सुस्वागतम्

समवेत स्वर पर पधारने हेतु आपका तह-ए-दिल से आभार। आपकी उपस्थिति हमारा उत्साहवर्धन करती है, कृपया अपनी बहुमूल्य टिप्पणी अवश्य दर्ज़ करें। -- नीलम शर्मा 'अंशु

28 अगस्त 2010

शीर्षकविहीन गप्प-शप्प उर्फ रेनबो पर गुलदस्ता







आज (28-08-2010 दोपहर दो बजे से तीन बजे तक) मैंने रेनबो पर गुलदस्ता प्रोग्राम पेश किया। मेरे 26 अगस्त वाले प्रोग्राम में किसी श्रोता ने पूछा था कि दीदी आप फिर किस दिन आ रही हैं। मैंने कहा था, सुनते रहिए किसी न किसी दिन मुलाका़त हो जाएगी। उन्होंने कहा था, आप बहुत दिनों से गुलदस्ते में नहीं आ रही हैं। तो, मैंने कहा कि 28 को शनिवार के गुलदस्ते में मुलाक़ात हो जाएगी। उन्होंने कहा, उस दिन फोन इन प्रोग्राम रखिएगा उस दिन हमारे पुराने आर. जे. मदन सूदन जी की पुण्यतिथि है, मैं कुछ बोलना चाहूंगा। (गुलदस्ता प्रोग्राम में साधारणत: फोन इन नहीं होता, कुछ आर. जे. फोन लेते हैं लेकिन मैं नियमानुसार फोन नहीं लेती)। कुछ स्पेशल तो आप करेंगी न?  मैंने पलट कर पूछा, स्पेशल की उम्मीद मुझसे ही क्यों? नहीं दीदी, आप हमेशा कुछ अलग सा करती हैं इसीलिए। हमारे चैनेल पर हिन्दी के दो प्रोग्राम होते हैं एक छायालोक सुबह और शाम को तथा दोपहर को गुलदस्ता।

मैंने तय किया था कि इस बार गुलदस्ते में कोई ख़ास विषय न रखकर शेरो-शायरी से ही कंपेयरिंग की जाए। अच्छी ग़ज़लें मुझे हमेशा छूती हैं। मैं उन्हें नोट करके रख लेती हूँ। इस बार सोचा कि अलग-अलग रचनाकारों की पंक्तियां न लेकर एक ही रचनाकार को लिया जाए। यह प्लानिंग मेरी पहले से ही थी लेकिन मेरे उस श्रोता की हसरत से यह मैच कर गया, शायद इसे ही वेवलेंथ कहते हैं। चलिए अब आज के प्रोग्राम की स्क्रिप्ट हू-ब-हू आपकी नज़र करते हैं, शीर्षक आप ही सोच लें।



1. गीत दिल को हज़ार बार रोका, रोका,
             प्यार है धोखा, धोखा है प्यार, धोखा न खाना।

              ( फिल्म मर्डर, गायिका अलीशा चिनॉय)

धोखा, धोखा, प्यार है धोखा। क़तई नहीं, हमारे 107 AIR FM रेनबो का प्यार क़तई धोखा नहीं है। नमस्कार, आदाब दोस्तो, 107 AIR FM रेनबो पर आपकी RJ नीलम शर्मा हाज़िर है लेकर प्रोग्राम गुलदस्ता। जी हाँ, गुलदस्ता लेकर आपसे रू-ब-रू हे रही हूँ काफ़ी दिनों के अंतराल के बाद। तो शुरू करें, ये रहा आज के गीतोंरुपी गुलदस्ते का अगला ट्रैक।

2. गीत - जाना कहाँ है,रू रू रू, प्यार यहां है,
दुनिया जवां है, दिलकश समां है।

(फ़िल्म चलते चलते, गायक सुलक्षणा पंडित बप्पी लहरी)

अजी जाना कहाँ है, सिर्फ़ और सिर्फ़ 107 AIR FM रेनबो की सतरंगी म्युज़िकल मस्ती में बह जाना है। जी हाँ -

मैं ज़िंदगी में कभी इस क़दर न भटका था
कि जब ज़मीर मुझे रास्ता दिखाता था ।
मशीन बन तो चुका हूँ मगर नहीं भूला
कि मेरे जिस्म में दिल भी कभी धड़कता था
वो बच्चा खो गया दुनिया की भीड़ में कब का
हसीन ख्वाबों की जो तितलियां पकड़ता था।

3. गीत - (ये दौलत भी ले लो, ये शोहत भी ले लो,
    भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी,
               मगर मुझको लौटा वो बचपन का सावन,
             वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी)

                                  (फिल्म आज, गायक जगजीत सिंह)

भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी, मगर मुझको लौटा दो वो बचपन का सावन, वो काग़ज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी। जी हाँ, 2 बजकर 22 मिनट हो रहे हैं। आप सुन रहे हैं 107 AIR FM रेनबो पर गुलदस्ता। अलग-अलग रंगों के गीत रूप गुलों से हमने इसे सजाया है।

अंधेरे चंद लोगों का अगर मकसद नहीं होते
यहाँ के लोग अपने आप में सरहद नहीं होते।
न भूलो तुमने ये ऊँचाईयां भी हमसे छीनी हैं
हमारा क़द नही लेते तो आदमकद नहीं होते।
तुम्हारी यह इमारत रोक पाएगी हमें कब तक
वहाँ भी तो बसेरे हैं जहाँ गुंबद नहीं होते।
चले हैं घर से फिर धूप से जूझना होगा
सफ़र में हर जगह सुंदर घने बरगद नहीं होते।


4.         गीत – (रुक जाना नहीं, तू कहीं हार के,
                       कांटो पे चलके मिलेंगे साये बहार के। ओ राही, ओ राही।) 
     
                  (फिल्म इम्तहान, गायक किशोर कुमार)

परों को काट के क्या आसमां दीजिएगा
ज़मीन दीजिएगा या उड़ान दीजिएगा
हमारी बात को भी अपने कान दीजिएगा
हमारे हक़ में भी कोई बयां दीजिएगा
ज़बान, ज़ात या मज़हब यहाँ न टकराएं
हमें हुज़ूर वो हिन्दोस्ता दीजिएगा।



5. गीत – ( है प्रीत जहाँ की रीत सदा
            मैं गीत वहाँ के गाता हूँ।
          भारत का रहने वाला हूँ,
                 भारत की बात बताता हूँ।)  

(फ़िल्म - पूरब और पश्चिम, गायक महेन्द्र कपूर-साथी)


2 बज कर 34 मिनट होने को हैं, आप सुन रहे हैं 107 AIR FM रेनबो, रेनबो पर गुलदस्ता और आज के गुलदस्ते की इस महफिल को सजाया है मैंने नीलम शर्मा ने। दोस्तो, रहूंगी आपके साथ पूरे तीन बजे तक। आधे घंटे का सफ़र हमने तय कर लिया है और इस दौरान 2 बज कर 45 मिनट पर आप क्रिकेट मैच के अपडेट सुनेंगे।

'पंख कुतर कर जादूगर जब चिड़िया को तड़पाता है
सात समंदर पार का सपना, सपना ही रह जाता है।
जब सन्नाटों का कोलाहल इक हद से बढ़ जाता है
तब कोई दीवाना शायर ग़ज़लें बुन कर लाता है।
वो कोमल पंख हैं डरते अब इक बाज के साये से
 जिन पंखों से आस का पंछी सपनों को सहलाता है।'


जी हां दोस्तो, जादूगर भले ही पंख कुतर कर चिड़िया को तड़पाता हो और उस बाज रूपी जादूगर के आतंक से भले ही सब आतंकित हों लेकिन हम आपको पूरा-पूरा विश्वास दिलाते हैं, आश्वासन देते हैं कि साडे नाल आओगे तां लाइफ बन जाएगी। जी हाँ, only on 107 AIR FM रेनबो ।

6. गीत – ( साडे नाल आएगी ता लाईफ बन जाएगी)
                 
 (फिल्म हमराज)(गायक -सोनू निगम, जसपिंदर नरूला)


जी हाँ दोस्तो, लाईफ बनाने के लिए I mean रोज़ी-रोटी की तलाश में बहुत से लोग अपने मूल स्थान से देश के अलग-अलग भागों में पहुंच जाते हैं। अपनों से बहुत दूर, अपनी जड़ों से बहुत दूर। एक ज़माने में तो लोग रोज़ी-रोटी के लिए जाते थे लेकिन आजकल Better Education chances के लिए एक जगह से दूसरी जगह जाना पड़ता है यहाँ तक कि लोग दूसरे देशों में भी जाते हैं। लेकिन यह दूरी, दूरी नहीं होती क्योंकि अपनी माटी की खुशबू को वे अपने में समेटे रखते हैं। उसे हमेशा महसूस करते रहते हैं कुछ इस तरह :-

 
'अश्क बन कर जो छलकती रही मिट्टी मेरी
शोले कुछ यूं भी उगलती रही मिट्टी मेरी
मेरे होने का सबब मुझको बता कर यारो
मेरे सीने में धड़कती रही मिट्टी मेरी
दूर परदेस के सहरा में भी शबनम की तरह
मेरी आँखों में चमकती रही मिट्टी मेरी
सिर्फ़ रोटी के लिए दूर वतन से अपने
दर-ब-दर यूं ही भटकती रही मिट्टी मेरी
मैं जहां भी रहा मेरा साथ न छोड़ा उसने
ज़ेहन में मेरे महकती रही मिट्टी मेरी।'

7. ग़ज़ल – ( हम तो हैं परदेस में,
देस में निकला हो चांद)

(गायक जगजीत-चित्रा सिंह)
 
दोस्तो 2 बज कर 45 पर आपने सुना भारत और श्रीलंका के बीच चल रहे क्रिकेट मैच का अपडेट। एक बार फिर आपका स्वागत है 107 AIR FM रेनबो के गुलदस्ता कार्यक्रम में, जहां मैं हूँ आपके साथ, आपकी आर. जे. दोस्त नीलम शर्मा। 


'ज़रा झाँक कर खुद से बाहर तो देखो,
ज़माने से रिश्ता बना कर तो देखो
ज़माना करे दोस्ती कैसे तुमसे,
ज़रा अपने हाथों में खंजर तो देखो।' 


8. गीत- ( दुश्मन न करे दोस्त ने जो काम किया है,
     उम्र भर का ग़म हमें ईनाम दिया है।)

फ़िल्म आख़िर क्यों, गायक लता अमित कुमार)
दोस्तो, एक बात और शेयर करना चाहूंगी आज हमारे सीनियरमोस्ट सहकर्मी मदन सूदन जी की पुण्यतिथि भी है। मुझे याद है मदन जी अपने प्रोग्रामस् में खूब शेर सुनाया करते थे और जब आप जैसे दोस्त आकर कहा करते थे  दादा एक अच्छा सा शेर सुना दीजीए न। तो, वे कहा करते थे, अच्छा शेर, और बुरा शेर क्या होता है। शेर शेर होता है। 

और आज के गुलदस्ता प्रोग्राम की मैं आपको ख़ासियत बता दूं कि आज के प्रोग्राम में मैने जितने भी शेर कोट किए, जी हाँ, जितने भी शेर कोट किए, वे सारे के सारे शेर एक ही शायर की कलम से रचे गए थे। वो शायर हैं हिन्दुस्तान के लब्ध-प्रतिष्ठित........... ।


उम्मीद है कि आज का गुलदस्ता आपको पसंद आया होगा और अब सिर्फ़ पाँच मिनट बाकी हैं, जाते-जाते आप सबकी नज़र है ये चुलबुला सा गीत। अगली मुलाक़ात होगी सोमवार (30 अगस्त) की सुबह। तब तक सुनते रहिए 107 AIR FM रेनबो, The Real Radio. नमस्कार। 

9. गीत – ( इश्क-इशक में, प्यार-प्यार में नंबर 1 पंजाबी...... )
(फिल्म - चोरी-चोरी चुपके चुपके)

(गायक सोनू निगम, जसपिंदर नरूला)



( ऑन एयर मैंने शायर का नाम कोट कर दिया था, यहाँ जान-बूझकर नहीं कर रही हूँ। अगर आप उनकी लेखनी के प्रशंसक हैं तो अवश्य आप अपने उस शायर/साहित्यिक मित्र को उपरोक्त कोटेशनस् के ज़रिए पहचान लेंगेऔर पहचानते तो आप हैं ही,  तो बूझिए..............)


बाद में जोड़ा गया (दिनांक  17-09-2010) -

 अगले प्रोग्राम में उसी श्रोता ने धन्यवाद दिया कि दीदी आपने सचमुच बहुत ही अच्छा प्रोग्राम पेश किया। उन्होंने कुछ शेर कोट करते हुए कहा कि मैंने ये शेर नोट कर लिए हैं। आगे उन्होंने कहा कि प्रोग्राम में शेर तो बहुत से आर.जेस्/प्रेजेंटरस् कोट करते हैं, लेकिन आपके शेर बहुत ही अनकॉमन और  उम्दा थे। मैंने उन्हें शायर के बारे में बताया और कहा कि अगर आपको यह शायरी सचमुच ही बहुत पसंद आई है, तो लिख कर भेजिए, शायर तक आपका पैगाम पहुंच जाएगा। 


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22 अगस्त 2010

कोलकाता दूरदर्शन व आकाशवाणी कोलकाता के स्थापना दिवस !



कल 21 अगस्त को कोलकाता दूरदर्शन  की स्वर्ण जयंती थी।  कोलकाता व बंगाल  में रहने वाले हरेक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।








26 अगस्त को कोलकाता और हम बंगालवासियों के लिए एक और सुखद दिन है। जी हाँ, इस दिन आकाशवाणी, All India Radio का 83वां जन्मदिन है। 83 वर्ष पूर्व यानी इसी दिन 1927 में कोलकाता से प्रसारण शुरू हुआ था। पहले इसका कार्यालय 1,  गर्स्टिन प्लेस (आज का बी.बी.डी बाग/डलहौज़ी अंचल) में था। बाद में  15 सितंबर 1958 को इसे इडेन गार्डन के मौज़ूदा भवन में स्थानांतरित किया गया।



1 जनवरी  1936  को Indian State Broadcasting Service के दिल्ली केन्द्र की स्थापना की गई। 8 जून 1936  को इसे All India Radio नाम दिया गया। 1938 में इसे आकाशवाणी नाम दिया गया। कभी सोचा है आपने कि इसका नामकरण 'आकाशवाणी' कैसै पड़ा ?

कवि गुरु रवीन्द्र नाथ ठाकुर रचित कविता पर इसका नाम 'आकाशवाणी' रखा गया। कविता के बोल कुछ यूं हैं : -
 




धौरार आंगिना होईते एई शोनो
उठिलो आकाशवाणी।
औमोर लोकेर मोहिमा दिलो जे
मौर्तोलोकेरे आनि।
सौरोसोतीर आसोन पातिलो
नील गौगोनेर माझे
आलोक बीनार सौभा मौंडोले
मानुषेर बीना बाजे

शुरेर प्रोबाहो धाय शुरोलोके
दूर के से नैय चिनि
कोबी कौल्पोना बोहिया चोलिलो
औलोख शौदामिनी
भाषारौथ धाए पूर्बे-पोश्चिमे
सूर्जो रौथेर शाथी
उधाऊ रोईलो मानोब चित्तो
सौर्गेर सीमानाते।

प्रस्तुति : नीलम शर्मा 'अंशु' 


08 अगस्त 2010

शिव कुमार बटालवी के 75 वें जन्म दिन पर विशेष ।
शुक्रवार 6 जुलाई को अचानक आज की ग़ज़ल पर क्लिक किया। शिव बटालवी के 75 वें जन्म दिन पर आलेख देख हैरत हुई कि मुझसे कैसे चूक हो गई। अपने से वादा किया था कि आज ही जाकर मैं भी कोई रचना डालूंगी। ख़ैर उस दिन नहीं हो पाया। कई वर्ष पूर्व उन पर एक आलेख तैयार किया था, जल्दीबाजी में ढूंढने पर भी नहीं मिला। ख़ैर, यहाँ प्रस्तुत है कुछ रचनाएं जो कभी जनसत्ता कोलकाता में प्रकाशित हुई थीं।

परिचय :-

शिव कुमार बटालवी पंजाबी के अत्यंत लोकप्रिय कवियों में से एक रहे। 23 जुलाई 1936 को गुरदासपुर जिले की शंकरगढ़ तहसील के लोहटिया गाँव(अब पाकिस्तान) में जन्में शिव बटालवी का पंजाबी काव्याकाश में उदय एक पुच्छल तारे जैसा ही था। पंजाबी कविता में विरह का बादशाह कहे जाने वाले इस कवि का निधन 1973 में हुआ। मोहन सिंह और अमृता प्रीतम के साथ पंजाबी कविता की त्रयी बनाने वाले शिव के काव्य संग्रह हैं – पीड़ दा परागा (1960), लाजवंती (1961), आटे दीया चिड़ीयां (1963), मैंनू विदा करो (1964), बिरहा तू सुल्तान व दर्द मंदा दीयां आही (1965)। साहित्य अकादमी और पंजाब सरकार से सम्मानित बटालवी का अंतिम काव्य संग्रह है – मैं ते मैं। प्रस्तुत है उनकी कविताओं का हिन्दी अनुवाद।



 
(1)

मुझे तेरा शबाब ले बैठा।
रंग गोरा गुलाब ले बैठा।
दिल का डर था कहीं न ले बैठे।
ले ही बैठा, जनाब ले बैठा।
फुर्सत जब भी मिली है फर्ज़ों से
तेरे मुखड़े की किताब ले बैठा।
कितनी गुज़र गई और कितनी है बाकी।
मुझे यही हिसाब ले बैठा।
‘शिव’ को बस गम में पे ही भरोसा था।
गम से कोरा जवाब ले बैठा।

 

(2)


रोग बनकर रह गया प्यार तेरे शहर का।
मैंने मसीहा देखा बीमार तेरे शहर का।
इसकी गलियों ने मेरी चढ़ती जवानी खाली।
क्यों न करूं दोस्त सत्कार तेरे शहर का।
तेरे शहर में कद्र नहीं लोगो को पवित्र प्यार की
रात को खुलता है हर बाज़ार तेरे शहर का।
फिर मंज़िल के लिए इक क़दम भी न चला गया
कुछ इस तरह चुभा कोई ख़ार तेरे शहर का।
मरने के बाद भी जहाँ न कफ़न हुआ नसीब
कौन पागल करे ऐतबार तेरे शहर का।
यहाँ मेरी लाश तक नीलाम कर दी गई
उतरा न कर्ज़ फिर भी पार तेरे शहर का।



(3)


जांच मुझे आ गई गम खाने की।
धीरे-धीरे दिल बहलाने की।
अच्छा हुआ तुम पराए हो गए
ख़त्म हुई फ़िक्र तुम्हें अपनाने की
मर तो जाऊं मगर डर है दमवालों
मिट्टी भी बिकती है मोल शमशान की।
न दो मुझे साँसे उधार दोस्तो
लेकर फिर हिम्मत नहीं लौटाने की।
न करो ‘शिव’ की उदासी का इलाज
रोने की मर्जी है बेईमान की।।

 

(4)

मुझे तो मेरा दोस्त, तेरे गम ने मारा।
है झूठ तेरी दोस्ती, के गम ने मारा।।
मुझे तो ज्येष्ठ आषाढ़ से कोई गिला नहीं।
मेरे जमन को कार्तिक की शबनम ने मारा।।
अमावस की काली रात को कोई नहीं कसूर।
सागर को उसकी अपनी पूनम ने मारा।।
यह कौन है जो मौत को बदलाम कर रहा है?
इंसान को इंसान के जनम ने मारा।।
उदित हुआ था जो सूरज, अस्त होना था उसे अवश्य।
कोई झूठ कह रहा है कि पच्छिम ने मारा।।
माना कि मर चुके मित्रों का गम भी मारता है।
ज़्यादा पर दिखावे के गम ने मारा।।
कातिल कोई दुश्मन नहीं, मैं कहता हूँ ठीक।
‘शिव’ को तो ‘शिव’ के अपने गम ने मारा।।

 
साभार- जनसत्ता सबरंग, कोलकाता, 21 अगस्त, 1994
अनुवाद - नीलम शर्मा 'अंशु '




03 अगस्त 2010

हम लौट आएंगे, तुम यूं ही बुलाते रहना.....

मध्य प्रदेश का खंडवा शहर। 4 अगस्त 1929 को शहर के मशहूर वकील कुंजलाल गांगुली के घर तीसरे पुत्र का जन्म। कहते हैं वकील साहब के इस पुत्र की आवाज़ बड़ी कर्कश थी। बड़ा शरारती बच्चा हुआ करता था। दिन भर माँ को परेशान किए रखता। एक दिन उछलते-कूदते रसोई घर में आ घुसा। माँ सब्ज़ी काटना छोड़ किसी काम से दूसरे कमरे में गई हुई थीं। सब्ज़ी काटने वाली दराती सीधी पड़ी थी जिस पर उस बच्चे की नज़र नहीं पड़ी। उससे उसके बाँए पाँव की तीसरी उंगली कट गई। परिणामस्वरूप वह दिन भर रोया करता था। यहाँ तक कि नींद में भी सिसक उठता। चौबीस घंटों में क़रीब बीस-बाईस घंटे तो वह रोया करता था। क़रीब एक महीने बाद वह घाव ठीक हुआ। लगातार महीना भर रोते रहने के कारण अचानक उस बच्चे की आवाज़ की कर्कशता गायब हो गई और सुरीलापन आ गया।



यही बच्चा आगे चलकर गायक, निर्माता, निर्देशक, अभिनेता के रूप में मशहूर हुआ। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं एक हरफनमौला, मस्तमौला कलाकार आभास कुमार गांगुली उर्फ़ किशोर कुमार की। इंदौर से कॉलेज की पढ़ाई ख़त्म कर किशोर कुमार बड़े भाई अशोक कुमार के पास बंबई चले आए। अशोक कुमार उन दिनों बॉम्बे टॉकीज़ के प्रोड्यूसर थे। उन्होंने किशोर कुमार से अभिनय के बारे पूछा तो किशोर कुमार का जवाब था कि वे गायक बनना पसंद करेंगे। अंतत: गायन का अभ्यास शुरू हुआ। 1948 में बॉम्बे टॉकीज़ की फ़िल्म ‘ज़िद्दी’ के लिए उन्हें पहला ब्रेक मिला। लता मंगेशकर के साथ उनका पहला युगल गीत था – ‘ये कौन आया’। इसी फ़िल्म में उनका पहला एकल गीत था, ‘मरने की दुआएं क्यूं मांगू, जीने के तमन्ना कौन करे’फ़िल्म ज़िद्दी के लिए गाए गीतों में कुंदन लाल सहगल साहब की झलक मिलती है। किशोर कुमार सहगल साहब के ज़बर्दस्त फैन रहे। बचपन में जब भी घर में मेहमान आते तो पिता नन्हें किशोर कुमार को गीत सुनाने के लिए कहते। जवाब में किशोर कुमार पूछते, कौन सा ? दादा मोनी का या सहगल साहब का। गीत सुनाने के एवज़ में नन्हें किशोर को पिता पुरस्कार स्वरूप पैसे दिया करते थे। दादा मोनी के गीत का रेट था चार आने और सहगल साहब के गीत का एक रुपया।


अपने 40 साल के फ़िल्मी सफ़र में किशोर कुमार ने लगभग तीन हज़ार गीत गाए। 72 फ़िल्मों में अभिनय किया। बतौर निर्माता चलती का नाम गाड़ी( 1958), झुमरू (1961), दूर का राही(1971), बढ़ती का नाम दाढ़ी(1974) और शाब्बाश डैडी(1978) का निर्माण किया। पहली फ़िल्म को छोड़ शेष सभी फ़िल्मों में उनका अपना संगीत था। अपने द्वारा निर्मित फ़िल्मों के अलावा उन्होंने दूसरी फ़िल्मों में संगीत नहीं दिया।


उन्होंने हर अभिनेत्री के साथ नि:संकोच काम किया। अभिनेत्री कुमकुम के साथ सर्वाधिक काम किया। किशोर कुमार की मुख्य भूमिका वाली लूकोचूरी, न्यु दिल्ली, भाई-भाई और आशा इन चार फ़िल्मों ने स्वर्ण जयंती मनाई। अधिकार, चलती का नाम गाड़ी, लड़की, पहली झलक, प्यार किए जा, दिल्ली का ठग, इल्ज़ाम, चंदन, बेवकूफ़, शरारत आदि फ़िल्मों ने रजत जयंती मनाई।


किशोर कुमार, अशोक कुमार व अनूप कुमार तीनों भाईयों ने 1957 में पहली बार एक साथ सत्येन बोस के निर्देशन में फ़िल्म बंदी में अभिनय किया। किशोर कुमार विश्व के अकेले एकमात्र ऐसे गायक हैं जिन्होंने पुरुष व महिला स्वर में खुद ही चार युगल गीत गाए हैं। वे गीत हैं – आके लगी सीधी दिल पे (हाफ टिकट-1962)/अरे वाह रे मालिक(हाफ टिकट)/ सुणिए सुणिए आजकल की(लड़का-लड़की-1966)/लड़कियों का परोगराम(रंगीली – 1952) लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब फ़िल्म रागिनी और शरारत में रफ़ी साहब ने किशोर कुमार के लिए गायन किया। हुआ यूं कि 1954 में अशोक पिकचर्स, बॉम्बे के बैनर तले फ़िल्म रागिनी बन रही थी। नायक थे किशोर कुमार और नायिका पद्मिनी। ओ. पी. नैय्यर साहब ने किशोर कुमार और आशा भोंसले की आवाज़ों में चार गीत तो रिकॉर्ड कर लिए परंतु एक एकल गीत था जो किशोर कुमार पर फ़िल्माया जाना था। गीत के बोल थे – ‘मन मोरा बाबरा, निस दिन गाए गीत मिलन के।’ गीत शास्त्रीय था और किशोर कुमार हरफ़नमौला। परंतु नैय्यर साहब के मन के मुताबिक बात नहीं बन रही थी। कई रीटेक होने के बाद किशोर साहब को रफ़ी साहब की आवाज़ लेनी पड़ी। इसी तरह फ़िल्म शरारत में दो एकल और गीता दत्त के साथ दो गीत शंकर-जयकिशन ने रिकॉर्ड कर लिए परंतु ‘अजब दास्तां तेरी ये ज़िंदगी’ गीत में कई रीटेक देने के बाद किशोर कुमार नं स्वयं शंकर-जयकिशन से कहा कि आप ये गीत रफ़ी साहब से गवा लीजिए। दोस्तो, इससे एक बात स्पष्ट होती है कि उन दिनों कलाकार एक-दूसरे का कितना सम्मान करते थे, भले ही वे कंपीटीटर क्यों न हों।


सचिन देव बर्मन के संगीत निर्देशन में उन्होंने देव आनंद जी के लिए फ़िल्म ‘बाजी’ में गाया। बाद में सचिन देव बर्मन, किशोर कुमार और देव आनंद की त्रयी ने कई इतिहास रचे। तीन देवियां, गैंबलर, फंटूश, प्रेम पुजारी जैसी फ़िल्में फ़िल्म इंडस्ट्री को दीं। फ़िल्म जगत में एकमात्र किशोर कुमार ऐसे शख्स थे जो गायक व नायक के रूप में समान रूप से सफल हुए। छठे दशक में मु. रफ़ी, मुकेश, तलत महमूद, हेमंत कुमार, मन्ना डे बुलंदियों पर थे परंतु 1969 में फ़िल्म ‘आराधना’ ने तो मानों चमत्कार ही कर दिया। ‘मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू’ गीत से वे लोगों के दिलों की धड़कन बन गए। इस फ़िल्म से किशोर कुमार की लोकप्रियता काफ़ी बढ़ गई। छठे दशक में रफ़ी शम्मी कपूर और दिलीप कुमार के तथा मुकेश राज कपूर व मनोज कुमार के पर्याय बन गए थे, उसी प्रकार 1969 से 1987 तक किशोर कुमार देव आनंद, राजेश खन्ना और अमिताभ का ट्रेड मार्क बन गए। दरअसल राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन को किशोर कुमार के गायन ने ही स्टारडम तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


किशोर कुमार की सचिन देव बर्मन से अच्छी पटती थी। देव आनंद फ़िल्म गाईड का शीर्षक गीत सचिन देव से गवाना चाहते थे। उन्हें राज़ी करवाने का जिम्मा उन्होंने किशोर को दिया। किशोर कुमार का गाया गीत, ‘गाता रहे मेरा दिल’ बर्मन साहब को बहुत पसंद था। एक दिन घर बुलाकर उन्होंने किशोर कुमार के उस गीत की काफ़ी प्रशंसा की। किशोर कुमार बर्मन साहब के चरण पकड़ ज़मीन पर लेट गए और कहा कि मुझे एक वर चाहिए। सचिन देव अपना पाँव किसी भी तरह नहीं छुड़ा पा रहे थे। विवश होकर उन्होंने कहा – अच्छा बताओ, क्या चाहते हो ? तो किशोर कुमार ने गाईड का शीर्षक गीत गाने की माँग रखी और बर्मन साहब को राज़ी होना पड़ा।


हिन्दी फ़िल्मों में नाम कमाने के बाद उन्होंने 1970 में बांग्ला फ़िल्मों के लिए पार्शव गायन किया। पहली बार महानायक उत्तम कुमार के लिए फ़िल्म ‘राजकुमारी’ में ‘बौंदो घौरे औंधों होए थाकबो ना’ गीत गाया। इस गीत ने काफ़ी लोकप्रियता पाई। 1964 में स्वयं किशोर कुमार ने लूकोचूरी का निर्माण किया। इसमें उन्होंने गायन के साथ-साथ अभिनय भी किया। फ़िल्म सुपरहिट रही। उनके बांग्ला गीतों में आमार नाम ऐंटोनी(मदर),कारो केउ नौई गो आमी(लालकूठी), बिपिन बाबूर कारोन शुधा(अमानुष), काली रामेर ढोल(अनुंसंधान) एई जो नोदी जाए शागोरे/नयनो सौरोसी कैनो भोरेछे जौले और रवीन्द्र संगीत काफ़ी लोकप्रिय हुए।


किशोर कुमार को लोग पागल, कंजूस, सनकी और पता नहीं क्या-क्या कहा करते थे।किशोर कुमार की फ़िल्म प्यार अजनबी है में लीना चंद्रावरकर नायिका थीं। अचानक वे लीना जी के मेक रूम में घुस आए और बोले, लीना तुम जानती हो लोग मुझे पागल कहते हैं। लीना ने कहा, नहीं तो। वे बोले, तुमने कभी कुछ सुना नहीं। लीना के इन्कार करने पर वे लपक कर सोफ़े पर चढ़ बैठे और फिर हाथ-पैरों से कुत्ते की भंगिमा बना कर उसकी आवाज़ निकालनी शुरू की। लीना जी तो चकित रह गईं। उनके मुँह से अचानक निकल पड़ा, तो लोग ठीक ही कहते हैं। अच्छा तो तुम्हें पता है। फिर हंस कर किशोर कुमार ने कहा, तो समझीं, मैं ये सब जान-बूझकर करता हूँ। कभी-कभी लोगों को दूर भगाने के लिए मैं पागलपन करता हूँ।


किशोर कुमार को पेड़-पौधों से काफ़ी लगाव था। पक्षियों और पेड़-पौधों के उन्होंने अलग-अलग नाम रखे थे। किशोर कुमार पत्रकारों और आयकर वालों को काफ़ी दौड़ाते थे। अग्रिम राशि लिए बिना वे गाते नहीं थे, पेट दर्द का बहाना बना घर आ जाते थे। दरअसल दुनिया के धोखे और चालाकियों ने ही उन्हें ऐसा करने पर मजबूर कर दिया था।



एक बार किशोर कुमार बांग्ला फ़िल्मों की नायिका माधवी मुखोपाध्याय के घर ‘मूर एवेन्यू’ डिनर पा जा रहे थे। माधवी जी का ड्राईवर ही गाड़ी चला रहा था। कलकत्ते के भवानीपुर अंचल के एक क्रॉसिंग पर सिग्नल न मिलने के कारण गाड़ी रुकी हुई थी। किशोर कुमार ड्राईवर के साथ वाली सीट पर सामने ही खिड़की के पास बैठे हुए थे। उनकी गाड़ी की बगल में एक टैक्सी आ कर रुकी। एक सरदार जी चालक की सीट पर थे। अचानक किशोर कुमार ने देखा कि सरदार जी अवाक होकर उन्हें देख रहे थे। उन्होंने तुरंत खिड़की से मुंह बाहर निकाल कर कहा, ‘मैं देखने में किशोर कुमार जैसा हूँ न। ड्राईवर हैरान होकर उन्हें देखे जा रहा था। किशोर कुमार ने कई तरह की भाव-भंगिमाएं बनाते हुए कहा, तुम विश्वास नहीं कर रहे हो न ? सच कह रहा हूँ, मैं किशोर कुमार नहीं हूँ। तब ये मान सकते हो कि मैं उनका डुप्लीकेट हूँ। इसके लिए मुझो कितनी परेशानी झेलनी पड़ती है।‘ अंतत: किशोर कुमार की बातों से टैक्सी चालक को यकीन हो गया कि वे किशोर कुमार नहीं है और उसने मुँह घुमा लिया तथा सिग्नल के हरा होने का इंतज़ार करने लगा। जैसे ही सिग्नल मिला किशोर कुमार की गाड़ी चलनी शुरु हो गई। उसी वक्त चलती गाड़ी से मुंह निकाल कर उन्होंने कहा – ‘सरदार जी, देखा कैसे मूर्ख बनाया आपको। मैं ही हूँ असली किशोर कुमार। डुप्लीकेट-डुप्लीकेट कुछ नहीं हूँ।’


कहते हैं किशोर कुमार शिक्षक बनना चाहते थे। वे कहा करते थे कि काश, मैं किसी स्कूल में चित्रकारी सिखाने वाला मास्टर किशोरी लाल होता।


1951 में किशोर कुमार ने रूमा गुहाठाकुरता (अभिनेत्री और गायिका) से शादी की। फिर 1958 में मधुबाला से, तीसरी बार योगिता बाली और मार्च 1980 में लीना चंद्रावरकर से। लेकिन किशोर कुमार का कहना था कि पहली तीनों बार तो रूमा, मधुबाला और योगिता ने मुझसे शादी की थी, मैंने तो एक ही बार शादी की है लीना से।


लता मंगेशकर पुरस्कार के समय वे अनूप कुमार और अशोक कुमार के साथ इंदौर गए। उस दिन किशोर सारी रात गाते रहे। दर्शकों से उन्होंने पूछा, कब तक बैठेंगे आप ? सभी दर्शकों ने ज़ोरदार आवाज़ में कहा, आपके लिए तो हम सारी रात इंतज़ार करेंगे। किशोर कुमार ने जवाब दिया, तो मैं सारी रात गाऊंगा और वे सारी रात गाते रहे थे। अपने स्टेज कार्यक्रमों की शुरूआत वे, ‘मेरे दादा-दादियो, मेरे नाना-नानियो, चाचा-चाचियो, भईया-भाभियो आप सबको खंडवा वाले किशोर कुमार गांगुली का प्रणाम’ इन शब्दों से करते थे। और श्रोताओं की तालियों के जवाब में थैक्यू, धन्यवाद, शुक्रिया, मेहरबानी जैसे संबोधन भी वे गाकर करते थे।


कहते हैं किशोर कुमार ने जब जुहू के अपने ‘गौरीकुंज’ बंगले में रहना शुरु किया तो उन्हें एक सपना आया करता था कि वे गोवा के एक चर्च में फादर हैं और ईसा मसीह के सामने प्रार्थना कर रहे थे। धार्मिक उत्सवों में प्रवचन कर रहे हैं। लोग नतमस्तक होकर उन्हें सुन रहे हैं। बस यहीं आकर रोज़ उनकी नींद खुल जाती। एक दिन उन्होंने बड़े भाई अशोक कुमार से बात की। उनकी सलाह पर वे गोवा गए। काफ़ी दिनों तक घूमने के बाद उन्हें गोवा में वैसा चर्च मिल गया, जैसा सपने में नज़र आता था। वहाँ से लौट कर वे सीथे वर्सोवा बीच पर बने कब्रिस्तान मे गए। वहाँ वे एक कब्र के पास गए और देखा कि उस पर लिखा था, फादर जॉर्ज ब्राउन, जन्म-13 अक्तूबर 1887 : मृत्यु 4 अगस्त 1929 । संयोग की बात देखिए कि जिस दिन फादर की मृत्यु हुई उस दिन किशोर कुमार का जन्म हुआ। फादर का जन्म हुआ था 13 अक्तूबर 1887 को और ठीक 13 अक्तूबर 1987 को किशोर कुमार का निधन हुआ।


12 अक्तूबर 1987 को निर्माता निर्देशक कीर्ती कुमार की फ़िल्म हत्या के लिए संगीतकार बप्पी लहरी के निर्देशन में इंदीवर के लिखे गीत – ‘मैं तू हूँ सबका, मेरा न कोई, मेरे लिए न कोई आँख रोई,’ की उन्होंने रिहर्सल की और 14 अक्तूबर को इसकी रिकॉर्डिंग थी। 13 अक्तूबर को बड़े भाई अशोक कुमार का जन्म दिन था, इसलिए उस दिन उन्होंने छुट्टी ले रखी थी। शाम को वे सपरिवार, दोस्तों-मित्रों के साथ दादा मोनी का जन्म दिन मनाने वाले थे। क़रीब साढ़े तीन बजे उन्हें दिल का दौरा पड़ा और पल भर में ही सबकी आँखों में आँसू छोड़ वे अनंत यात्रा पर निकल गए। ‘चलते-चलते मेरे ये गीत याद रखना, कभी अलविदा न कहना’ या ‘हम लौट आएंगे, तुम यूं ही बुलाते रहना’ कहने वाले किशोर कुमार सबको अलविदा कह गए। फ़िल्म ‘वक्त की आवाज़’ में मिठुन और श्रीदेवी के लिए इंदीवर रचित गीत ‘आ जाओ गुरु, प्यार में डूब जाओ गुरु’ उनका गाया अंतिम गीत था।



कुछ अन्य उल्लेखनीय तथ्य :-



0 किशोर कुमार की फ़िल्म ‘दूर वादियों में कहीं’ में वे खुद ही नायक थे परंतु यह पूर्णत: गीतरहित फ़िल्म थी।

0 1977 में बनी फ़िल्म ‘अमर अकबर एन्थनी’ का गीत ‘हमको तुमसे हो गया है प्यार’ ने हिन्दी फ़िल्म जगत में इतिहास रचा। मु। रफ़ी, मुकेश, किशोर कुमार और स्वर साम्राज्ञी कहलाने वाली लता मंगेशकर इन चार महान कलाकारों तथा दिग्गजों द्वारा एक साथ गाया हुआ यह एकमात्र गीत है। इसके बाद इन्हें एक साथ गाने का मौका नहीं मिला। इस गीत में परवीन बॉबी की आवाज़ भी है।

0 हिन्दी फ़िल्मों में शीर्ष स्तरीय नायक होते हुए भी फ़िल्म ‘मिस मेरी’ में उन्होंने अभिनेत्री रेखा के पिता जैमिनी गणेशन के साथ सहनायक की हास्य भूमिका की थी।

0 1948 में बॉम्बे टॉकीज़ की ‘ज़िद्दी’ बतौर पार्शव गायक उनकी पहली फ़िल्म थी। इसमें उन्होंने पहली बार देव आनंद के लिए गाया और फ़िल्म में माली की छोटी सी भूमिका भी की थी। 1951 में बनी फ़िल्म ‘आंदोलन’ में पहली बार किशोर कुमार नायक बने।

0 होली के गीत जितने किशोर कुमार के लोकप्रिय हुए उतने किसी और गायक के नहीं।

0 खंडवा में मीटर गेज लाईन से इंदौर के क्रिश्चचन कॉलेज जाते समय किशोर कुमार हर स्टेशन पर कंपार्टमेंट बदलते थे और हर डिब्बे में अलग-अलग आवाज़ में बातें किया करते थे।

0 उन्हें मानव कंकाल और खोपड़ियां एकत्र करने का शौक था।

0 पाश्चात्य गायक जिम्मी रोज़र से प्रभावित होकर अरविंद सेन की फ़िल्म मुकद्दर से यूडलिंग आरंभ की, ये यूडलिंग ही उनकी ख़ासियत बनी।

0 फ़िल्म पहली तारीख में गाया उनका गीत ‘खुश है ज़माना आज पहली तारीख है’, रेडियो सिलोन के विदेश विभाग से लगातार 38 सालों तक हर महीने की पहली तारीख को बजता था।

0 रबड़ी, कुल्फी, मलाई खाना उन्हें बेहद पसंद था। पहाड़ों पर घूमने का भी उन्हें बेहद शौक था।

0 ‘कोई हमदम न रहा कोई सहारा न रहा,’ ये गीत 1935 में बनी ‘जीवन नैय्या’ फ़िल्म में अशोक कुमार ने गाया था। बाद में 1961 में किशोर कुमार ने इसे अपनी फ़िल्म ‘झुमरू’ में लिया और यह काफ़ी लोकप्रिय हुआ। यह किशोर कुमार के पसंदीदा गीतों में से एक है।



प्रस्तुति : नीलम शर्मा ‘अंशु’


तथ्य संकलनजनसत्ता, मुंबई के रविवारी सबरंग में प्रकाशित कॉलम ‘जवाब इसाक मुज़ावर के’ तथा विभिन्न फ़िल्मी पत्रिकाएं।