरह उसके पिता ने उसकी माँ से लव मैरिज करने के बावजूद दूसरी गृहस्थी बसा ली और उसने झिझकते हुए बताया कि उसकी माँ आज भी लोगों के घरों में काम करती हैं। मैंने उससे कहा कि इसमें शर्मिंदगी की क्या बात है ? कोई भी काम छो़टा नहीं होता, बल्कि उन्होंने स्वाभिमान से सर उठाकर तुम्हारी परवरिश की है। कहाँ तो उसके एसएमएस ने एक दिन मेरे आँसुओं पर विराम लगवाया था और कहाँ उस दिन वह भावुक होकर मेरे पास रो पड़ा। बंगाल में अड्डा का चलन है और मुझे बड़ी हैरानी हुई जब उसने कहा कि मेरे बहुत कम दोस्त हैं। मैं अड्डा नहीं मारता। काम से लौट कर घर पर बैठ कर पढ़ाई करता हूँ य़ा फिर टी.वी. देखता हूँ और रेडियो सुनता हूँ। साथ ही उसने यह भी कहा कि, दीदी आमी कोनो दिन भालोबेशो बिए कोरबो न(यानी मैं कभी लव मैरेज नहीं करूंगा)।

02 जुलाई 2010

रेनबो पर मु. अज़ीज़




दृश्य - 1

आज सुबह एफ. एम. रेनबो पर मु. अज़ीज़ साहब पर एक घंटे का और गोल्ड पर 45 मिनटों का प्रोग्राम पेश किया। रेनबो पर अक्सर हमारे कॉलर दोस्त हम लोगों से कहा करते हैं, प्लीज़ मु. अज़ीज़ साहब का अमुक एक गाना बजा दें तो अच्छा लगेगा। खुश हो जाऊंगा। यानी अपने कलकत्ते के इस कलाकार से लोग कितनी मुहब्बत करते हैं......कि मैं तेरी मुहब्बत में पागल हो जाऊंगा, मुझे ऐसा लगता है..... तो कहाँ तो दोस्त एक गीत सुनवा देने की इल्तज़ा करते हैं और मैंने तो आज दोनों कार्यक्रमों में सिर्फ़ और सिर्फ़ मु. अज़ीज़ के गीत बजाए। चूँकि मैं उनकी फैन तो नहीं हूँ लेकिन कलाकारों के जन्मदिन या पुण्यतिथि के मौके पर उन्हें याद करना अच्छा लगता है। रेनबो में फोन पर बातें भी हुईं और आठ गीत बजे एक घंटे में और गोल्ड के पैंतालीस मिनटों में कुल सात गाने बजे यानी कुल 15 गीत मु. अज़ीज़ साहब के नाम। कॉलर दोस्त बहुत जोश में थे। मैंने चाहा था कि अज़ीज़ साहब को भी फोन पर पेश किया जाए, दोस्तों से इल्तज़ा कर-कर के लाईन भी छुड़वाई कई-कई बार कि प्लीज़ आप थोड़ी देर बाद कोशिश करें तब मैं अज़ीज़ साहब को फोन पर ले लूं। जनाब दोनों फोन की लाईनें इस क़द्र बिज़ी आ रही थीं कि बस पूछिए मत। एक ने छोड़ी लाईन कि तुरंत दूसरा हाज़िर, उसे मनाया कि तीसरा हाज़िर। ख़ैर हमारे दोस्तों ने बहुत सहयोग किया लेकिन स्टुडियो के फोन से मैं उनसे बात नहीं कर पाई। अपने मोबाईल से रिंग करके मैंने उनसे कहा था कि आप तैयार रहें, मैं आपसे दस मिनटों में बात करती हूँ। खैर....


प्रोग्राम के बाद रेडियो स्टेशन से निकल कर मैंने फोन करके उनसे माफ़ी मांगी। जवाब में पता है उन्होंने क्या कहा ? कहा - नीलम जी मैं बहुत गिल्टी फील कर रहा था कि शायद मेरी तरफ से कोई गुस्ताखी हो गई है जो आपने फिर फोन नहीं मिलाया। सोचिए ऐसी विनम्रता। मैंने उन्हें बताया कि फोन पर बहुत से दोस्तों ने आपको जन्म दिन की बधाईयां दी और जिनके फोन नहीं मिले उन्होंने एस.एम. एस. द्वारा शुभकामनाएं दीं।

निमाई हालदर ने गड़िया से।


रामबालक ने हुगली से लिखा - दिल की गहराईयों से विश कर रहा हूँ।


मोनिका ने लिखा - होठों पे हंसी, आँखों में नमी, तुम तो खुदा की अमानत हो, हैप्पी बर्थ डे टू यू।


बार-बार दिन ये आए। लिखा - बुलटी ने।


सबीर सलीम ने भी मैसेज भेजा।

यानी कुल मिलाकर मुझे भी मज़ा आया परफॉर्म , आत्म संतुष्टि भी बहुत बड़ी चीज़ होती है। चूंकि तबीयत कल से नासाज़ है लेकिन मन अच्छा था और वैसे भी आज बहुत दिनों के बाद शाम को अंधेरा घिरने से पहले ही घर में एंट्री हो गई थी, तो आते-आते रास्ते में दृश्य - 2 की तुकबंदी सूझ गई। तुकबंदी ही है शायद। कविता या ग़ज़लें तो मेरे बस की बात नहीं।


दृश्य - 2


एक दिन किसी की दस्तक पर
दरवाज़ा खोला, कहा - सुस्वागतम् !
कानों में हौले से आवाज़ गूंजी - जी शुक्रिया !
पर अगले ही पल
'गुलज़ार' की नज़्म की तर्ज़ पर
यूं लगा, मानो ख़्वाब था।
हाँ ख़्वाब ही तो था शायद
जो रात के अंधेरे में, नींद के आगोश में

चुपके से दस्तक देता है
और सुबह के उजाले में
उड़नछू हो जाता है।


- नीलम शर्मा ' अंशु '

01 जुलाई 2010


की बोलछे, बोलछे की ? 
हैप्पी बर्थडे टू मी....

(पार्शव गायक मुहम्मद अज़ीज़)


"गायकी मेरा पेशा ही नहीं, 
बल्कि मैं इससे मुहब्बत करता हूँ।"



कभी-कभी जब कोई मुराद अनायास ही पूरी हो जाती है तो लगता है न कि अरे भगवान से यह मांगा होता तो अच्छा होता। 30 जून, रात सवा नौ के लगभग मु. अज़ीज़ साहब का नंबर मिलाया। सोचा, दो जुलाई को उनका जन्मदिन है तो इसी सिलसिले में बात कर लेते हैं। फोन मिलाते ही मैंने पूछा - किस शहर में हैं, तो उन्होंने कहा बंबई में हूँ लेकिन कल (यानी 1 जुलाई) कलकत्ते जा रहा हूँ। मैंने जब शाम को मिलने की बात कही तो उन्होंने बड़ी सहजता से कहा, आ जाईएगा। पता बताया और जब मैंने कहा कि ऑफस से निकलने के बाद शाम छह के बाद ही पहुंच पाऊंगी तब भी उन्होंने बहुत सरलता से कहा, सात-साढ़े सात जब मर्जी़ आईए, मैं घर पर ही रहूंगा। और इस तरह शाम के छह बजकर बीस मिनट तक मैं उनके घर पहुंची। रास्ते में ही पता चल गया था कि बिजली गुल है। ख़ैर दस मिनटों तक बिजली भी आ गई और हमने पूरे डेढ़ घटे तक बात-चीत की। लगभग पौने आठ बजे उनसे विदा ली। और इधर तबीयत का यह आलम कि मत पूछिए। पूरे पौने नौ बजे घर पहुंची। तबीयत नासाज़ लग रहीं थी इसलिए घंटा भर आराम करने के बाद रिकॉर्ड की गई बातचीत को नोट भी करना था, बलॉग के लिए भी और 2 जुलाई की सुबह एफ. एम. के लाईव प्रोग्राम के लिए भी। इस वक्त रात के डेढ़ बज रहे हैं। ख़ैर, मैंने अपना काम ख़त्म कर लिया। पेश है मु. अज़ीज़ की कहानी उन्हीं की ज़बानी :-

‘बचपन से ही बड़ा शौक था, गायकी का, इसी कारण पढ़ाई-लिखाई में भी दिल नहीं लगता था। और, वे मुहम्मद रफ़ी साहब का बचपन से ही बहुत दीवाना रहा हूँ, फैन रहा हूँ । उनके गाने गुनगुनाता था, गाता था। स्कूल के फंक्शनों में हिस्सा लेता था और काफ़ी प्राइज़ जीते। स्कूल में मैं गायकी की वजह से पॉपूलर था, पढ़ाई की वजह से नहीं।’ यह कहना है, जाने-माने पार्श्व गायक, मुहम्मद अज़ीज़ का। 2 जुलाई 1954 को कोलकाता के खिदिरपुर अंचल के शाह अमान लेन स्थित पुश्तैनी घर में जन्म हुआ, हर दिल अज़ीज़ - मुहम्मद अज़ीज़ का। खिदिरपुर मुस्लिम जूनियर हाई स्कूल और सी.एम. ओ. हाई स्कूल से उनकी स्कूलिंग हुई। इसके बाद उमेश चन्द्र कॉलेज में बी. कॉम के लिए दाखिला लिया और सेकेंड ईयर के बाद पढ़ाई छोड़ दी। तब तक मैं गायकी में काफी नाम कमा चुका था। अक्सर रातों को प्रोग्राम होते थे, रात भर जगने के कारण सुबह कॉलेज समय पर नहीं पहुंच पाता था। नियमित नहीं जा पाता था। घर वाले चाहते थे कि मैं पढ़ू, लेकिन वे भी भली भांति जानते थे कि मेरी आवाज़ कैसी है। मुझे गॉड गिफ्टेड म्युज़िकल सेंस काफ़ी था, बचपन से ही। साधारणत: लोग तालीम लेकर जितनी समझ हासिल कर पाते हैं उतनी मुझे बचपन से ही हासिल थी, जो कि कुदरती थी। बहुत कठिन-कठिन गीत गाता था मैं रफ़ी साहब के। बचपन में झांकते हुए बताते हैं मु. अज़ीज़। फिर छोटे-मोटे आर्केस्टरा में गाने लगे। आर्थिक दिक्कतें होने के कारण और परिवार के बड़े बेटे के तौर पर पारिवारिक ज़िम्मेदारियों को निभाने के लिए कलकत्ते को होटलों में भी गाना पड़ा। ब्ल्यु फॉक्स में गाया, जो कि पार्क स्ट्रीट में था। उन दिनो होटलों का माहौल भी बहुत अच्छा होता था। आज की तरह नहीं, काफ़ी चीप है आज। कुछ वेजेटेरियन होटलों में भी गाने की व्यवस्था होती थी। मैंने विनीत में गाया, इलियट रोड के ग़ालिब में गाया। फिर स्टेज प्रोग्रामों में काफ़ी शोहरत हासिल की, अपना ऑर्केस्टरा ग्रुप भी बनाया। इस तरह गायकी की शुरूआत तो हुई लेकिन वे बहुत एंबिशियस थे, इसलिए गायकों और साज़िन्दों की भीड़ वाली ज़मात में वे खुद को अकेला महूसस करते । उन्हें ऐसा लगता था कि अपना वक्त ज़ाया कर रहे हैं, ग़लत जगह पर ग़लत लोगों के साथ काम कर रहा हूँ। 'लक्ष्य तो ले देकर बंबई फिल्म इंडस्ट्री था। उन दिनों रफी़ साहब सक्रिय थे। मुझे उनकी क्वालिटी का अंदाज़ा था। मैं उन्हीं के गाने गाया करता था। इसलिए हिम्मत भी नहीं कर पाया जाने की। तिसपर घर की ज़िम्मेदारियां थी, माता-पिता थे, सात भाई-बहनों में पाँच मुझसे छोटे थे। फिर 1980 में रफ़ी साहब गुज़र गए तो लगा कि मैं अब क्या गाऊँ, किसके गीत गाऊं ? पुराने गाने लोग कितने दिन सुनेगें, मुझे कुछ करना चाहिए। फिर बहुत मुश्किल से हिम्मत जुटाई और बंबई जा पहुंचा फरवरी 1982 में। दस महीने वहाँ रहा कुछ नहीं बना। फिर डेढ़-दो महीनों के लिए वापस आया तो दोस्त बड़ा मज़ाक उड़ाते थे। कहते- आ जाओ वापस यहाँ, होटल और स्टेज में गाना गाओ। इसमें मुझे बहुत हत्तक और बेईज्ज़ती महसूस होती थी। ऐसे में मैंने दोस्तों से चैलेंज कर लिया कि अब मैं आऊंगा तो कामयाब होकर वर्ना मेरी लाश आएगी वहाँ से। इस बार जो गया तो काफ़ी सीरियसली कोशिश की। दो-चार छोटी-छोटी फिल्मों में गाया।' एक फ़िल्म थी अंबर और उसका बंगला वर्शन था ज्योति। दोनों ही वर्शन में बनी आशीष राय निर्देशित यह फ़िल्म बतौर हीरो प्रसेनजीत और बतौर गायक मुहम्मद अज़ीज़ की यह डेब्यू फ़िल्म थी। यह थी शुरूआत। बताते हैं अज़ीज़। मान-मर्यादा, सस्ती दुल्हन मंहगा दूल्हा जैसी कई छोटी-छोटी फिल्में आईं पर उनसे कोई ख़ास फ़ायदा नहीं हुआ। इसके बाद आई मनमोहन देसाई निर्देशित अमिताभ बच्चन की मर्द। इस फिल्म के गानों ( हम तो तंबू में बंबू और मैं हूं मर्द टांगे वाला) से मैं क्लिक हो गया कहते हैं मु. अज़ीज़। यह रहा उनका पहला ब्रेक। उन दिनों एक ही ग्रुप के साजिन्दे कई जगहों पर बजाया करते थे। उन्होंने अलग-अलग जगहों पर जाकर कहा, कलकत्ते से एक लड़का आया है, क्या कमाल गाया है उसने। इस तरह माउथ पब्लिसिटी मिलने लगी और वे बिज़ी होते चले गए। फिर आई गिरफ़्तार। इसमें उन्होंने पहली बार आशा जी के साथ डुयेट गाया। किशोर दा के साथ भी इसमें एक डूयेट गाया। बाप्पी दा के संगीत निर्देशन में बहुत बड़ी पिक्चर थी यह, कहते हैं मु. अज़ीज़। जे. ओम प्रकाश जी की फ़िल्म थी – आख़िर क्यों - एक अंधेरा लाख सितारे गीत था उसमें मेरा। यूं एक के बाद एक फ़िल्में आती गईं। बस फिर क्या था कभी राजेश रौशन तो कभी बाप्पी दा तो कभी आर. डी. बर्मन के साथ काम कर रहा होता।


मैंने अठारह भाषाओं में 12 हज़ार से ज़्यादा गाने गाए हैं, कहते हैं अज़ीज़। हिन्दी फिल्में मेरी हैं साढ़े चार सौ के क़रीब। उन दिनों एक फिल्म में चार-पाँच गाने होते थे जो मैं गाता था। आज मीडिया का दौर है। उन दिनों मीडिया नहीं था इसलिए मुझे मीडिया का सपोर्ट नहीं मिला। आजकल फेस वैल्यू है – एक बार टीवी पर आ गए तो लोग पहचान गए। लेकिन मुझे लोगों को बताना पड़ा कि वो रामलखन का गाना मैंने गाया, खुदा गवाह मैंने गाया, क्योंकि लोग फेस से मुझे नहीं जानते थे। खु़दगर्ज़, नगीना, निगाहें, आख़िरी रास्ता, अमृत, नाम, कर्मा जैसी एक से बढ़कर एक फिल्मों में गाने का मौका मिला। कुल मिलाकर काफ़ी लोकप्रिय और बढ़िया गीत मेरे हिस्से में आए। नदीम श्रवण तक संगीत का वो एक खूबसूरत पीरियड था।

मुझे इस बात की खुशी है कि मैने लता जी, आशा जी से लेकर, श्रेया घोषाल, सुनिधि चौहान तक के साथ गाया। किशोर दा से लेकर सोनू निगम तक के साथ तथा नौशाद साहब से लेकर संजीव दर्शन तक के संगीत निर्देशन में गाया। दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन से लेकर शाहरुख खान तक के लिए गाया। यानी तीन-तीन चार-चार पीढ़ियों के लिए मैंने गाया मुझे इस बात की खुशी है। मजरूह साहब से लेकर आज के शब्बीर अहमद तथा समीर के लिखे गीत गाए। लक्ष्मीकांत साहब का मैं फैवरिट रहा। रफ़ी साहब, मैं जिनका फैन रहा हूं, जिनको अपना गुरू मानता हूँ, आदर्श मानता हूँ, जिनके गाए हुए गाने गाकर मैं गायक बना, एक समय ऐसा आया कि मैंने श्रद्धांजलि के तौर पर उनके लिए गाया। श्रद्धांजलि स्वरूप जो गीत लिखा गया उनके लिए उसे गाने का मौक़ा मुझे मिला।(न फ़नकार तुझसा तेरे बाद आया, मुहम्मद रफ़ी तू बहुत याद आया)। उड़ीसा में बहुत पॉपूलर हैं वे। पांच हज़ार से ज़्यादा गीत गाए हैं उन्होंने ओड़िया में। ओड़िया गीतों में 60% गीतों के वे गायक रहे हैं।

उन्होंने हर मज़हब के डिवोशनल गीत गाए हैं, जिनमें सांई बाबा, गुरुबाणी, शिवजी, कृष्ण, दुर्गा माँ के भजन शामिल हैं। मुस्लिम डिवोशनल्स में कव्वालियों-मनक़बत(सूफ़ी गीत) सौ से ज़्यादा एलबम हैं। ग़ज़लों के एलबम भी हैं जिनमें खुशबु और क़शिश काफ़ी लोकप्रिय रहीं।

गोविन्दा का पहला म्युज़िकल हिट मय से न, मीना से न, साक़ी से दिल बहलता है मेरा आपके आ जाने से भी मेरा ही गाया हुआ है। अनिल कपूर का सबसे हिट गाना, जिस गाने से स्टेज पर उन्हें इन्ट्रोड्यूस किया जाता है, वन टू का फोर फोर टू का वन भी मेरा ही गाया हुआ है।

यूं तो सर्जक को अपनी सर्जना का हर पहलू अज़ीज़ होता है लेकिन फिर भी बात अगर अपने गाए गीतों की हो तो मुहम्मद अज़ीज़ साहब को फ़िल्म अमृत का, दुनिया में कितना गम है और आख़िर क्यूं का एक अंधेरा लाखों सितारे बेहद पसंद हैं।

ज़िंदगी के हसीन लम्हे के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं, अक्सर मैग्जीन में लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, कल्याण जी आनंद जी, आर. डी. बर्मन की तस्वीरें देखता था मैंने उनके साथ काम किया, उनका फेवरिट बना, ये सब हसीन लम्हे ही तो हैं। यादगार है, कभी भुला नहीं सकता। एक हो तो बताऊं, बेइंतिहा हैं। एक ज़माना था लता जी, आशा जी के गाने सुनता था और सोचता था क्या पता इनको कभी देख भी पाऊंगा या नहीं, बाद में मैंने उनके साथ खड़े होकर गाने गाए और उनसे वाह-वाह भी मिली। उनके साथ वर्लड टुअर किए।


कलकत्ते के शाह अमान लेन स्थित पुश्तैनी मकान 145 बरस पुराना है। उनके परदादा दिल्ली से यहाँ तशरीफ़ लाए थे। मकान के सामने हज़रत शाह सूफ़ी मुहम्मद अमान अली साहब का मज़ार भी है जो कि उनके परदादा थे। बहुत बड़े वली थे। दादा भी अरबी-फ़ारसी के आलिम थे और 24 परगना के सबसे बड़े काज़ी(मैरिज रजिस्ट्रार) थे। बेहद सीधी-सादी फैमिल रही है हमारी। हलांकि मैंने मज़बूरी में बार में भी गाना गाया। म्युज़िक लाईन में रहा। बहुत बड़े-बड़े ऐय्याश लोगों की सोहबत में रहा लेकिन मैंने आजतक एक बूंद शराब की नहीं चखी कहते हैं मु. अज़ीज़।

अज़ीज़ साहब अपनी बेगम के बारे में ज़ोश-ओ-ख़रोश से बात करते हुए बताते हैं कि वो कलकत्ते की ही हैं, मेरे मुहल्ले की ही। मुझसे बहुत छोटी है, मैंने अपने सामने उन्हें क़दम-दर-क़दम बड़ी होते देखा है। मुझे बेहद पसंद थीं, मैंने उनके घरवालों को प्रपोजल दिया, और शादी हो गई। दो प्यारे-प्यारे बच्चे हैं, एक बेटी और बेटा। बेटी बड़ी है, बहुत सुरीली है, बहुत अच्छा गाती है, बहुत अच्छा कंपोज़ करती है। मुझे उम्मीद है कि कभी मौक़ा मिला तो काफ़ी बुलंदियों तक जाएगी। बेटा बहुत छोटा है, चौथी का छात्र है। कभी कहता है कि संगीत के फील्ड में जाऊंगा तो कभी कहता है क्रिकेट में। धोनी का वह ज़बरदस्त फैन है। बताते-बताते मु. अज़ीज़ कहते हैं कि ‘धोनी अगर सुन रहे हों तो बता दूं कि मेरा बेटा हिंदुस्तान में शायद सबसे बड़ा आपका फैन है। जब भी आप खेलते हैं तो वे टीवी के सामने चिल्लाता है, भाई तेरा जवाब नहीं भाई।’ वह उन्हें भाई बोलता है। जब हम उसे चिढ़ाने के लिए धोनी की बुराई करते हैं तो बहुत गुस्सा जाता है, रोने लगता है। जब हम कहते हैं कि सचिन के सामने धोनी बच्चा है तो भी वह गुस्सा हो जाता है।

परफ़ॉरमेंस के सिलसिले में अलग-अलग देशों में घूम चुके मु. अज़ीज़, पसंदीदा जगह के बारे में पूछे जाने पर कहते हैं, सौ फीसदी हिंदुस्तान। यहां की अलग-अलग आबोहवा, अलग-अलग वैरायटी है, कल्चर अलग, ज़बान अलग होते हुए भी सबके सब संगीत प्रेमी है। हिंदुस्तान की हर जगह से मुझे इतना प्यार मिला हैं कि क्या बताऊं। मुझे परफार्म करते वक्त गाने चुनने की ज़रूरत नहीं पड़ती पब्लिक सामने से बोलती जाती है, यह गाईए। मैं गानों की लिस्ट तैयार नहीं करता, पब्लिक ही यह काम करती है।

हमारी लाईन में बहुत मैनीपुलेशन चलता है, बहुत चालाकी चलती है, सिर्फ़ अच्छा गाने से ही आदमी कामयाब नहीं होता है इंडस्ट्री में। उसे अपनी मार्केटिंग करनी चाहिए। आजकल मार्केटिंग का ज़माना है। जो मैं नहीं कर सका। शायद मुझमें ही कोई कमी होगी जो मैं अपनी मार्केटिंग नहीं कर पाता। हाँ लेकिन कभी-कभी लगता है कि मैं जिस कैलिवर का हूँ या लोग मुझे जिस स्टैडर्ड पर देखना चाहते हैं वह मुझे नहीं मिला, अगर मिला भी तो आहिस्ता-आहिस्ता वैनिश हो रहा है।

पुरानी पीढ़ी में उनके पसंदीदा कलाकार हैं दिलीप कुमार, धरम जी और अमिताभ बच्चन। आजकल के बारे में पूछने पर वे कहते हैं कि उस दौर जैसी बात नहीं रही। किसी फ़िल्म में किसी एक का काम अच्छा लगता है तो किसी और फ़िल्म में किसी और का। अच्छे सब्जेक्ट वाली फ़िल्में अच्छी लगती हैं, कास्टिंग ज़्यादा मायने नहीं रखती जैसे गजनी में आमिर अच्छे लग गए तो माई नेम इज़ खान में शाहरुख।

मुझे कॉमेडी बहुत पसंद है। ख़ासकर गोविंदा, मुझे लगता है कि वे फिल्म इंडस्ट्री के स्पॉनटेनियस एक्टर हैं। इतने नेचुरल और लाईवली एक्टर बहुत कम होते हैं।

अवॉर्डस के बारे में वे बताते हैं कि रामलखन, ख़ुदगर्ज़ और अमृत फिल्मों के लिए तीन बार फिल्म फेयर के अवॉर्डस के लिए नॉमीनेट होने के बावजूद चूक गए। कलकत्ते से 2008 में मदर टेरेसा इंटरनेशनल अवॉर्ड मिला। बतौर गायक ज्ञानी जैल सिंह जी से प्रेसीडेंट अवॉर्ड प्राप्त किया। जर्नलिस्ट के क्रिटिक अवॉर्ड बहुत मिले। बंबई का आशीर्वाद अवॉर्ड तीन बार मिला। बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट अवॉर्ड प्राप्त किया तीन बार। गायकी मेरा पेशा ही नहीं, बल्कि मैं इससे मुहब्बत करता हूँ। कहते हैं मुहम्मद अज़ीज़।


अंत में यासीन सय्यद साहब की पंक्तियां कोट करना चाहूँगी, जो कि अज़ीज़ साहब के कमरे में पड़ी तस्वीर पर अंकित हैं। वही तस्वीर, जो आप ऊपर आलेख में देख रहे हैं : -



' हर दिल अज़ी़ज आप हैं, और नाम है अज़ी़ज़
हर दिल में जो है नक्श, वो आवाज़ है अज़ीज़
दुनिया ने बहुत चाहा के, रख दे मिटा के नाम
वो कैसे मिटे जो के हो, मालिक को भी अज़ी़ज़।'


०००००


प्रस्तुति - नीलम शर्मा 'अंशु'



26 जून 2010


जाने-माने संगीतकार राहुल देव बर्मन साहब का आज( जून 27) जन्म दिन है, समवेत स्वर उन्हें सलाम करता है।



25 को जाने माने संगीतकार मदन मोहन साहब का जन्म दिन था। एफ. एम. रेनबो पर उस दिन मेरा प्रोग्राम था। मैंने जून में जन्में हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री के मुख्य-मुख्य कलाकारों को लेकर एक घंटे का प्रोग्राम किया। सोचा था एफ. एम गोल्ड वाले कार्यक्रम में पूरा प्रोग्राम मदन मोहन साहब पर करूंगी। गोल्ड पर उस दिन सुबह वाघा बॉर्डर से क्वींस बेटन रिले का प्रसारण दिल्ली केन्द्र से हो रहा था। रिले प्रोग्राम ख़त्म होने के बाद मेरे हिस्से केवल पंद्रह मिनट का वक्त आया जिसमें तीन -चार विज्ञापन भी बजने थे। तो सिर्फ़ तीन ही गीत बज पाए, मदन मोहन साहब पर जिस तरह प्रोग्राम मन ही मन तय किया था, समय की कमी के कारण सिरे नहीं चढ़ पाया।


अब याद करते हैं अन्य कलाकारों को -

6 जून - सुनील दत

6 - गीतकार राजेन्द्र कृष्ण
8 - डिंपल कपाड़िया, शिल्पा शेट्टी
13 - गीतकार-संगीतकार प्रेम धवन
15 - सुरैय्या
16 - मिठुन चक्रवर्ती
22 - अमरीश पुरी
23 - राज बब्बर
25 - करिश्मा कपूर
30 - कल्याण जी संगीतकार