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02 जून 2011

हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह ।



गुलाम अली साहब की गाई ग़ज़ल - हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह, सिर्फ़ इक बार मुलाकात का मौका दे दे, मुझे उनकी दूसरी ग़ज़लों की तरह बेहद पसंद है।  ग़ज़ल में भले ही मुलाक़ात का मौका मांगा गया हो लेकिन हमसे तो यही कहा जाता रहा है कि कभी हमें भी मेज़बानी का मौका दीजिए। 


समझ में नहीं आता कि कहाँ से शुरू करूं।

अभी-अभी फेस बुक पर विनोद मौदगिल जी ने मीठा सा उलाहना दिया कि  गर्मी का आनंद  लेकर वापस जा रही हैं, हिमाचल अच्छा नहीं लगता क्या

जालंधर में रहते हुए भी सारा-सारा दिन हिमाचल का शिमला वार्तालाप में अनायास ही शामिल रहा। जालंधर में कदम रखते ही टीना ने कहा, दीदी इस बार आपके लिए एक लॉन्ग जर्नी का सरप्राइज है पता नहीं आपके भाई ने आपको बताया या नहीं। पूछने पर उसने कहा कि शायद शिमला जाना हो सकता है।  घर आने पर भाई ने बताया कि शिमला के कार्यालय के संपादन का काम संभालने के लिए दफ्तर की तरफ से आठ-दस दिनों के टुअर का प्रस्ताव है। चूंकि बेटी की समर वैकेशन चल रही है तो दफ्तर वालों ने कहा कि फैमिली को भी लेते जाओ। मैंने पूछा -  जाना कब है। उसने कहा - बुधवार। मैंने कहा मेरी शुक्रवार की वापसी है जालंधर से। बुधवार जाकर फिर शुक्रवार को लौटना, पहाड़ी इलाके का ऐसा सफ़र मैं नहीं कर सकती। एक दिन में क्या घूमना होगा। मैं तो नहीं कर सकती इतनी रोड जर्नी। 

हालाँकि  कुछ दिनों पहले विनोद जी ने कहा भी था कि चंडीगढ़ आने का प्रो. हो तो बताईएगा लेकिन मुझे पता था कि चार दिनों के ट्रिप में चंडीगढ़ जाने के आसार नहीं बन पाएंगे। हाँ, इतना तो पक्के भरोसे के साथ कह सकती हूँ कि अगर मेरा प्रो. बनता तो पूर्व सूचना पाकर वे कम से कम मिलने के लिए कुल्लु से चंडीगढ़ तक का सफ़र  ज़रूर कर लेते।

मुझे याद है दिसंबर में वे कोलकाता आए थे। और मैं शहर में नहीं थी। शनिवार  देर  रात एयरपोर्ट से घर पहुंची थी। रविवार को ढेर सारे काम मेरा इंतज़ार कर रहे थे।  और सोमवार की सुबह एफ. एम. पर लाइव प्रो. भी होना था। मुझे तब तक नहीं पता था कि मैं प्रो. में क्या करने वाली हूँ, कौन से गीत बजाऊंगी। ऐसे में सुबह फिर से विनोद जी का फोन आया कि आप अगर मैनेज करके मिलने आ जाएं तो बहुत अच्छा रहेगा, फिर पता नहीं कब कोलकाता आना हो। वे एक सेमीनार में आए थे। खैर, दोपहर 1.30 उनके सेमीनार स्थल आई.टी.सी सोनार बांगला में मिलने पहुंची। सेमीनार के सभागार के  बाहर खुले में लगी कुर्सियों पर बैठ हम बात-चीत कर रहे थे हिन्दी में। थोड़ी देर बाद उनके मोबाइल पर एक फोन आया। उन्होंने पंजाबी में बात की। बात ख़त्म होने के बाद मैंने भी पंजाबी में बात की तो उन्हें सुखद आश्चर्य हुआ। अरे, आप पंजाबी हैं? बाद में उन्होंने अपने दो और साथियों से मिलवाया तो वे भी बहुत खुश हुए कि चलो कलकत्ते में कोई पंजाबी बोलने वाला तो मिला। साढ़े चार-पौने पांच बजे उन लोगों से विदा ली और फिर घर आकर प्रो. की तैयारी की और अगले दिन सुबह बढ़िया सा प्रो. किया।

ऐसे ही 11 दिसंबर को बोधिसत्व जी का फोन आया कि आज आपके शहर में हूं, शाम को भाषा परिषद में प्रो. है, हो सके तो मिल लीजिए। अगली सुबह मुझे दिल्ली की फ्लाइट पकड़नी थी और तड़के चार बजे घर से निकलना था।  फिर भी उस शाम को पांच बजे परिषद जाकर उनसे मुलाकात की और चूँकि प्रो. शुरू होने में देर थी इसलिए लगभग पौने सात बजे उनसे यह कह कर विदा ली कि सिर्फ आपसे मिलने की ख़ातिर आई हूँ, सुबह मुझे जल्दी निकलना है, इसलिए अब इजाज़त चाहूंगी। 

लेकिन मुझे पता था कि इस बार चंडीगढ़ प्रवास का सबब नही बन पाएगा। इसलिए विनोद जी को पूर्व सूचना नहीं दी। उन्हें ही क्यों और भी बहुत से दोस्तों को मैंने नॉक तक भी नहीं किया।

सिर्फ़ अमृतसरवासी भूपिन्दर सिंह जी को फोन पर उनकी सेवानिवृत्ति की शुभ कामनाएं दीं (आजकल मैं उनके विभाग में भी नहीं हूं।) और बेदी साहब से बात हुई, उन्होंने कहा भी कि कल शाम मिल लीजिए, डिनर हमारे यहाँ ही करते हैं। इसके पहले जब-जब जालंधर आना हुआ उनसे हमेशा मुलाकात की। इस बार एक तो समय कम तिस पर गर्मी में गर्म-सर्द होकर जुकाम और हल्का सा बुखार भी हो गया। इसलिए भी घर से निकलने का मन नहीं बना। और कुछ दूसरे दोस्तों की  यादों की वजह से भी मूड ख़राब रहा।

हालाँकि हाथ की पांचों उंगलियां बराबर नहीं होती। पिछली बार, एक बार आई थी तो पूर्व सूचना के बावजूद 'कभी हमें भी मेजबानी की मौका दीजिए' कहने वाले किसी एक दोस्त ने मिलना तो दूर फोन तक नहीं किया। जबकि वह दिन उसी के नाम कर रखा था। मेरी एक आदत है, मेरे क़रीबी जानते हैं कि मैं एक जुमला अक्सर इस्तेमाल करती हूं कि मांगना मेरी फितरत नहीं। फिर भी यह मानते हुए कि दोस्ती में सफाई मांगने की ज़रूरत नहीं होती लेकिन फिर भी कभी-कभी सफाई मांगना और देना नितांत ज़रूरी हो जाता है। अपने आत्मसम्मान को ताक पर रख कर सब कुछ भुला कर तथा उससे उम्र में बड़े होने के  फर्ज़  को निभाते हुए यह सोच कर  कि क्षमा सोभती बड़ेन को, छोटन को उत्पात,  लौट कर उसे कई बार फोन किया था पर उसने बात नहीं की। इस बार यहां आकर भी फोन करके पूछा कि आखिरी बार पूछ रही हूँ, बात करनी है या नहीं, उधर से फोन काट दिया गया। इसे तो यही कहा जाएगा न कि चोरी और सीनाजोरी। गलती और चूक भी आपकी तरफ से और बातचीत बंद भी आपकी तरफ से। मैंने तो बड़े होने के नाते कई बार बात करने की कोशिश की लेकिन लोग चूक भी करते हैं, माफी तो भूल ही जाईए, चूक के लिए सफाई तक देने की ज़रूरत भी नहीं समझी जाती।  

इस बार भी ऐसा ही एक वाक्या और।  

एक और दोस्त से जब भी फोन पर बात होती, यही पूछा जाता, आप पंजाब कब आ रहे हो। ज़रूर मिलना। मैं कहती  फिलहाल तो कोई प्रोग्राम नहीं। प्रोग्राम बना लऔ ना, सानूं मिलन आ जावो। ऐसे ही एक बार फिर पूछा गया, आप कब आ रही हैँ।  मैंने बताया कि अमुक तारीख को जा रही हूँ लेकिन आपका इलाका मेरे रूट में नहीं पड़ता, मैं तो केवल चंडीगढ़ या जालंधर तक ही जाती हूँ।  तो कहा गया, ठीक ए, असीं चंडीगढ़ मिलन आ जावांगे। फिर मैंने कहा सोचा -  चलो मैनेज करते हैं और 20 दिनों पहले बता दिया कि तीन जून की मेरी वापसी है उस दिन मिल लेते हैं फिर अमुक स्टेशन से आप मुझे मेरी निर्धारित ट्रेन में चढ़ा दीजिएगा।  

खैर, उन्हें आज शाम किसी को छोड़ने दिल्ली जाना  है। यानी पूर्व सूचना के बावजूद प्राओरिटी नहीं बदल सकी। हालांकि उनको मैंने पिछले अनुभव के बार में बता भी दिया था।  8.28 मिनट हो रहे हैं मुझे पौने सात बजे की ट्रेन से चलकर साढ़े नौ, दस बजे तक उनके शहर पहुंचना था फिर रात को वहीं से अपनी ट्रेन ले लेनी थी। उनके शहर का टिकट मैंने कैंसेल भी नहीं करवाया। यूं ही रख छोड़ा है। मैं ये दावा या घमंड नहीं करती कि दोस्ती निभाना कोई हमसे सीखे। फिर भी पंजाब के अपने ये दो दौरे नाखुशगवार ही रहे। ये दो अनुभव बहुत अच्छे नहीं कहे जा सकते। खैर, भावनात्मक चोटें खाने के बाद भी आदमी न  संभले तो क्या कहेंगे। मुझे भी अच्छी तरह पता है कि इन दो झटकों के बावजूद मेरा स्वभाव तो बदलने से रहा। यानी हम फिर से तत्पर हैं, आ बैल मुझे मार। मेरी समझ में यह भी नहीं आता कि मेरे ही साथ ऐसा क्यों होता है।

 चार महीने पहले वाला झटका अभी तक नहीं भूली कि ऊपर से यह दूसरा।

कह तो देते हैं लोग कि आपकी नेचर बहुत अच्छी लगती है। बहुत अच्छा स्वभाव है आपका। लेकिन, अक्सर लोग सहजता और विनम्रता का ग़लत आकलन करते हैं। मेरी आदत है कि मैं किसी से भले ही मिल न पाऊँ लेकिन एक फोन ज़रूर कर देती हूं कि आपके शहर से गुज़र रही हूं। न भी बताया जाए तो किसी को क्या पता चलता है। लेकिन इन दो अनुभवों से सबक लेकर इस बार फोन भी बहुत कम किए। 

हाँ, सभी लोग एक से नहीं होते, तभी तो विनोद मौदगिल जी ने मीठा सा उलाहना दिया कि गर्मी का आनंद लेकर वापसी हो रही है, हिमाचल अच्छा नहीं लगता क्या ?   विनोद जी, पहला कटु अनुभव तो हिमाचल वालों की वजह से ही हुआ और दूसरा पंजाब का।  फिर भी वादा रहा कि कभी आपके कुल्लु को आगामी प्रो. शेडयूल में  ज़रूर शामिल करूंगी। 



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4 टिप्‍पणियां:

  1. सोचा था मुलाक़ात होगी दोस्तों के साथ
    ये हो न सका दोस्त मेरे हैं बडे मसरूफ

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  2. यह भी एक संयोग ही है कि इस वक्त कोलकाता वापसी के दौरान मेरे साथ वाली सीट पर बैठा बच्चा गुनगुना रहा है - बड़े चेते आंउदे ने, यार अनमुल्ले, हवा दे बुल्ले। मैंने उससे पूछा के आपने यह गाना कहाँ सुना। उम्मीद थी कि वह कहेगा टी. वी. पर। परंतु जवाब मिला मैं फिरोजपुर में रहता हूँ। ये बच्चा यानी शुभम उपाध्याय क्लास टू में पढ़ता है और उस वक्त अपने गृहनगर बनारस जा रहा है। उसकी गुनगुनाहट ने फिर से दोस्तों की यादें ताज़ा कर दी।

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  3. भावनाओं की कद्र इस दुनिया में कम ही लोग जानते हैं तभी लोग रिश्ते तो बना लेते हैं पर उन्हे निभाना बहुत मुश्किल होता है - इसी ब्लॉग पर पिछली एक पोस्ट के संदर्भ में पवन शर्मा जी ने यह टिप्पणी की थी।

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