सुस्वागतम्

समवेत स्वर पर पधारने हेतु आपका तह-ए-दिल से आभार। आपकी उपस्थिति हमारा उत्साहवर्धन करती है, कृपया अपनी बहुमूल्य टिप्पणी अवश्य दर्ज़ करें। -- नीलम शर्मा 'अंशु

21 जून 2011

अज्ज दफ्तरों गुलाटी मार के आई एं ?


22 जून जन्म दिन पर अमरीश पुरी को याद करते हुए 



आज से 31 वर्ष पूर्व 1980 में रिलीज़ हुई थी अब तक की प्रथम राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त पंजाबी फ़िल्म चन्न परदेसी, जिसे देखने का मौका मिला था 1981 में।

उन दिनों संभवत: स्कूल की परीक्षा के बाद छुट्टियों में बड़ी बुआ के घर फगवाड़ा जाना हुआ था। फुफेरी बहन ने भईया से फिल्म दिखाने को कहा। मुझे उन दिनों फ़िल्में देखने का क़तई शौक नहीं था, बेदिली से मैं उनके साथ गई। अब तो सिनेमा हॉल का नाम तक याद नहीं, यह भी याद नहीं कि हॉल शहर के किस हिस्से में था। ख़ैर चित्रार्थ निर्देशित इस फिल्म के नायक थे राज बब्बर, नायिका थीं ऋचा शर्मा। अन्य कलाकार थे, ओम पुरी, रमा विज, सुष्मा सेठ तथा अमरीश पुरी। अमरीश पुरी गाँव के जागीरदार जोगिन्दर सिंह की भूमिका में थे। अमरीश पुरी अभिनीत पहली फिल्म देखी थी यह मैंने। फ़िल्म में मुझे बस ओम पुरी का एक ही डायलॉग पसंद आया था, जगीरदार जी, मेरी चवान्नी? (फिल्म में जागीरदार के कर्मचारी होने के नाते संभवत: वे इनामस्वरूप चवन्नी लिया करते थे।) फिल्म देख कर अमरीश पुरी के बारे मन में बेहद ख़राब इमेज बनी। कहते हैं न फर्स्ट इम्प्रेशन इज़ द लास्ट इम्प्रेशन। फिर धीरे-धीरे उन्हें कई भूमिकाओं में अलग-अलग फ़िल्मों में देखा। 2001 में अचानक एक दिन टी. वी. चैनेल घुमाते-घुमाते किसी चैनेल पर पंजाबी स्टाईल का गीत बजते देखा। राज बब्बर पर्दे पर नज़र आए। मैं हमेशा कहा करती थी कि मैंने कभी राज साहब को मुस्कुराते नहीं देखा, अगर कभी किसी फिल्म में दिख भी गए तो मुझे उनकी मुस्कान भी बनावटी सी लगी। उत्सकुतावश वह चैनेल देखना शुरू किया तो पता चला कि यह चन्न परदेसी का ही हिन्दी संस्करण था – सुहाग की क़ीमत। पूरे बीस वर्षों बाद उसी फिल्म को दुबारा देख मन भावुक हो उठा। अमरीश पुरी साहब के किरदार ने मन पर फिर से पहले वाली ही छाप छोड़ी यानी पूरी नेगेटिव। चन्न परदेसी के बाद वे मुझे वे कभी पसंद नहीं आए।

जून 2001 में अचानक एक दिन पता चला कि अमरीश जी कोलकातावासी फिल्म निर्देशक गुलबहार सिंह की फिल्म सिक्सर की शूटिंग के सिलसिले में कोलकाता में ही हैं। जा पहुंची शूटिंग स्थल पर जो कि निर्देशक के आवासीय परिसर में ही था। शॉट देकर अमरीश जी अगले शॉट के बुलावे तक कमरे में बैठे आराम फरमा रहे थे। मुझे भी उनसे अप्वॉंयटमेंट लेना था, सो जाकर उन्हें नॉक किया। वे एक फ्री लांसर को इंटरव्यू दे रहे थे। अंदर जाकर मैंने उनका अभिवादन किया, उन्होंने हाथ मिलाया। मिलते ही मैंने पंजाबी में कहा, चन्न परदेसी में आपकी ऐकटिंग पहली बार देखी, तो मन में बहुत बुरी इमेज बनी। उन्होंने मुस्करा कर पूछा, कितनी बुरी? मैंने कहा - जितनी बुरी लग सकती थी, उससे भी कहीं ज़्यादा बुरी। उनके चेहरे पर खुशी झलक रही थी यानी उन्होंने अपने किरदार के साथ इतना न्याय किया था कि मुझ जैसे दर्शक का हृदय उस विलेन के प्रति नफ़रत और कड़वाहट से इस क़दर भर गया था कि दिल में एक बुरी इमेज ने जगह बना ली थी जो बाद में विभिन्न अच्छी चरित्र भूमिकाओं पर भी हावी रही। यही तो अच्छे कलाकार की सफलता और संपूर्णता है। हां, यह कहते मुझे मोगैंबों से बिलकुल डर नहीं लगा। मैंने बहुत ही फ्रैंकली अपने विचार व्यक्त किए थे। मैंने कहीं पढ़ रखा था कि एक बार वे चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में गए थे तो लड़कियां उन्हें देख कर दूर भाग रही थीं। मैंने जब इस विषय में पूछा तो उन्होंने कहा, अब नहीं भागतीं, अब लड़कियां समझदार हो गई हैं। बातचीत के क्रम में मैंने उनसे पूछा कि आप मूलत: पंजाब के किस शहर से हैं, जवाब में उन्होंने गुरदासपुर बताया। मैंने  कहा कि मैंने तो नवांशहर सुन रखा था तो उन्होंने कहा कि वहां मेरी ननिहाल है। चूँकि उन्हें अगला शॉट देने जाना था इसलिए हम खड़े-खड़े ही बात कर रहे थे। जैसे ही मैंने उन्हें बताया कि मैंने नवांशहर से मैट्रिक और ग्रेजुएशन किया है तो उन्होंने तपाक से दुबारा हाथ मिलाया और कहा – बैठो। जैसे ही उन्होंने बैठने के लिए कहा तो मैंने कहा ज़रा मैं अपने छोटे भाई को भी बुला लूं, बाहर खड़ा है। भाई अंदर आया तो उन्होंने उससे भी हाथ मिलाया। भाई ने भी वही बात कही कि आपको चन्न परदेसी में पहली बार देखा था। तो उन्होंने कहा - तुम्हारी दीदी भी यह कह रही थी। उसने कहा फर्क़ यह है कि दीदी ने फिल्म सिनेमा हॉल में देखी थी और मैंने बड़े होकर टी. वी. पर। 

चूँकि मुझे मालूम था कि वे रिकॉर्डिंग की अनुमति नहीं देते इसलिए मैंने उनसे पूछा कि मैं कल किस वक्त आऊँ क्योंकि मुझे अपने रेडियो एफ. एम. के श्रोताओं के लिए इंटरव्यू रिकॉर्ड करना है और कुंदन लाल सहगल साहब के बारे में भी आपसे बातें करनी है। उन्होंने कहा, कल तो मैं वापस जा रहा हूँ। तुम अपना कॉन्टैक्ट तथा पता दे दो मैं जब अगली बार कलकत्ते आऊँगा तो ज़रूर समय दूंगा। मैं मन ही मन सोच रही थी कि पता नहीं इतने बड़े कलाकार को अगली बार कोलकाता आने तक अपना वादा याद भी रहेगा या नहीं ये तो वक्त ही जाने। (ये अलग बात है कि फिर कभी कलकत्ते आने का मौका ही नहीं मिला)। ख़ैर!  इस छोटी सी मुलाक़ात में कोलकाता में किसी पत्रकार से अपनी ज़बान में बातचीत कर उन्हें जो सकुन मिला उसे हम भाई बहन ने बखूबी महसूस किया। उनकी गर्मजोशी सब कुछ बयां कर रही थी। यकीन मानिए इस सहज मुलाक़ात के बाद कलाकार के रूप में अमरीश पुरी साहब की जो विलेन वाली छवि मन में घर किए हुए थी, पता नहीं कहां काफूर हो गई। ये सारी बातचीत महज़ दस मिनटों में हुई होगी, मुझे ऑफिस जाने की जल्दी भी थी । मैंने कहा था अगर आप कल का समय देते हैं तो मैं कल ऑफिस से छुट्टी लेकर आपसे मिलने आऊँगी। उन्होंने ठेठ पंजाबी में कहा, अज्ज दफ्तरों गुलाटी मार के आई एं ? मैंने कहा - जी हाँ, बिलकुल। लेकिन अगले दिन तो उनकी वापसी थी। ख़ैर ये छोटी सी मुलाक़ात मुझे हमेशा याद रहेगी, इसके पहले सक्रीन पर उनकी शक्ल देखते ही दिमाग गर्म हो जाता था लेकिन इस मुलाकात के बाद वह इमेज धुल गई। कुछ ऐसा ही मुनमुन सेन के मामले में भी थी। मुझे वे पसंद नहीं थीं। एक बार उनसे इंटरव्यू का समय मांगा तो उन्होंने अगले दिन सुबह अपने घर आने के लिए कहा। उनसे बातचीत करके भी मन में बनी उनकी छवि बदल गई। दरअसल मैं हमेशा सुचित्रा सेन की इमेज से उन्हें तौला करती थी। इस वाक्ये का ज़िक्र फिर कभी।


ख़ैर अमरीश साहब को फिर कभी कलकत्ते आने का मौका ही नहीं मिला। 12 जनवरी 2005 को उनका निधन हो गया। 22 जून 1932 को पिता लाला निहाल चंद और माता वेद कौर की तीसरी संतान अमरीश साहब का नवांशहर स्थित ननिहाल के घर में जन्म हुआ था। रंगमंच से उन्होंने अभिनय की शुरूआत की और कई साल रंगमंच पर अभिनय के जलवे बिखेरने के बाद लाइफ बिगिन्स आफ्टर फौर्टी तो इसी तर्ज़ पर चालीस की उम्र में उन्हें फिल्मों में क़दम रखने का मौका मिला। और विभिन्न फिल्मों में उनकी विविध भूमिकाओं से तो आप भलीभांति परिचित हैं चाहे वो मिस्टर इंडिया का मोगैंबो हो या दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे के पिता। उनके जन्मदिन पर यह थी समवेत स्वर पर यादों की छोटी सी श्रद्धांजलि।

मज़े की बात यह है कि अगले दिन 23 जून को राजबब्बर साहब का जन्मदिन है तो उन्हें भी समवेत स्वर की बधाईयां।


प्रस्तुति – नीलम अंशु

16 जून 2011

दो कलाकारों का जन्म दिन।



आज हिन्दी फिल्म जगत के दो कलाकारों का जन्मदिन है। वे दोनों बंगाल में भी सक्रिय रहे।

पहले याद करना चाहूंगी संगीतकार, गायक, निर्माता हेमंत कुमार जी को। आज ही के दिन यानी 16 जून 1920 को उनका जन्म हुआ था और 26 सितंबर 1989 को निधन। उन्हें हमारी श्रद्धांजलि। 

आज मिठुन दा (चक्रवर्ती) का भी भी जन्म दिन है। उन्हें बहुत-बहुत हार्दिक शुभ कामनाएं तथा मंगल कामनाएं।
कल 107 AIR FM Rainbow पर आपके खत आपके गीत प्रोग्राम के तहत् एक ख़त में बेहाला से उत्पल माईती के ख़त में मिठुन जी की फिल्म मैं बलवान के गीत पहले रॉक ऐंड रॉल की फरमाईश आई थी। मैंने वो गीत बजा कर मिठुन दा को जन्म दिन की शुभ कामनाएं  दी थीं। फेस बुक पर मैंने उनकी फिल्म दाता से गीत बाबुल का ये घर बहना का लिंक डाल कर उन्हें शुभ कामनाएं दीं।

फेस बुक पर मैंने हेमंत कुमार जी के फिल्म नागिन के गीत तेरे द्वार खड़ा इक जोगी का लिंक डाल कर उन्हें श्रद्धांजलि दी थी।  संजीब शर्मा उज्जैन, रजनी जी, मधु जी, धीरेन्द्र जी, हितेन्द्र जी, मुकुंद जी, राजेश बजाज, राजेश एन., प्रजुक्ति, आलोक दत्ता, आशुतोष जी आदि दोस्तों ने उस लिंक को पसंद किया। 


रत्नेश जी के साथ इस सिलसिले में खेल-खेल में हेमंत जी के गीतों की अच्छी खासी लड़ी तैयार हो गई, जिसे मैं हु-ब-हु यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ : -



   रत्नेश     -     ज़रा नज़रों से कह दो जी, निशाना चूक न जाए....
    अंशु      -               ज़िंदगी प्यार की दो-चार घड़ी होती है ।
                   छुपा लो यूं दिल में प्यार मेरा, के जैसे        
                   मंदिर में लौ दीये की।   
    रत्नेश     -        ये रात ये चांदनी फिर कहाँ, सुन जा दिल की। 
    अंशु      -     बेकरार करके हमें यूं न जाईए....
    रत्नेश     -     याद किया दिल ने कहाँ हो तुम..
    अंशु      -     मैं ग़रीबों का दिल, वतन की ज़ुबां।
    रत्नेश     -     है अपना दिल तो आवारा ...
    अंशु      -     सुन जा दिल की दास्तां।          
    रत्नेश     -     ये नयन डरे-डरे...   
र   रत्नेश     -     हार मान लो तो कुछ और गीत बताऊँ
    अंशु      -     क्यों मानूं । 
    रत्नेश         तो फिर हेमंत के और गीत बताओ...
    अंशु      -     चली गोरी पी से मिलन को।
र   रत्नेश     -     तुम्हें याद होगा कभी हम मिले थे..
    अंशु      -     न ये चांद होगा/ न तुम हमें जानो
    रत्नेश      -     न तुम हमें जानो, न हम तुम्हें जाने
    अंशु       -     वो तो मैंने कह दिया 
    रत्नेश          जाने वो कैसे लोग थे..
    अंशु       -    ओ नींद न मुझको आए
    अंशु       -    हार की बात नहीं। ये अंताक्षरी कब तक चलेगी?
र   रत्नेश       -   जब तक कोई नहीं हारता
    अंशु        -    ओ ज़िंदगी के देने वाले
र   रत्नेश          जाने वो कैसे लोग थे जिनको...
    अंशु        -    ये तो आप कह चुके हैं।
र   रत्नेश       -    तुम्हीं मेरे मीत हो...
    अंशु       -     एक बार ज़रा फिर कह दो /गंगा आए कहां से।
र   रत्नेश           राह बनी खुद मंजिल...    
    अंशु       -      जन्म से बंजारा हूं बंधु।
    रत्नेश           चलो मैं हार मान लेता हूँ, पर इस हार में भी जीत है.. 
                    हेमंत के कुछ भूले-बिसरे गाने इकट्ठे हो गए
    अंशु         -      सही में। अच्छा किया मुझे भी थोड़ी देर में मीटिंग में जाना है।


                 प्रस्तुति - नीलम अंशु

14 जून 2011

यूं ही कुछ कहना है......



यत्र-तत्र बिखरी कुछ पंक्तियां फिर से शेयर कर रही हूँ  :- 



हर निशानी अब ख़त्म है, वो कहानी अब ख़त्म है 
रोज का मातम नहीं अब, जिंदगानी ही ख़त्म है,
लो तुम्हें आवाज़ देकर आखिरी मैं जा रहा हूँ ,
जो बसाई थी कभी वो राजधानी ही ख़त्म है,
लौट आना, किसलिए अब, बुलबुलों से पूछ लेना,
चाँदनी में झिलमिलाती चिलमनों से पूछ लेना ,
किस कदर होने लगीं थीं सनसनाहट तन-बदन में,
हो सके तो इन गरजती, बिजलियों से पूछ लेना

- तुषार देवेन्द्र चौधरी ।




नहीं मिल पाएंगे उन राहों पर, 
जहां कदमों के निशां और रिशतों की वफ़ा है
लेकिन मिलते रहेंगे आप से, 
सितारों के रास्ते, हवाओं के रास्ते।
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तुम गए ग़म नहीं, आँख ये नम नहीं
दर्द होगा दवा, अब कोई हमदम नहीं
गुलिस्तां दे दिए तूने इन ख़ारों को
मेरे हिस्से में तो एक शबनम नहीं। 
तुमसे शिकवा करें यार हम किस तरह ?
तुम तो तुम ही रहे, हम मगर हम नहीं
कौन है दुनिया में जिसको सब कुछ मिला
मुझको सब कुछ मिला बस मिले तुम नहीं

(
फिल्म ज़िंदगी खूबसूरत है।)





चेहरे पर मुस्कान सजा कर, चश्मा लगा लेते हैं
आज कल लोग सहज ही पहचान छुपा लेते हैं ।
काँटों की फ़ितरत है हर दम चुभन देते रहना
फूलों की फ़ितरत है हँस कर साथ निभा लेते हैं।

(
मूल पंजाबी गुरदीप भाटिया दीप’ )


सच्चा दोस्त एक आईने की तरह होता है, सच कहना उसकी मजबूरी है,चेहरे में यदि दाग है, तो दिखाना ज़रुरी है । यदि सच्चाई आँखों को पसंद न आए, तो इसमें कसूर आईने का नहीं है ।
- प्रतिभा मांकड़




धर्म के रिश्ते खून के रिश्तों के मुकाबले कहीं अधिक वज़नदार
 हो जाते हैं। अपना बनाने के लिए अपना न होना कितना 
आवश्यक होता है। जो अपने होते हैं वे कितनी आसानी से 
अपने नहीं रहते और जो अपने नहीं होते, बिना किसी स्वार्थ के किसी को अपना लेते हैं। 
-
मलबे की मालकिन से ( - तेजेन्द्र शर्मा )



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02 जून 2011

हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह ।



गुलाम अली साहब की गाई ग़ज़ल - हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह, सिर्फ़ इक बार मुलाकात का मौका दे दे, मुझे उनकी दूसरी ग़ज़लों की तरह बेहद पसंद है।  ग़ज़ल में भले ही मुलाक़ात का मौका मांगा गया हो लेकिन हमसे तो यही कहा जाता रहा है कि कभी हमें भी मेज़बानी का मौका दीजिए। 


समझ में नहीं आता कि कहाँ से शुरू करूं।

अभी-अभी फेस बुक पर विनोद मौदगिल जी ने मीठा सा उलाहना दिया कि  गर्मी का आनंद  लेकर वापस जा रही हैं, हिमाचल अच्छा नहीं लगता क्या

जालंधर में रहते हुए भी सारा-सारा दिन हिमाचल का शिमला वार्तालाप में अनायास ही शामिल रहा। जालंधर में कदम रखते ही टीना ने कहा, दीदी इस बार आपके लिए एक लॉन्ग जर्नी का सरप्राइज है पता नहीं आपके भाई ने आपको बताया या नहीं। पूछने पर उसने कहा कि शायद शिमला जाना हो सकता है।  घर आने पर भाई ने बताया कि शिमला के कार्यालय के संपादन का काम संभालने के लिए दफ्तर की तरफ से आठ-दस दिनों के टुअर का प्रस्ताव है। चूंकि बेटी की समर वैकेशन चल रही है तो दफ्तर वालों ने कहा कि फैमिली को भी लेते जाओ। मैंने पूछा -  जाना कब है। उसने कहा - बुधवार। मैंने कहा मेरी शुक्रवार की वापसी है जालंधर से। बुधवार जाकर फिर शुक्रवार को लौटना, पहाड़ी इलाके का ऐसा सफ़र मैं नहीं कर सकती। एक दिन में क्या घूमना होगा। मैं तो नहीं कर सकती इतनी रोड जर्नी। 

हालाँकि  कुछ दिनों पहले विनोद जी ने कहा भी था कि चंडीगढ़ आने का प्रो. हो तो बताईएगा लेकिन मुझे पता था कि चार दिनों के ट्रिप में चंडीगढ़ जाने के आसार नहीं बन पाएंगे। हाँ, इतना तो पक्के भरोसे के साथ कह सकती हूँ कि अगर मेरा प्रो. बनता तो पूर्व सूचना पाकर वे कम से कम मिलने के लिए कुल्लु से चंडीगढ़ तक का सफ़र  ज़रूर कर लेते।

मुझे याद है दिसंबर में वे कोलकाता आए थे। और मैं शहर में नहीं थी। शनिवार  देर  रात एयरपोर्ट से घर पहुंची थी। रविवार को ढेर सारे काम मेरा इंतज़ार कर रहे थे।  और सोमवार की सुबह एफ. एम. पर लाइव प्रो. भी होना था। मुझे तब तक नहीं पता था कि मैं प्रो. में क्या करने वाली हूँ, कौन से गीत बजाऊंगी। ऐसे में सुबह फिर से विनोद जी का फोन आया कि आप अगर मैनेज करके मिलने आ जाएं तो बहुत अच्छा रहेगा, फिर पता नहीं कब कोलकाता आना हो। वे एक सेमीनार में आए थे। खैर, दोपहर 1.30 उनके सेमीनार स्थल आई.टी.सी सोनार बांगला में मिलने पहुंची। सेमीनार के सभागार के  बाहर खुले में लगी कुर्सियों पर बैठ हम बात-चीत कर रहे थे हिन्दी में। थोड़ी देर बाद उनके मोबाइल पर एक फोन आया। उन्होंने पंजाबी में बात की। बात ख़त्म होने के बाद मैंने भी पंजाबी में बात की तो उन्हें सुखद आश्चर्य हुआ। अरे, आप पंजाबी हैं? बाद में उन्होंने अपने दो और साथियों से मिलवाया तो वे भी बहुत खुश हुए कि चलो कलकत्ते में कोई पंजाबी बोलने वाला तो मिला। साढ़े चार-पौने पांच बजे उन लोगों से विदा ली और फिर घर आकर प्रो. की तैयारी की और अगले दिन सुबह बढ़िया सा प्रो. किया।

ऐसे ही 11 दिसंबर को बोधिसत्व जी का फोन आया कि आज आपके शहर में हूं, शाम को भाषा परिषद में प्रो. है, हो सके तो मिल लीजिए। अगली सुबह मुझे दिल्ली की फ्लाइट पकड़नी थी और तड़के चार बजे घर से निकलना था।  फिर भी उस शाम को पांच बजे परिषद जाकर उनसे मुलाकात की और चूँकि प्रो. शुरू होने में देर थी इसलिए लगभग पौने सात बजे उनसे यह कह कर विदा ली कि सिर्फ आपसे मिलने की ख़ातिर आई हूँ, सुबह मुझे जल्दी निकलना है, इसलिए अब इजाज़त चाहूंगी। 

लेकिन मुझे पता था कि इस बार चंडीगढ़ प्रवास का सबब नही बन पाएगा। इसलिए विनोद जी को पूर्व सूचना नहीं दी। उन्हें ही क्यों और भी बहुत से दोस्तों को मैंने नॉक तक भी नहीं किया।

सिर्फ़ अमृतसरवासी भूपिन्दर सिंह जी को फोन पर उनकी सेवानिवृत्ति की शुभ कामनाएं दीं (आजकल मैं उनके विभाग में भी नहीं हूं।) और बेदी साहब से बात हुई, उन्होंने कहा भी कि कल शाम मिल लीजिए, डिनर हमारे यहाँ ही करते हैं। इसके पहले जब-जब जालंधर आना हुआ उनसे हमेशा मुलाकात की। इस बार एक तो समय कम तिस पर गर्मी में गर्म-सर्द होकर जुकाम और हल्का सा बुखार भी हो गया। इसलिए भी घर से निकलने का मन नहीं बना। और कुछ दूसरे दोस्तों की  यादों की वजह से भी मूड ख़राब रहा।

हालाँकि हाथ की पांचों उंगलियां बराबर नहीं होती। पिछली बार, एक बार आई थी तो पूर्व सूचना के बावजूद 'कभी हमें भी मेजबानी की मौका दीजिए' कहने वाले किसी एक दोस्त ने मिलना तो दूर फोन तक नहीं किया। जबकि वह दिन उसी के नाम कर रखा था। मेरी एक आदत है, मेरे क़रीबी जानते हैं कि मैं एक जुमला अक्सर इस्तेमाल करती हूं कि मांगना मेरी फितरत नहीं। फिर भी यह मानते हुए कि दोस्ती में सफाई मांगने की ज़रूरत नहीं होती लेकिन फिर भी कभी-कभी सफाई मांगना और देना नितांत ज़रूरी हो जाता है। अपने आत्मसम्मान को ताक पर रख कर सब कुछ भुला कर तथा उससे उम्र में बड़े होने के  फर्ज़  को निभाते हुए यह सोच कर  कि क्षमा सोभती बड़ेन को, छोटन को उत्पात,  लौट कर उसे कई बार फोन किया था पर उसने बात नहीं की। इस बार यहां आकर भी फोन करके पूछा कि आखिरी बार पूछ रही हूँ, बात करनी है या नहीं, उधर से फोन काट दिया गया। इसे तो यही कहा जाएगा न कि चोरी और सीनाजोरी। गलती और चूक भी आपकी तरफ से और बातचीत बंद भी आपकी तरफ से। मैंने तो बड़े होने के नाते कई बार बात करने की कोशिश की लेकिन लोग चूक भी करते हैं, माफी तो भूल ही जाईए, चूक के लिए सफाई तक देने की ज़रूरत भी नहीं समझी जाती।  

इस बार भी ऐसा ही एक वाक्या और।  

एक और दोस्त से जब भी फोन पर बात होती, यही पूछा जाता, आप पंजाब कब आ रहे हो। ज़रूर मिलना। मैं कहती  फिलहाल तो कोई प्रोग्राम नहीं। प्रोग्राम बना लऔ ना, सानूं मिलन आ जावो। ऐसे ही एक बार फिर पूछा गया, आप कब आ रही हैँ।  मैंने बताया कि अमुक तारीख को जा रही हूँ लेकिन आपका इलाका मेरे रूट में नहीं पड़ता, मैं तो केवल चंडीगढ़ या जालंधर तक ही जाती हूँ।  तो कहा गया, ठीक ए, असीं चंडीगढ़ मिलन आ जावांगे। फिर मैंने कहा सोचा -  चलो मैनेज करते हैं और 20 दिनों पहले बता दिया कि तीन जून की मेरी वापसी है उस दिन मिल लेते हैं फिर अमुक स्टेशन से आप मुझे मेरी निर्धारित ट्रेन में चढ़ा दीजिएगा।  

खैर, उन्हें आज शाम किसी को छोड़ने दिल्ली जाना  है। यानी पूर्व सूचना के बावजूद प्राओरिटी नहीं बदल सकी। हालांकि उनको मैंने पिछले अनुभव के बार में बता भी दिया था।  8.28 मिनट हो रहे हैं मुझे पौने सात बजे की ट्रेन से चलकर साढ़े नौ, दस बजे तक उनके शहर पहुंचना था फिर रात को वहीं से अपनी ट्रेन ले लेनी थी। उनके शहर का टिकट मैंने कैंसेल भी नहीं करवाया। यूं ही रख छोड़ा है। मैं ये दावा या घमंड नहीं करती कि दोस्ती निभाना कोई हमसे सीखे। फिर भी पंजाब के अपने ये दो दौरे नाखुशगवार ही रहे। ये दो अनुभव बहुत अच्छे नहीं कहे जा सकते। खैर, भावनात्मक चोटें खाने के बाद भी आदमी न  संभले तो क्या कहेंगे। मुझे भी अच्छी तरह पता है कि इन दो झटकों के बावजूद मेरा स्वभाव तो बदलने से रहा। यानी हम फिर से तत्पर हैं, आ बैल मुझे मार। मेरी समझ में यह भी नहीं आता कि मेरे ही साथ ऐसा क्यों होता है।

 चार महीने पहले वाला झटका अभी तक नहीं भूली कि ऊपर से यह दूसरा।

कह तो देते हैं लोग कि आपकी नेचर बहुत अच्छी लगती है। बहुत अच्छा स्वभाव है आपका। लेकिन, अक्सर लोग सहजता और विनम्रता का ग़लत आकलन करते हैं। मेरी आदत है कि मैं किसी से भले ही मिल न पाऊँ लेकिन एक फोन ज़रूर कर देती हूं कि आपके शहर से गुज़र रही हूं। न भी बताया जाए तो किसी को क्या पता चलता है। लेकिन इन दो अनुभवों से सबक लेकर इस बार फोन भी बहुत कम किए। 

हाँ, सभी लोग एक से नहीं होते, तभी तो विनोद मौदगिल जी ने मीठा सा उलाहना दिया कि गर्मी का आनंद लेकर वापसी हो रही है, हिमाचल अच्छा नहीं लगता क्या ?   विनोद जी, पहला कटु अनुभव तो हिमाचल वालों की वजह से ही हुआ और दूसरा पंजाब का।  फिर भी वादा रहा कि कभी आपके कुल्लु को आगामी प्रो. शेडयूल में  ज़रूर शामिल करूंगी। 



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