सुस्वागतम्

समवेत स्वर पर पधारने हेतु आपका तह-ए-दिल से आभार। आपकी उपस्थिति हमारा उत्साहवर्धन करती है, कृपया अपनी बहुमूल्य टिप्पणी अवश्य दर्ज़ करें। -- नीलम शर्मा 'अंशु

31 दिसंबर 2013

22 नवंबर 2013

लोग इतना कुछ याद कैसे रख लेते हैं………..।

लोग इतना कुछ याद कैसे रख लेते हैं………..


मुझे बहुत हैरानी होती है कि लोग इतना कुछ याद कैसे रख लेते हैं। मुझे तो याद नहीं रहता। किसी नए व्यक्ति से अगर लगातार मुलाकातें न होती रहें तो मैं तो भूल ही जाती हूँ। आज शाम मेरे ऑफिस के कैंपस में अचानक किसी ने पीछे से आवाज़ दी (बांगला में) मैडम कैसी हैं ? लिहाज़ ज़रा सी चाल धीमी हो गई, पीछे मुड़कर देखा और पलट कर पूछा -  आप कैसे हैं ?
उन्होंने कहा, आपने मेरी बात का जवाब नहीं दिया। मैंने कहा, बहुत अच्छी हूँ। फिर उन्होंने पूछा, पहचाना?

मैंने यूं ही रस्मी तौर पर पूछ लिया कि आप आजकल किस ऑफिस में हैं। जवाब में उन्होंने  कहा - आजकल हल्दिया में हूँ । (दफ्तर का नाम मुझे भूल भी गया।) मैंने कहा, ट्रांसफर हो गया क्या दरअसल मैंने उन्हें हमारे लेखा नियंत्रक कार्यालय का स्टाफ समझ लिया था इसलिए मन ही मन सोचा कि वहाँ भी दफ्तर की शाखा है क्या फिर उन्होंने पूछा, आप आजकल मध्यमग्राम में ( समीपवर्ती एक उपनगर, तब कोलकाता के उत्तर 24 परगना जिले में पड़ता था, अब कोलकाता ही कहलाता है।) ही रहती हैं अभी भी। मध्यमग्राम का नाम सुनकर लगा कि ये तो कोई पुराने परिचित हैं। फिर उन्होंने कहा, याद है वो भारतीय भाषा परिषद में मुलाकात हुई थी। अब भी जाती होंगी आप। उनके मुँह से भारतीय भाषा परिषद का नाम सुनकर तो उनका चेहरा बिलकुल भी परिचित सा नहीं लगा बल्कि यह स्पष्ट हो गया कि ये हमारे लेखा नियंत्रक कार्यालय से नहीं हैं। फिर उन्होंने पूछा, लिखना-लिखाना कैसा चल रहा है। मैंने रस्मी तौर पर ही जवाब दिया कि बस ठीक-ठाक। फिर सोच कर मैंने कहा कि मुझे बिलकुल याद नहीं आ रहा, आप अपना नाम बताईए। नाम बताया तो नाम भी जाना-पहचाना नहीं लगा फिर भी मैंने पूछा - कहीं आप वे ही तो नहीं, जो मेरे पास हिन्दी की कविताएँ ऐडिंटिंग के लिए लाया करते थे। वे बांगलाभाषी होकर हिन्दी में कविताएं लिखा करते थे उन दिनों। हालांकि कविताएं लिखने का शौक तब मुझे नहीं था, उनकी कविताओं की वर्तनी वगैरह मैं सुधार दिया करती थी जब भी दो-तीन हफ्तों बाद या महीने भर बाद वे मेरे पास लेकर आते।  फिर अचानक उन्होंने आना बंद कर दिया। हो सकता है उसी दौरान उन्होंने हल्दिया में ज्वॉयन कर लिया हो। जब उन्होंने कहा कि हाँ वही हूं, तो मैंने कहा, अगर आपके पास वक्त हो तो चलिए सीट पर चलकर बैठ कर बात-चीत की जाए। उसी क्रम में उन्होंने बताया कि आपने मुझे गुलज़ार साहब का गीत क़तरा-क़तरा मिलती है बांगला में अनुवाद करके दिया था। यानी ये 1994-95 की बातें थीं। तब मैं वर्तमान नौकरी के साथ जनसत्ता के लिए फ्रीलांसिग किया करती थी और अपनी एम. ए. की पढ़ाई और पंजाबी पुस्तकों के लिए भाषा परिषद के पुस्तकालय में जाया करती थी। यानी जनाब से मुलाकात लगभग 17-18 बरसों बाद हो रही थी। बात-चीत में उन्होंने बताया कि आजकल डोंगरी टू दुबई पुस्तक पढ़ रहा हूँ, इसके बांगला अनुवाद के लिए सोच रहा हूँ। आप हिन्दी में करेंगी (उन्हें मेरे अनुवाद कार्य की जानकारी नहीं थी)। मैंने कहा, आजकल अभी इतना वक्त नहीं है, पहले वाला काम पूरा करना है, उसी के लिए समय नहीं मिल रहा है।)  फिर कहा, अब भी तरह-तरह की पत्रिकाएं खरीदता रहता हूँ। फिर उन्होंने याद दिलाया कि उन दिनों आप संजय दत्त का इंटरव्यु करने वाली थीं। फिर कहा मुझे गुलज़ार बहुत पसंद हैं, उनकी कविताएं, शायरी, गीत। मैंने कहा कि मैंने उनका भी इंटरव्यु किया था। फिर मैंने बताया कि आपने क़तरा-क़तरा की बात कही कि मैंने आपको उसका बांगला में अनुवाद करके समझाया था और आजकल मैं श्रोताओं को गीत भी सुनवाती हूं एफ. एम. पर। इतने सालों के बाद मुलाक़ात और बात-चीत के बाद उन्होंने कहा, आपने बहुत प्रगति कर ली है काम के सिलसिले में। मैंने कहा, कि आपने नॉक किया मैं तो पहचान ही नहीं पाती, हाँ कभी-कभार सोचा करती थी कि कविताएं लेकर आऩे वाले उस शख्स ने अचानक आना क्यों छोड़ दिया। उन दिनों फोन और मोबाइल भी नहीं हुआ करते थे। आज वे हमारे कैंपस में विदेश व्यापार के कार्यालय में अपने दफ्तर के काम से आए थे और उधर से मुझे गुज़रते देख आवाज़ दी थी। उन्होंने कहा, आपका व्यक्तित्व ही याद रखने वाला है। फिलहाल बरसों बाद इस तरह अचानक ज़िंदगी की कैसेट रिवांइड हो गई। फोन नंबरों का आदान-प्रदान हुआ और उन्होंने कहा कि कोलकाता आने पर समय मिला तो मुलाकात हुआ करेगी। मेरी अनूदित किताबें देख उन्हें हैरानी हुई और कहा बहुत अच्छा लग रहा है देखकर। मैं आपको एक किताब के अनुवाद के लिए कह रहा था, आपने तो पहले से ही कई कर रखी हैं।  हाल ही दैनिक जागरण के दीपावली विशेषांक की मेरी कहानी देख उन्होंने कहा, इसे मैं ले जा रहा हूँ, पढूंगा और इसका मैं बांगला में अनुवाद भी करूंगा। तो इस तरह एक अनुवादक को अनुवादक भी मिल गया।

और मैं सोच रही थी कि कि लोग इतना कुछ याद कैसे रख लेते हैं………..

(बंगाल में बंगालियों के बीच गैरबांगलाभाषी, और तिस पर पंजाबी होने का फायदा बचपन से ही मिलता रहा है। लोगों का आकर्षण बना रहता है अरे, ये तो पंजाबी हैं।  एक तो लोग आसानी से याद रखते हैं, नाम भी। उत्तर भारत में तो नीलम नाम बेहद कॉमन है, पर बंगाल में नहीं। इसका भी फायदा मिलता है। अभी पिछले महीने जब कश्मीर जाना हुआ तो दिल्ली में हमलोग करोलबाग से लौट कर अपने होटल जा रहे थे तो किसी ने पीछे से नीलौम कह कर आवाज़ दी। नीलम कहा होता तो शायद पलट कर नहीं देखती क्योंकि वहाँ नीलम नाम तो किसी और का भी हो सकता था पर नीलौम उच्चारण तो किसी बांगलाभाषी का ही हो सकता था इसलिए स्वभाविकरूप से पलट कर देखा तो अपने ही सहकर्मियों को सपरिवार वहाँ पाया जो कि कश्मीर से लौट रहे थे और हम जाने वाले थे। जिन्होंने आवाज़ दी थी, उन्होंने कहा कि मैंने तुम्हारी शक्ल नहीं देखी थी बस पीछे से ही देखकर आवाज़ दे दी थी। मैंने भी कहा कि उम्मीद नहीं थी कि ऑफिस के लोग यहाँ मिल जाएँगे सिर्फ अपने नाम का बांगला उच्चारण सुनकर ही पीछे मुड़कर देखा था कि हां यह आवाज़ मेरे लिए ही है।)  

– नीलम शर्मा अंशु

02 नवंबर 2013

आप सभी   को समवेत स्वर की ओर से दीपोत्सव की हार्दिक 

शुभकामनाएं। सबका जीवन सदैव जगमग करता रहे।






20 सितंबर 2013

जन्मदिन पर विशेष

मल्लिका-ए तरन्नुम : नूरजहाँ 


                                                                        


21 सितंबर 1926 को लाहौर से लगभग 40 कि. मी. दूर कसूर कस्बे के एक नाचने- गाने वाले परिवार में एक खूबसूरत सी बच्ची का जन्म हुआ। नाम रखा गया अल्लाह रख्खी। बच्ची को खुदा ने जितनी बेमिसाल खूबसूरती बख्शी थी, उतनी ही पुरकशिश आवाज़ भी। पांच साल की उम्र में जब अधिकांश बच्चे तुतला रहे होते हैं, उस वक्त अल्लाह रख्खी ने तत्कालीन गायकों की शैली में गाना भी शुरू कर दिया था।

मात्र  8 वर्ष की नन्हीं उम्र में कलकत्ते की एक फ़िल्म कंपनी ने उसे प्ले बैक का मौका दिया। निर्माता निर्देशक अभिनेता बिट्ठलदास पांचोटिया के अनुसार 1935 में उन्होंने सबसे पहले मादन थियेटर कलकत्ता द्वारा निर्मित फ़िल्म गैबी गोला में पहली बार अल्लाह रख्खी को बाल कलाकार यानी बेबी नूरजहां के रूप में पेश किया। परंतु संगीतकार गुलाम हैदर के निर्देशन में 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने पंजाबी फ़िल्म गुल-बकावली में पहली बार गाया।


 शुरूआती दौर में नूरजहां ने बहुत सी पंजाबी और हिन्दी फ़िल्मों में काम किया लेकिन जिस फ़िल्म से उन्होंने बतौर नायिका और गायिका पहली बार अपार शोहरत हासिल की, वो थी 1942 में रिलीज़ हुई फ़िल्म खानदान इस फ़िल्म के गीतों ने तो धूम ही मचा दी थी। फ़िल्म में उनके नायक थे प्राण


फ़िल्म खानदान की असाधारण सफलता नूरजहां को उड़ा कर बंबई ले गई।  बंबई फ़िल्म नगरी में वे अकेली नहीं गईं साथ वे अपनी शोख पंजाबीयत भी ले गईं। वहाँ 1943 में सआदत हसन मंटो की कहानी पर शौकत रिज़वी की फ़िल्म नौकर में काम किया जिसमें शोभना समर्थ और चंद्रमोहन ने भी मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं।

1943 में जिया सरहदी द्वारा निर्देशित फ़िल्म नादान प्रदर्शित हुई, जिसमें संगीतकार के. दत्ता के निर्देशन में उन्होंने पहली बार कई गीत गाए। फिर शौकत रिज़वी ने दोस्त का निर्देशन किया, फ़िल्म तो चली नहीं पर सज्जाद हुसैन के गीत काफ़ी हिट रहे। 1945 में नूरजहां अभिनीत चार फ़िल्में रिलीज़ हुई, उनमें ज़ीनत ने बहुत धूम मचाई और फ़िल्म के गीत भी बहुत पसंद किए गए। गीत हैं- नाचो सितारो नाचो/ बुलबुलो मत रो यहां / आंधियां ग़म की और क़व्वाली आहें न भरी शिकवे न किए। संगीतकार श्याम सुंदर ने फ़िल्म विलेज गर्ल में नूरजहां से पहली बार कई खूबसूरत गीत गवाए, जिनमें,  बैठी हूं तेरी याद का लेकर सहारा / किस तरह भूलेगा दिल / ये कौन हंसा / और सजन परदेसी  प्रमुख हैं।


 फिर आई महबूब निर्देशित और संगीतकार नौशाद अली के संगीत से सजी सुपरहिट फ़िल्म अनमोल घड़ी, जो कि प्रेम त्रिकोण पर आधारित थी। 1946 में प्रदर्शित ये एक ऐसी फ़िल्म थी जिसमें नूरजहां की अदाकारी और गीतों ने उनके रुतबे को आसमां तक पहुंचा दिया। इस फ़िल्म का गीत, आवाज़ दे कहां है, दुनिया मेरी जवां है हमेशा-हमेशा के लिए नूरजहां की पहचान बन गया। इसमें नूरजहां के साथ सुरेन्द्र और सुरैय्या ने भी अभिनय किया था। इस फ़िल्म में नूरजहां ने जवां है मुहब्बत/ आ जा मेरी बर्बाद मुहब्बत के सहारे/ मेरे बचपन के साथी/ क्या मिल गया भगवान जैसे कई एकल गीत भी गाए


दरअसल अनमोल घड़ी का संगीत, कहानी का अनूठापन, इसकी कास्ट, महबूब खान का निर्देशन, कुछ ऐसी बातें थीं जो नूरजहां को फ़िल्म Art के field में काफ़ी आगे तक ले गईं। 1946 में नूरजहां की दो फ़िल्में और आईं। एक थी दिल और दूसरी हमजोली। परंतु इन फ़िल्मों के गीत ज़्यादा पॉपुलर नहीं हो सके। इसी साल रिलीज नूरजहां – त्रिलोक कपूर अभिनीत फ़िल्म मिर्ज़ा साहिबा के गीत भी बेहद हिट हुए थे। कुछ गीतों की धुनें हुस्न लाल भगत राम ने बनाई थीं तो कुछ की अमरनाथ ने।

1947 में शौकत रिज़वी के निर्देशन में आई फ़िल्म जुगनु जिसमें दिलीप कुमार नायक थे। फ़िरोज़ निज़ामी द्वारा संगीतबद्ध इस फ़िल्म के गीतों ने अपार शोहरत हासिल की। सर्वाधिक हिट डूयेट था – यहां बदला वफ़ा का सिवाए बेवफ़ाई के क्या है। नूरजहां का साथ दिया था मु. रफ़ी साहब ने।  ये तो आप जानते ही हैं कि रफ़ी साहब का नूरजहां के साथ गाया यह इकलौता गीत है। टोरांटोवासी रफ़ी साहब के बड़े भाई हमीद साहब के अनुसार रफ़ी उस दिन बहुत नर्वस थे। नूरजहाँ जी ने खुद अपने हाथों से उन्हें पानी पिलाया और हौंसला बढ़ाया।

अविभाजित हिन्दुस्तान में जुगनु उनकी अंतिम फ़िल्म थी। देश विभाजन के बाद नूरजहां लाहौर वापिस चली गईँ। जहां कोई गायक या गायिका वहाँ शौकत हसन के साथ मिलकर सटुडियो खोला – शाहनूर। 1951 में शाहनूर के बैनर तले उन्होंने शौकत रिजवी निर्मित पंजाबी फ़िल्म चन्न वे का निर्देशन किया और वे पाकिस्तान की पहली महिला फ़िल्म निर्देशक बन गईं।

1953 में उनकी दो फ़िल्में रिलीज हुईं ‘दुपट्टा’ और ‘गुलनार’। दुपट्टा का संगीत दिया था फिरोज़ निज़ामी ने। मशहूर गीत रहे – जिगर की आग से इस दिल को जलता देखते जाओ चांदनी रातें तुम ज़िंदगी को ग़म का फ़साना बना गए  मैं बन पतंग उड़ जाऊँ।

गुलनार के संगीतकार थे गुलाम हैदरलोकप्रिय गीत थेबचपन की यादगारों मैं तुमको ढूंढती हूं / लो चल दिए हमको तसल्ली दिए बगैर / सखी री नहीं आए सजनवा मोर वगैरह वगैरह।

नूरजहां के समकालीनों में अमीरबाई कर्नाटकी, ज़ोहराबाई अंबालावाली जैसी गायिकाएं और नायिका गायिका खुर्शीद रहीं। अगर वो युग शमशाद बेगम, सुरैया, राजकुमारी, पारुल घोष, काननबाला, जूथिका राय जैसी दिग्गज गायिकाओं का था तो इन सब में नूरजहां ने अपनी अलग पहचान बनाई। भले ही कुंदनलाल सहगल, पहाड़ी सान्याल, सुरेन्दर, जी.एम. दुर्रानी, जगमोहन, के. सी. डे जैसे गायकों का जादू भी लोगों के सर चढ़कर बोल रहा था, फिर भी इन सब में नूरजहां की गायकी की कशिश अलग ही थी।

बकौल सुरेन्दर – नूरजहां की आवाज़ में तिलिस्म ही था, उनके साथ गाते-गाते न जाने कितनी बार ऐसा हुआ कि मैं अपनी लाईन ही भूल जाता, उनकी आवाज़ में खोया रहता।

1951 से 1960 तक उन्होंने 13 फ़िल्मों में काम किया पाकिस्तान में उन दिनों उर्दू के मुकाबले पंजाबी फ़िल्में ज़्यादा बनती थीं। नूरजहां ने उर्दू, पंजाबी, पश्तो, सिंधी भाषा में बनी फ़िल्मों में प्लेबैक का रिकॉर्ड बनाया। उनके इस रिकॉर्ड को कोई अन्य पाकिस्तानी गायिका नहीं तोड़ पाई है।

नूरजहां की लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि लता मंगेशकर भी उनकी प्रशंसक हैं। वे जब पहली बार संगीतकार गुलाम हैदर के पास ऑडिशन देने गई थीं तो उन्होंने फ़िल्म ज़ीनत में नूरजहां जी का गाया गीत -  ‘बुलबुलो मत रो यहां आंसू बहाना हैं मना’ गाकर सुनाया था। इसे सुनकर गुलाम हैदर ने उन्हें फ़िल्म ‘मजबूर’ में गाने का मौका दिया था।


अपनी अदाकारी और गायकी से बहुत शोहरत हासिल कर चुकीं नूरजहां को तमगाए-इम्तियाज़ और Pride of Performance जैसे सम्मानों औरमल्लिका-ए-तरन्नुम के ख़िताब से नवाज़ा गया। लेकिन ये भी सच है कि जो कुछ बंबई Film Industry नूरजहां से करवा या गवा सकी उसका एक चौथाई भी लाहौर Film Industry उनसे हासिल न कर सकी। इस विषय पर संगीतकार एस. मोहिन्दर का कहना था कि लाहौर के संगीत निर्देशक कम अनुभवी नहीं थे परंतु उस फ़िल्म इंडस्ट्री के पास न तो बंबई के level  की तकनीक थी और न ही नए तजुर्बे करने का हौंसला और न ही दिव्य दृष्टि कि वे किसी कलाकार से उसकी निपुणता के अनुसार काम करवा सकती। इसलिए इसमें हैरानी की कोई बात नहीं कि नूरजहां वहां की फ़िल्मों में कला और संगीत की दृष्टि से अपने बंबई के दौर से आगे न जा सकीं। 


एक किस्सा शेयर करना चाहूंगी। टोरांटो वासी मेरे दोस्त श्री इकबाल माहल वहाँ म्युज़िकल शोज़ का आयोजन करते हैं। जगजीत सिंह उनके यहां ठहरे हुए थे। ऐसे में एक बार उन्हें मैडम नूरजहां ने फोन करके जगजीत सिंह का प्रोग्राम सुनने की ख्वाहिश जताई। सोचिए मंच पर जगजीत और दर्शकों में सामने बैठ मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहां उनके गायन का लुत्फ़ उठा रही थीं। नूरजहां का एक प्रशंसक उनके घुटनों के पास आ बैठा। जोश में आकर वह उनके घुटने दबाने लगता। वे अपने घुटने इधर-उधर करके प्रशंसक के उत्साह से बचने की कोशिश कर रही थीं। आखिर नूरजहां जी ने इकबाल जीक के कान में कहा, इस आदमी से पीछा छुड़ाओ


 इकबाल जी ने उस प्रशंसक से कहा, भाई साहब तारीफ़ ज़बान से ही काफ़ी होती है, हाथों से करनी ज़रूरी नहीं । वह झेंप गया। थोड़ी देर बाद नूरजहां जी ने कोई बात कही तो उस आदमी के जोश में उबाल आ गया और फिर से घुटने पकड़ बैठा। इस बार इकबाल जी ने तैश में आकर कहा कि भाई साहब, अगर आप को घुटने नहीं तुड़वाने तो अपने हाथों को संभाल कर रखिए। महफ़िल ख़त्म होने पर वही प्रशंसक लापरवाही से सड़क पार करते समय एक गाड़ी की चपेट में आ गया। उसकी दोनों टाँगे कट गईँ। इकबाल जी को पश्चाताप हो रहा था कि मैंने ऐसी बात मुँह से क्यों निकाली। 


23 दिसंबर, 2000 को नूरजहां इस नूरानी जहां को अलविदा कह गईं। करांची में वे अपनी बेटी और दामाद के हसन सरदार के पास थीं, जो कि मशहूर खिलाड़ी थे। दोपहर बाद तबीयत ज़्यादा ख़राब होने पर अस्पताल ले जाते वक्त रास्ते में उन्होंने तम तोड़ दिया।  उनकी पोती  ने भी नौशाद के संगीत निर्देशन में फ़िल्म ताजमहल The Eternal Love Story में acting की थी, लेकिन फ़िल्म कुछ ख़ास चल नहीं पाई।

नूरजहां जी को इस बात का फ़ख्र रहा है कि हिन्दी फ़िल्मों में सलवार-कमीज़  पोशाक का चलन उन्हीं से शुरू हुआ। पंजाबी संगीत प्रेमियों के लिए ये गर्व की बात रही कि उन्होंने पंजाबी फ़िल्मों के लिए सर्वाधिक प्ले बैक किया। 



                         प्रस्तुति  -  नीलम शर्मा अंशु

21 मई 2013


....... तो फिर ये महिला कौन थी..... 
क्या महज़ इत्तेफाक़ था..........

दिनांक 20-05-2013, समय - रात के लगभग 9.15, स्थान राजभवन क्रॉसिंग। आकाशवाणी से प्रोग्राम के बाद घर वापसी के लिए मेट्रो स्टेशन तक जाने के लिए राजभवन के पास सड़क पार करने के लिए सिग्नल का इंतज़ार कर रही थी। अचानक पीछे से, दाहिनी तरफ से आवाज़ सुनाई दी (हिंदी में पूछा गया) - दीदी झालदा का रस्ता इधर है क्या ? पलट कर देखा तो साड़ी में एक 30 - 32 वर्षीया महिला थी। न तो ठेठ देहातिन और न ही शहरिन लग रही थी। चूँकि थोड़ी देर पहले आँधी - तूफान सहित बारिश होकर हटी थी तो उसके सर पर कुछ लकड़ियों का छोटा सा गट्ठर दिखा और हाथ में भी कुछ टूटी टहनियां थाम रखी थी शायद जलावन के लिए। र्मैने सियालदह समझ कर तुरंत कहा - हाँ। फिर मुझे लगा कि नहीं, सियालदह न कह कर कुछ और कहा गया है। मैंने दुबारा पूछा तो उसने कहा - झालदा। मैंने हैरान होकर पूछा - झालदा ? ये कहाँ है । फिर उसने कहा - तुम सुधा हो। मैंने कहा - नहीं। उसने हंसते हुए कहा, झूठ बोलती हो। मुझे लगा कि उसे मेरी शक्ल किसी से मिलती-जुलती लग रही होगी। मैंने कहा, कहाँ रहती है सुधा? (सोचा था वो कहेगी - खिदिरपुर। मैं जिस सुधा को जानती हूं वो कभी खिदिरपुर में भी रहती थी।) इस बार उसने जिस जगह का नाम लिया, चाह कर भी याद नहीं कर पा रही हूं, कल रात ही पोस्ट लिखनी चाही थी पर नेट ने दगा दिया। 


मैंने फिर से कहा, आप जिन जगहों के नाम ले रहीं है, मैंने तो कभी ये नाम सुने तक नहीं, मुझे लगा शायद आप सियालदह की बात कह रही हैं, पर ये झालदा वगैरह हैं कहाँ ? उसने कहा वहीं हमारे बंगाल में। मुझे हल्की सी हँसी आ गई। हँसते हुए पूछा - वो आपका बंगाल है तो ये कौन सी जगह है। सोचा था आशा के अनुरूप जवाब मिलेगा - कलकत्ता (यानी शहर)। पर उसने कहा वो हमारा बंगाल है ये पाकिस्तान है। मेरी हँसी गायब......। समझ में आया कि संभवत: इसका मानसिक संतुलन ग़ड़बड़ है। दिन का वक्त होता तो शायद कुछ देर और बात कर भी लेती। उस वक्त कुछ और नहीं सूझा लगा कि इसके साथ बातों में लगे रहने से निर्धारित ट्रेन भी छूट जाएगी 9.26 वाली। फटाक से दौड़ कर रोड पार कर मेट्रो स्टेशन की तरफ दौड़ लगा दी। आज ऑफिस में जाकर कलीग से पूछा तो उन्होंने बताया कि "ये जगह पुरुलिया जिले में पड़ती है, हावड़ा स्टेशन से पुरुलिया जाने वाली ट्रेन लेनी पड़ती है। वह महिला अपनों से बिछुड़ गई होगी। वही कहीं गलत हाथों में पहुंच जाएगी।" लेकिन अब मुझे लगता है कि वह अपनों से बिछुड़ी नहीं थी कलकत्ते की ही होगी, क्योंकि उसकी बात-चीत में अजनबी शहर में अपनों से बिछुड़ने का डर या घबराहट का लहज़ा क़तई नहीं था। मानसिक संतुलन की गड़बड़ी ही रही होगी वर्ना लकड़ियां उठाए क्यों फिरती ? भगवान ही जाने......




या फिर...... परसों रविवार को "शिरडी के साँई बाबा" फिल्म देखी थी ज़ी क्लासिक पर। बाबा के भक्त ने बाबा से पूछा था कि आप कल भोजन करने क्यों नहीं आए। बाबा ने कहा, आया था पर तुमने डांट-फटकार कर भगा दिया। भक्त ने कहा - मैंने आपको भगा दिया ? फिर कुछ सोच कर कहा, वो तो मैंने एक भिखारी को भगाया था। बाबा ने कहा - वो मैं ही था। मैं किसी भी रूप में आ सकता हूं।
 

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तो फिर ये महिला कौन थी..... क्या महज़ इत्तेफाक़ था..........




प्रस्तुति    – नीलम शर्मा अंशु 



 आखिर ऊपर बैठा वो फ़नकार इतनी विविधता कहाँ से लाए...... 


शुक्रवार, 17 मई 2013 - शाम को ऑफिस से घर के लिए निकली तो गेट पर एक मित्र मिल गई। उनसे वहीं खड़े-खड़े बातें हो रही थीं कि एक कलीग भी पास से गुज़रे, साथ में उनकी बिटिया थी। चूँकि बचपन से वह मुझे जानती है तो रुक कर उसने भी बात की। मैंने कहा, अगली बार आओ तो मिल कर जाना, खूब बातें करेंगे। और जाते-जाते वह कह गई बांगला में - सेलिब्रिटिज इस तरह यहाँ खड़े बातें करते मिल जाएंगे कौन सोच सकता है भला ? उसे देख कर मेरी मित्र ने कहा देखो ये लड़की हुबहु अपने पिता जैसी दिखती है, वैसे ही होंठ, वैसी ही मुस्कान। कुछ देर और अपनी उस मित्र से बातें करने के बाद हमने अपनी-अपनी राह पकड़ी। मेट्रो से उतर कर सोचा, कुछ सामान लेते हुए चला जाए तो एक दुकान का रुख किया। कुछ देर बाद दुकान पर एक और महिला गाहक आईं। अचानक देखा, मेरी तरफ देख वे अकेले-अकेले मुस्कुरा रही हैं। मैंने भी एक बार गौर से देखा, पर वे परिचित नहीं जान पड़ीं। सामान लेकर जाते वक्त उन्होंने बांगला में ही कहा - 'एक्सक्यूज मी, आपकी शक्ल मेरी छोटी बहन से हु-ब-हु मिलती है, पल भर के लिए तो मैं चौंक ही गई।' जवाब में मैंने उनका मन रखने के लिए कहा - थैंक्स, सो स्वीट। आप कहाँ रहती हैं। उन्होंने कहा - यहीं पास में रहती हूं, पर मेरी बहन राणाघाट में रहती है कहकर फिर से मुस्कुराते हुए वे चली गईं। (ये जगह हमारे वहाँ से कई किलोमीटर के फासले पर है, य़ानी एक उपनगर है)



जब स्कूल में पढ़ती थी तो एक बार मेरी हमउम्र ममेरी बहन मध्य प्रदेश से आई हुई थी छुट्टियों में हमारे घर। लिहाज़ा वह घर पर ही रहती और मैं स्कूल चली जाती। घर के सामने रास्ते से गुज़रने वाली महिलाएं उसे नीलम समझ कर पूछतीं - आज स्कूल नहीं गई ? जवाब में मेरी मम्मी कहतीं - नीलम तो स्कूल तो गई है, ये तो मेरी भतीजी है। जबकि मेरी उसकी शक्ल में इतनी समानता भी नहीं थी। 



90 के दशक में डी. डी.1 पर अंग्रेजी की समाचारवाचिका हुआ करती थीं - संगीता बेदी। हमारी माँ को लोगों की शक्लें मिलाने की आदत है।एक दिन माँ ने कहा, ये बिलकुल तुम्हारे जैसी लगती है। मैंने कहा - आपको तो और कोई काम है नहीं, बस शक्लें मिलाती रहतीं है आप। लेकिन कुछ दिनों बाद लोकल ट्रेन में मेरी एक मित्र ने भी कहा कि अरे तुम्हारी शक्ल अमुक न्यूज रीडर से मिलती है। संयोग की बात कि कुछ ही दिनों बाद फिर मेरे एक सीनियर कलीग ने भी कह डाला कि अरे नीलम तुमने ध्यान दिया है वो इंगलिश न्यूज री़डर आती है न, तुम्हारी शक्ल उससे बहुत मिलती-जुलती है। मैंने सोचा, तीन-तीन लोग कह रहे हैं तो चलो कुछ हद तक समानता होगी। घर आकर माँ को भी खुश करने के लिए बता दिया कि आपके साथ-साथ और दो लोगों ने भी यही बात कही है। बड़े भाई साहब ने एक दिन कह दिया कि दिल्ली जाओ और संगीता बेदी से मिलकर कहना कि लोग मुझे आपके जैसी कहते हैं।




अभी पिछले साल मेरे एक श्रोता संटु मल्लिक ने कहा कि दीदी आपकी आवाज़ कविता कृष्णमूर्ति की आवाज़ से मिलती है (गायकी वाली आवाज़ नहीं जब वे साधारण बात-चीत करती हैं तो)। उसने कहा हम टी.वी. पर उनकी इंटरव्यु देख रहे थे तो अचानक मेरे भाई ने कहा कि अरे इनकी आवाज़ तो नीलम शर्मा से मिलती है। ख़ैर मैंने उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया क्योंकि आज तक मैंने कविता कृष्णमूर्ति जी की सिर्फ़ गायकी वाली आवाज़ ही सुनी है।

पिछले दिनों मेरी एफ. एम. कलीग कविता झा ने भी एक दिन कह ही दिया कि नीलम जी, आपने गौर किया है कि आपकी आवाज़ कविता कृ. जैसी है। मैंने तुरंत कहा पता नहीं, तुमसे पहले भी संटु मल्लिक ने यही बात कही थी।




आखिर ऊपर बैठा वो कुम्हार इतनी विविधता कहाँ से लाए...... हलाँकि मैं तो यही कहा करती हूँ कि मैं किसी के जैसी नहीं, अपने जैसी हूँ।



प्रस्तुति - नीलम शर्मा 'अंशु'

13 अप्रैल 2013

आप सभी को बैसाखी की ढेरों शुभकामनाएं......... 


प्रस्तुत है विगत वर्ष साहित्य शिल्पी डॉटकॉम पर प्रकाशित कविता आई बैसाखी।


(1)


आई बैसाखी...



आज फिर आई है बैसाखी
दिन भर चलेगा दौर
एस एम एस, ईमेल और फेस बुक पर
बधाई संदेशों का....
याद हो आती है
इतिहास के पन्नों में दर्ज़
एक वह बैसाखी जब
दशमेश ने 1699 में
जाति-पाति का भेद-भाव मिटा
मानवता की रक्षा ख़ातिर
सवा लाख से एक को लड़ा
नींव रखी थी खालसा पंथ की
शत-शत नमन, शत-शत वंदन
दशमेश के चरणों में।

क्या सचमुच आज
हर्षोल्लास का दिन है ?
ऐसे में जब याद हो आती हो
इतिहास के पन्नों में दर्ज़
1919 की वह खूनी बैसाखी
जब जलियांवाले बाग में
हज़ारों बेगुनाह, निरीह, निहत्थी ज़िंदगियां
बर्बरता और क्रूरता का शिकार हुईं।
उन परिजनों तक
कौन पहुँचाएगा संवेदना संदेश ?
शत-शत नमन, वंदन उनकी अमर शहादत को
जिसने रखी थी नींव इन्क़लाब की।

- नीलम शर्मा 'अंशु'

साभार - sahityashilpi.com



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ਫੇਰ ਆਈ ਏ ਵਿਸਾਖੀ
ਚਲਦਾ ਰਹੇਗਾ ਦੌਰ ਦਿਨ ਭਰ
ਐਸ. ਐਮ. ਐਸ, ਈ ਮੇਲਾਂ, ਫੇਸ ਬੁਕਾਂ’ਰਾਹੀਂ
ਵਧਾਈ ਸੰਦੇਸਿਆਂ ਦਾ।
ਆਂਉਦੀ ਹੈ ਯਾਦ
ਇਤਿਹਾਸ ਦੇ ਪੰਨਿਆਂ’ਚ ਦਰਜ਼
ਉਹ ਵਿਸਾਖੀ ਜਦੋਂ
ਦਸ਼ਮੇਸ਼ ਨੇ 1699’ਚ
ਜਾਤ-ਪਾਤ ਦਾ ਭੇਦ-ਭਾਵ ਮੇਟ ਕੇ
ਮਨੁੱਖਤਾ ਦੀ ਰੱਖਿਆ ਖਾਤਿਰ
ਸਵਾ ਲੱਖ ਨਾਲ ਇੱਕ ਨੂੰ ਲੜਾ ਕੇ
ਰੱਖੀ ਸੀ ਨੀਂਹ ਖਾਲਸਾ ਪੰਥ ਦੀ
ਲੱਖ-ਲੱਖ ਨਮਨ
ਦਸ਼ਮੇਸ਼ ਦੇ ਚਰਣਾ’ਚ।

ਕੀ ਸੱਚੀਮੁੱਚੀ ਹੈ ਅੱਜ
ਖੁਸ਼ੀਆਂ ਦਾ ਦਿਹਾੜਾ ?
ਜਦੋਂ ਆਂਉਦੀ ਹੋਵੇ ਯਾਦ
ਇਤਿਹਾਸ ਦੇ ਪੰਨਿਆਂ’ਚ ਦਰਜ਼
1919 ਦੀ ਉਹ ਖੂਨੀ ਵਿਸਾਖੀ
ਜਦੋਂ ਜਲਿਆਂਵਾਲੇ ਬਾਗ’ਚ
ਹਜ਼ਾਰਾਂ ਬੇਗੁਨਾਹ, ਮਾਸੂਮ
ਨਿਹੱਥੀ ਜ਼ਿੰਦਗਿਆਂ
ਬਰਬਰਤਾ ਅਤੇ ਕਰੂਰਤਾ ਦੀ
ਹੋਇਆਂ ਸ਼ਿਕਾਰ।
ਉਹਨਾਂ ਰਿਸ਼ਦੇਦਾਰਾਂ ਤੱਕ
ਕੌਣ ਪੁਚਾਵੇਗਾ ਸੰਵੇਦਨਾ ਦੇ ਸੰਦੇਸੇ
ਲੱਖ-ਲੱਖ ਨਮਨ
ਉਹਨਾਂ ਦੀ ਅਮਰ ਸ਼ਹਾਦਤ ਨੂੰ

ਜਿਸਨੇ ਰੱਖੀ ਸੀ ਨੀੰਹ ਇੰਨਕਲਾਬ ਦੀ।

- ਨੀਲਮ ਸ਼ਰਮਾ 'ਅੰਸ਼ੂ'