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18 सितंबर 2009

कैसे कैसे रिश्ते
- नीलम शर्मा ‘अंशु’

रोज़ की भाँति नीलोफ़र दफ़्तर आई। आते ही मेज़ पर पड़े ख़तों पर नज़र पड़ी। उनमें से छाँटकर एक ख़त उसने पहले खोला और एक ही साँस में पढ़ डाला। ख़त पढ़ते ही उसकी आँखें छलछला आईं। साथ वाली सीट पर बैठने वाली मीता अभी आई नहीं थी। सामने वाली सीट पर मिश्रा जी अख़बार पढ़ने में तल्लीन थे। उनका ध्यान नीलोफ़र की तरफ नहीं गया। वे अपने में मग्न अख़बार पढ़ते रहे। चंद लम्हों बाद नीलोफ़र के आँसू खुद-ब-खुद थम गए। ख़त चंडीगढ़ से आया था, भंडारी अंकल का था। वे राजकिशोर अंकल के सहकर्मी भी रह चुके थे।
ख़त पढ़ते ही उसे बेचैनी सी महसूस होने लगी। यकायक आई इस ख़बर ने उसके दिल-ओ-दिमाग में उथल-पुथल मचा दी थी। चाहते हुए भी उसका दिल इस बात पर यकीन नहीं कर पा रहा था। यकायक अतीत की कुछ घटनाएं फ्लैशबैक की भाँति उसके स्मृतिपटल पर दौड़ने लगीं। नज़रों के समक्ष ‘दैनिक प्रभात’ का वह विज्ञापन था –‘निजी दफ्तर के लिए कुछ क्लर्क चाहिएं। इच्छुक उम्मीदवार विस्तृत विवरण सहित आवेदन करें।’
नीलोफ़र ग्रेजुएट थी। साल भर पहले वह चंडीगढ़ से ग्रेजुएशन कर जलपाईगुड़ी आ गई थी। मक़सद था दुर्गा पूजा देखना और सालों के अंतराल के बाद अपनी जन्मभूमि का सैर-सपाटा। इसी शहर में उसकी पैदाईश हुई थी। पिता जलपाईगुड़ी स्थित एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में कार्यरत थे। नीलोफ़र की स्कूली तालीम पूरी होते ही उसकी कॉलेज की पढ़ाई के लिए पिता ने परिवार को चंडीगढ़ भेज दिया था। दुर्गा पूजा के दौरान ही अचानक माँ की तबीयत ख़राब हो गई। पेट में दर्द उठने लगा। सिलीगुड़ी नर्सिंग होम ले जाया गया। डॉक्टरों ने तुरंत ऑप्रेशन करवाने का सुझाव दिया। आनन-फानन में ऑप्रेशन भी हो गया। डॉक्टर ने कुछ ज़रूरी हिदायतों के साथ कुछ दिनों बाद छुट्टी दे दी। साथ ही ज़्यादा लंबा सफ़र करने की निषेधी और साल भर के बेड रेस्ट की सलाह भी।
नीलोफ़र का सार कार्यक्रम गड़बड़ा गया। चंडीगढ़ में वह अपनी सहेलियों से वादा कर आई थी कि महीने भर के सैर-सपाटे के बाद लौट कर उनके साथ एम। ए. में दाख़िला लेगी। पर, अब डॉक्टर की हिदायतों का पालन ज़रूरी था। माँ को आराम और देखभाल की ज़रूरत थी। फिर भी चंडीगढ़ जाकर पढ़ाई पूरी करने को उसका मन मचल उठता था। यही सोचकर उसने ‘दैनिक प्रभात’ के उस विज्ञापन के लिए आवेदन कर डाला था। कुछ दिनों बाद उसका जवाब भी आ पहुँचा। पत्र राजकिशोर जी का था, चंडीगढ़ से। उन्होंने उत्सुकतावश नीलोफ़र के आवेदन का जवाब दिया था-
‘बेटा! कहाँ जलपाईगुड़ी और कहाँ चंडीगढ़ के लिए आवेदन किया है। हमारी तो एक छोटी सी सामाजिक संस्था है – ‘परिवार मिलन’, जो लोगों की वैवाहिक समस्याओं का समाधान करती है। मात्र सात-आठ सौ रुपये जेब-खर्च ही दे पाते हैं हम। अत: इस काम के लिए स्थानीय बच्चे ही सूट करते हैं। इतनी दूर से तुम्हारा आना ठीक न होग। तुममें योग्यता है, एक से बढ़कर एक नौकरियां मिल जाएंगी तुम्हें। तुम्हारी डिग्री तो चंडीगढ़ विश्वविद्यालय की है, पर तुम इतनी दूर कैसे जा पहुँची ? ईश्वर ने चाहा तो बेटा, तु्म्हें नौकरी ज़रूर मिल जाएगी। चाहो तो हमारे साथ यूं ही पत्राचार बरक़रार रखो, हमें खुशी होगी।’ बस यूं नीलोफ़र का राजकिशोर जी के साथ पत्राचार का सिलसिला शुरू हुआ। वह उन्हें अपने सगे अंकल से बढ़कर मानती। वे भी पत्रों में ढेर सारा प्यार और अपनत्व उड़ेल भेजते। देखते-देखते वक़्त गुज़रता जा रहा था। इसी बीच नीलोफ़र को भारत सरकार की नौकरी मिल गई और वह जलपाईगुड़ी से कलकत्ते आ गई। छोटे से शहर से महानगरीय दुनिया में आगमन। मानो छोटी सी मछली को विशाल समंदर में छोड़ दिया गया हो। राजकिशोर अंकल के साथ ख़तों का सिलसिला जारी रहा। अंकल के ख़त आते – ‘बेटा ! जब भी टी।वी। पर कलकत्ते की कोई ख़बर सुनता हूँ या कोई दृश्य दिखाया जाता है तो मैं उस भीड़ में अपनी नीलोफ़र बिटिया को तलाशता हूँ कि इस भीड़ में कहीं न कहीं वह भी शामिल होगी। तुम मुझे अपनी तस्वीर भेज दो ताकि भीड़ में मैं अपनी बिटिया को पहचान तो लूं।’
राजकिशोर जी ‘दैनिक प्रभात’ में उप संपादक थे, साथ ही वे ‘परिवार मिलन’ नामक अपनी सामाजिक संस्था का दफ़्तर भी चलाते थे। बतौर निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव भी लड़ते और समाज सेवा भी जम कर करते। ‘परिवार मिलन’ के माध्यम से लोगों के बिखरे परिवार को समेटने का प्रयास करते। खुद नि:संतान थे, पर देश के कोने-कोने में नीलोफ़र जैसी उनकी अनेकों संताने थीं। शायद इसी लिए उन्हें कभी संतान की कमी महसूस नही हुई। उनका हमेशा ख़त आता, ‘बेटा ! दफ़तर से छुट्टी लेकर पंजाब घूम जाओ।’
अचानक दो साल बाद नीलोफ़र का पंजाब जाने का प्रोग्राम बना। उन दिनों पंजाब के हालात अच्छे नहीं थे। अत: वहां जाकर भी राजकिशोर जी से मिलने का सबब न बना। अक्सर अंकल के ख़त में इस बात का ज़िक्र रहता, ‘बेटा ! किसी दिन तुम्हें सूचना मिलेगी कि तुम्हारे अंकल की हत्या हो गई है और तुमसे फिर कभी मुलाक़ात भी नही हो पाएगी।’ उनका नाम हिट लिस्ट में था। इससे पूर्व ‘दैनिक प्रभात’ के संपादक पर क़ातिलाना हमला कर उनकी इहलीला समाप्त कर दी गई थी। राजकिशोर जी की क़िस्मत में अभी चंद साँसें और लिखी थीं, शायद इसी लिए संपादक महोदय के साथ एक ही गाड़ी में दफ़्तर से लौटते वक्त वे कार्यवश पहले स्टॉप पर उतर गए थे। पंजाब जाकर भी उनसे नीलोफ़र के न मिल पाने के पीछे यही वजह थी। पिता का कहना था, हालात अच्छे नहीं हैं तिस पर जिस आदमी का नाम हिट लिस्ट में हो उससे मिलने का ख़तरा क़तई मोल नहीं लेना चाहिए। ख़ैर ! दो सप्ताह तक अन्य रिश्तेदारों के यहाँ घूम-फिर कर वह कलकत्ता लौट आई। आते ही अंकल को ख़त लिखा और न मिल पाने के लिए क्षमा याचना की। किशोरी अंकल का ख़त आया, ‘पगली, इतने पास आकर भी बिना मिले चली गई। अरे, इतनी व्यस्तता थी! तुम नहीं आ सकती थी तो मुझे सूचित किया होता, मैं ही समय निकाल कर तुमसे मिलने चला आता।’ मगर नीलोफ़र क्या करती ? चाहकर भी, न मिल पाने की असली वजह न बता पाई। ख़ैर! इसी तरह दो साल और गुज़र गए।
फिर अचानक चचेरे भाई की शादी के मौके पर नीलोफ़र अपने बड़े भाई के साथ शादी में शरीक होने जालंधर चली गई। जाने से पूर्व ही भाई से वादा लिया कि वह उसे किशोरी अंकल से मिलवाने चंडीगढ़ ज़रूर ले जाएगा। भाई भला क्यों इन्कार करता, वह तो उसे पहल ही फटकार चुका था कि जो व्यक्ति उसे सगी बेटी से भी ज़्यादा चाहता है, ममता भरे, अपनत्व भरे ख़त लिखता है, भला वह ऐसे शख़्स से मिले बिना ही क्यों चली आई ?
एक दिन समय निकाल कर दोनों भाई-बहन चंडीगढ़ ‘परिवार मिलन’ के दफ़्तर जा पहुँचे। किशोरी अंकल उस वक्त दफ़्तर में नहीं थे, उनकी सहायक शालिनी ने बताया कि वे आधे घंटे तक आ जाएंगे। जैसे ही नीलोफ़र ने अपना परिचय दिया तो शालिनी की खुशी का ठिकाना न रहा क्योंकि अंकल के माध्यम से वह नीलोफ़र से परिचित थी। कभी-कभी समय के अभाव में किशोरी अंकल सोनिया और शालिनी से ही ख़त लिखवा भेजते ताकि ख़त न लिखने की शिकायत उनकी नीलोफ़र बिटिया न कर सके।
किशोरी जी जब तशरीफ़ लाए तो शालिनी ने कहा, ‘ये लोग काफ़ी समय से आपका इंतज़ार कर रहे हैं।’ किशोरी अंकल ने पल भर के लिए ग़ौर से देखा और फिर कहा, ‘तुम कलकत्ते से मेरी नीलोफ़र बिटिया हो न ?’ फिर वे बच्चे की भाँति मचल उठे। नीलोफ़र और दीपक देख-देख कर हैरान होते रहे कि एक पचास-पचपन वर्षीय व्यक्ति इतना जीवंत भी हो सकता है। वे तीन दिन अंकल के साथ रहे। अंकल ने सारा शहर घुमाया, मुख्य-मुख्य स्थान दिखाए। क़ाफ़ी मौज़-मस्ती करवाई दोनों भाई-बहनों को। राह में जिससे भी मुलाकात होती कहते, ‘मिलो मेरी बिटिया से कलकत्ते से आई है। नौकरी करती है वहाँ।’ वे काफ़ी उत्साहित लग रहे थे।

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उस दिन वे लगेज सहित दोनों को सीधे अपने छोटे भाई के घर ले गए। दोपहर का खाना खाकर कुछ देर आराम करने के बाद शाम को इधर-उधर घुमाया और फिर अपने घर ले गए। ताला लगा था। डुप्लीकेट चाबी से ताला खोला, घर दिखाया। आंटी घर पर नहीं थीं, फिर से वे लोग अंकल के भाई के घर लौट आए। नीलोफ़र को बड़ा अटपटा सा लग रहा था कि अपने घर की बजाए उन्होंने भाई के घर क्यों ठहराया ? अगले दिन भाई के परिवार को शादी पर शहर से बाहर जाना था। अत: उस दिन शाम को वे उन्हें अपने घर लिवा लाए। आँटी आँगन में कपड़े धो रही थीं, उनसे परिचय करवाते हुए कहा – ‘यह मेरी वही कलकत्ते वाली बेटी है, मैंने तुम्हें बताया था न!’ सुमित्रा आँटी ने चाय बनाई, सबने मिल कर चाय पी। कुछ देर बाद उन्होंने आँटी से रात का खाना तैयार करने को कहा। फ्रिज से सरसों का साग निकालते हुए आँटी ने अंकल से पूछा – ‘ आप खाएंगे न ?’ जवाब में अंकल ने कहा – ‘हाँ बच्चों का साथ देने के लिए एक-आधी चपाती मैं भी खा लूंगा।’ नीलोफ़र को यह सब बड़ा अटपटा सा लगा रहा था। उसने दीपक से कहा – ‘लगता है मामला गड़बड़ है, भला कोई इस तरह भी पति से पूछता है कि तुम खाना खाओगे या नहीं ?’ दोनों ने सोच-विचार कर महसूस किया कि दाल में कुछ काला है, क्यों न हम खाना न खाने का बहाना गढ़ दें कि बाहर घूमते-फिरते बहुत कुछ खा लिया है, अब भूख नहीं है। ख़ैर ! नीलोफ़र रसोई में आँटी के पास जा पहुँची और भूख न होने की बात कही। उन्होंने कहा – ‘ठीक है, एक-एक चपाती ही खा लेना।’ सबने मिलकर खाना खाया। दीपक और नीलोफ़र की वाकई भूख ग़ायब हो चुकी थी, वे बड़ी मुश्किल से अंकल का मन रखने के लिए एक-एक निवाला निगल रहे थे। नीलोफ़र को आँटी की व्यवहार न जाने कैसा-कैसा लग रहा था। उसे लगा, उन लोगों ने घर आकर ग़लती की है। अंकल ने इतने प्यार से रुकने का अनुरोध किया था, इसलिए वे रुक गए थे। रात के खाने से निपटने के पश्चात् सोने की तैयारी शुरू हुई। अंकल और दीपक एक कमरे में सो गए। नीलोफ़र का बिस्तर आँटी ने दूसरे कमरे में लगा दिया। कुछ देर तक बात-चीत करने के बाद वे बिस्तर उठा कर जाने लगीं तो नीलोफ़र से रहा न गया। घबरा कर पूछा – ‘आँटी आप कहाँ चलीं ?’
छत पर बेटा, मुझे तो छत पर सोने की आदत है। वहीं चारपाई पर बिस्तर लगा कर सोती हूँ। हालाँकि पंजाब में गर्मियों में खुली छत या आँगन में सोने का ही चलन है, मगर नीलोफ़र को आँटी की अक्ल पर तरस आ रहा था। अजीब महिला हैं, एक लड़की जो कि घर में बतौर मेहमान आई हुई है और पहली बार आई है, उसे वे अकेली नीचे छोड़ ख़ुद छत पर सोने जा रही हैं। नीलोफ़र ने कहा, तो मैं भी आपके साथ छत पर चलती हूँ। परंतु छत पर एक ही चारपाई थी, दो जने भला कैसे सो सकते थे ? नीलोफ़र ने कहा, छत पर एक ही चारपाई है, तो क्यों नहीं आप भी नीचे ही कमरे में सो जाती ? इतना बड़ा पलंग है, दोनों साथ-साथ लेट जाएंगी, कोई मुश्किल नहीं होगी। ख़ैर नीलोफ़र की बात उन्हें माननी ही पड़ी, भले ही अनिच्छा से। उस रात वे दोनों काफ़ी देर तक बात-चीत करती रहीं, फिर पता नहीं कब आँख लग गई।
सुबह आँटी उठीं, नहा-धोकर चाय बनाई। नीलोफ़र ने उनके साथ चाय पी। फिर उन्हें डयूटी पर स्कूल जाना था, वे अध्यापिका थीं। कुछ हद तक रात का नज़ारा याद कर नीलोफ़र को कुछ-कुछ माज़रा समझ में आ गया था। अत: उसने आँटी को नाश्ता बनाने के लिए मना किया और कहा आप नाश्ता कर यथासमय डयूटी चली जाएं। आँटी के जाने के बाद दीपक तथा अंकल भी नहा-धोकर तैयार हो गए। अंकल ने ब्रेड और जेली नीलोफ़र के हाथ में थमाते हुए कहा – ‘बेटा ! चलो अब हम लोग नाश्ता कर लें, आँटी तो चली गईं। आओ, मैं तुम्हें अपना किचन दिखा दूं। तुम चाय बना लो और ब्रेड सेक लो। अपनी आँटी के व्यवहार का बुरा मत मानना। बस यूं ही अपना मस्त-मौला ज़िंदगी गुज़र रही है। ईश्वर ने जिस रज़ा में रखा, हम खुश हैं।’
नाश्ते के बाद अंकल उन्हे फिर ‘परिवार मिलन’ के दफ़्तर ले गए। नीलोफ़र को एक प्यारा सा तोहफ़ा लाकर दिया। उन्हें रवानगी की इजाज़त दे विदा किया। आँटी को तो नीलोफ़र सुबह ही बता चुकी थी कि आपके स्कूल से लौटने तक तो हम रुक नहीं पाएंगे। अत: उसी वक्त उनसे इजाज़त ले ली थी।
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नीलोफ़र ने आँटी के साथ हुई संक्षिप्त बात-चीत से यही निष्कर्ष निकाला कि कहीं तो, दोनों पति-पत्नी के बीच एक दूरी सी है। एक ही छत के नीचे रहते हुए भी दोनों अजनबी से थे। दोनों की रसोईयां अलग थीं। शायद इस सबकी ठोस वजह थी, उनके इतने वर्षों के वैवाहिक जीवन में, उनके आँगन में किसी नन्हीं किलकारी की गूंज का अभाव। संतान ही एकमात्र ऐसी कड़ी है, जो पति-पत्नी को एक सूत्र में आबद्ध किए रखती है। किशोरी अंकल ने इसे विधि का विधान समझ संतोष कर लिया था। भगवान ने जो दिया उसे हँसकर स्वीकार किया, जो नहीं दिया उस पर किसी प्रकार का गिला नहीं किया। वे अख़बार की नौकरी, निजी दफ़्तर, समाज सेवा के कार्यों में व्यस्त रहते। यानी ख़ुद को ज़्यादा से ज़्यादा व्यस्त रखने का ज़रिया ढूँढ लिया था। पत्नी अध्यापिका थीं, सुबह आठ बजे निकल जातीं, दोपहर दो़-तीन बजे तक लौट आतीं। उन्होंने भी स्वयं को स्कूल में व्यस्त रखने की कोशिश की। ख़ैर ! नारी फिर भी नारी है। बहन, बेटी, पत्नी के बाद जननी बनकर ही पर परिपूर्ण बनती है। शायद यही कमी उन्हें सालती रही होगी और इस बात को उन्होंने इतनी गंभीरता से दिल को लगा लिया होगा। परिणामस्वरूप एक ही पेड़ की, एक ही शाख पर, एक ही नीड़ में रहते हुए भी वे परस्पर दूर-दूर थे।
नीलोफ़र को जहाँ पहले अंकल से न मिलने का दु:ख सालता रहता था, वहीं अब मिलकर भी दु:ख हो रहा था। उनके पारिवारिक विघटन के विषय में जानकर उसे हार्दिक पीड़ा हुई। इससे पूर्व, पाँच साल से नियमित पत्राचार में उन्होंने कभी इस बात का आभास तक न होने दिया था कि वे जीवन में इस दौर से गु़ज़र रहे हैं। पत्राचार द्वारा किशोरी अंकल के व्यक्तित्व के विषय में जो छवि नीलोफ़र के मन में बनी थी, ठीक वैसा ही पाया – हँसमुख, तनाव रहित।
नीलोफ़र के हृदय में अंकल के प्रति श्रद्धा और बढ़ गई कि ऐसी स्थिति में उन्होंने संतान की ख़्वाहिश में दूसरी शादी जैसी हरकत नहीं की, जैसा कि साधारणत: लोग कर बैठते हैं। उनका मानना था कि अगर भाग्य में संतान सुख लिखा होता तो इसी गुलशन में फूल खिलता। उन्हें कोई मलाल न था । मगर उनकी पत्नी चाहकर भी शायद ईश्वर को इस निर्णय को स्वीकार न कर पाई थीं। नीलोफ़र ने देखा कि अंकल के स्वभाव के विपरीत वे चिड़चिड़ी सी, रूखे स्वभाव वाली बन चुकी थीं। मानो ईश्वर द्वारा दी गई साँसों को बस औपचारिकतावश गिन रहीं हों। फलत: दोनों के बीच इस मामूली सी कमी ने गहरी खाई उत्पन्न कर दी थी। कुदरत का कैसा क्रूर मज़ाक था कि यह व्यक्ति जो परिवार मिलन के माध्यम से दूसरों के बिखरे परिवार को एक सूत्र में आबद्ध करने का प्रयत्न करता है उसका अपना ही गुलशन वीरान था। एक ही घरौंदे में एक ही छत के नीचे रहते हुए भी वे कितने बेगाने से थे।
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समय की धारा अपने वेग से बहती रही। फिर समाचार मिला कि अंकल ने दैनिक प्रभात की नौकरी छोड़ कर अपना अख़बार निकालना शुरू कर दिया है, नया ज़माना। फलत: उनकी व्यस्तताएं बढ़ती गईं, स्वास्थ्य भी ख़राब रहने लगा था। दो बार दिल का दौरा भी पड़ चुका था।
भंडारी अंकल का ख़त हाथ में थामे जब नीलोफ़र अतीत से वर्तमान में लौटी तो उसका दिल उनक प्रति आभार महसूस कर रहा था। भंडारी जी दो महीने के आऊटडोर टुअर के बाद जब चंडीगढ़ लौटे तो समाचार पाकर उन्होंने तुरंत नीलोफ़र को सूचित करना मुनासिब समझते हुए लिखा था, ‘लौट कर सुना कि दो माह पूर्व मेरे अज़ी़ज़ दोस्त और तु्म्हारे अंकल का अस्वस्थता के काराण निधन हो गया। सोचा तुम्हें कौन ख़बर करेगा, इसीलिए तुम्हें सूचित करना ज़रूरी समझा।’ नीलोफ़र सोच रही थी कि भंडारी अंकल ने सूचित न किया होता शायद वह कभी न जान पाती कि उसके अंकल अब इस दुनिया में नहीं रहे, तभी तो उनके ख़त नहीं आते। पगली उनसे ख़त न लिखने की शिकायत करती रह जाती। अत: उसने इस सूचना के लिए भंडारी अंकल को शुक्रिए का ख़त लिखना चाहा और उसके हाथ बरबस ही क़ाग़ज़-क़लम की ओर बढ़ गए। 

24 अगस्त 2009

आओ, फिर मिल बैठें - Lets Meet Again !

दोस्तो, आजकल हमारा दायरा इतना विस्तृत हो गया है कि हम हिंदुस्तान के अलग-अलग हिस्सों में विचरण करते हैं। ऐसे में कई नए दोस्त, नए रिश्ते बनते हैं और कई बार न चाहते हुए भी परिस्थितियोंवश पुराने संपर्क छूट से जाते हैं। तो ऐसे में मन में ख़याल आया कि आज तो इंटरनेट के माध्यम से यह विशाल जगत बहुत ही सिमट गया है तो क्यों न यह कोशिश की जाए कि " आओ, फिर मिल बैठें (Lets Meet Again) " के बहाने अगर फिर उन्हीं बिछड़े साथियों से मिलने का संयोग बन जाए। तो आप सभी के लिए खुला मंच है यह कॉलम, स्वागत है आप सबका इस मंच पर। क्या पता किसे कौन बिछड़ा मिल जाए इस बहाने। आप अपने आलेख fmrjneelamanshu@gmail.com के ज़रिए मुझ तक भेज सकते हैं।

तो शुरुआत खुद से ही करू ....

होश संभलने तक मेरा स्कूली शिक्षा का समय दिसंबर 1980 तक पश्चिम बंगाल के दुआर्स अंचल के रेलवे शहर अलीपुरद्वार जंशन में गुज़रा। यह मेरा जन्म स्थान है। फिर 1980 दिसंबर से अगस्त 1986 तक पंजाब के दोआबा अंचल के नवांशहर में कॉलेज शिक्षा तक, 1986 सितंबर से 1989 मार्च तक पुन: अलीपुरद्वार जंशन मे, और मार्च 1989 से अब कर्मस्थल महानगर कोलकाता है।
बचपन के स्कूली दोस्तों के साथ पंजाब में पत्राचार से संपर्क रहा, परंतु पंजाब से वापस आने पर उनके परिवार कहीं और शिफ्ट हो चुके थे। हम लोग निर्मला गर्लस् हाई स्कूल में पढ़ते थे। उसके पहले प्राईमरी में शिवबाड़ी स्कूल में। राधा दास (पिता श्री रघुनी दास) और आरती राय (पिता स्व. कमलकांत राय, टी.टी.ई थे) प्राइमरी के दिनों की दोस्त थीं। और राधा की शादी हो गई थी और वह गुवाहाटी में थी, वहां उसके पति बैंक में कार्यरत थे। एक बार वह मिलने आई थी फिर बाद की कोई ख़बर नहीं। आरती के पिता का देहांत हो गया था तो परिवार वापिस बनारस चला गया( बौलिया बाग)। बाद में उसके बड़े भाई आलोक राय उर्फ़ बबलू को पिता के स्थान पर Compassionate ground पर टी.टी.ई. पद पर नियुक्ति मिली तो वह अलीपुरद्वार में दादी के साथ रहने आया था। फिर बनारस ट्रांसफर करवा लिया था। पंजाब से लौटने पर सूचना मिली थी तो मैं उन लोगों से 1986 में मिली थी। तभी पता चला था कि आरती की भी शादी हो गई है और वह डॉक्टर है। उसके दो प्यारे-प्यारे बच्चे हैं। फिर आज तक किसी की कोई ख़बर नहीं। हाँ, जब कभी ट्रेन बनारस स्टेशन पर रुकती है तो उन दिनों की याद हो आती है। बचपन या स्कूली दिनों की दोस्ती कितनी निश्छल हुआ करती है, इसका अहसास इस उम्र में बखूबी हो रहा है। 1994 के बाद 2005 में अलीपुरद्वार जाना हुआ था। 2005 के बाद अब तक तो नहीं। हां, पुराने लोगों को ढूँढ निकालने का मेरा अभी भी मोहभंग नहीं हुआ है लेकिन उसके बाद भी (वे) लोग संपर्क-सूत्र बनाए रखने में असफल रहते हैं। यह अलग बात है कि सभी लोग नेट इस्तेमाल नहीं करते, नहीं भी जानते।
पंजाब की दोस्तों सतवंत कौर और दिनेश कौर(बेबी) से 1986 के बाद कभी मुलाक़ात नहीं हुई, कॉलेज का हमारा काफ़ी यादगार साथ रहा। दिनेश शादी के बाद कैनेडा चली गई, उसने कभी मेरा संपर्क सूत्र खोजने की ज़रूरत महसूस नहीं की, यही कहूंगी क्योंकि पंजाब से अभी भी हमारा संपर्क है। और सतवंत लंदन में है। मैं जब भी पंजाब जाती हूं, सतवंत के घर जाकर उसकी मम्मी व भाई से ज़रूर मिलती हूँ। ऐसा लगता है मानो उसीसे मुलाक़ात हो गई। वह भी जब पंजाब जाती है तो यह जानते हुए भी कि नीलम वहां नहीं है वह हमारे मुहल्ले में ज़रूर जाती है क्या पता मेरे दादा जी दिख जाएं तो उनसे हाल-चाल पूछ ले। हां, हम कभी- कभी फोन पर बात कर लेते हैं। अभी तो उसने ईमेल करना सीख लिया है महीनों बाद कभी-कभी अवश्य मेल कर देती है।
सतवंत के भाई की भी शादी हो चुकी थी। उनके मुहल्ले में कई नए-नए मकान बन गए थे. कई साल पहले उनके घर में प्रवेश किया तो भाभी कपड़े धो रही थीं। जब मैंने पूछा कि मोहन सिंह का ही घर है न यह। और आगे बढ़कर देखा आंटी जी चारपाई पर बैठी कुछ काम कर रही थीं। इससे पहले कि मैं आंटी को संबोधन करूं पीछे से भाभी ने कहा, आप नीलम दीदी हैं न। मैंने पूछा, आपको कैसे पता, हम तो कभी मिले भी नहीं। जवाब में उन्होंने कहा, दीदी जब आती हैं तो आपकी इतनी बातें करती हैं कि मैं देखते ही आपको पहचान गई। उनकी बच्चियां भी अपनी बुआ की सहेली से कितनी गर्मजोशी से घुल-मिल गई थीं। फिर बाद में सतवंत ने फोन पर सूचित किया कि एक सड़क हादसे में उस भाभी का निधन हो गया। बेटियों और माँ के साथ सवार गाड़ी में सिर्फ़ उनकी मौत हो गई। यानी तीन पीढ़ियां एक साथ थी और बीच की पीढ़ी साथ छोड़ गई।
1996 में सरकारी क्वार्टर में टालीगंज में रहा करते थे हम। उन दिनों हमारे पड़ोस में रहने आए थे हमारे सिस्टर कन्सर्न के मिस्टर प्रकाश वंजारी। उनसे हमारे बहुत ही अच्छे संबंध बन गए थे। वे सपरिवार तीन महीनों तक उस क्वार्टर में थे, फिर उनका पुणे तबादला हो गया था। शोभा भाभी की मेरे मम्मी से इतनी आत्मीयता हो गई थी कि कभी चलो आंटी, दूध लाने चलते हैं, बाज़ार से सब्जी ले आते हैं, लॉन्ड्री से कपड़े लाने हैं। वे हरदम मेरी मम्मी के साथ इस तरह नज़र आती कि लोग मुझे कम उन्हें ही ज़्यादा जानते थे। मम्मी से पूछा करते - तो ये हैं आपकी बेटी। और बेटी को कोई जानता ही नहीं क्योंकि मैं तो दिन भर ऑफिस में रहती थी। उनकी एक नन्हीं से बिटिया थी - परावदा। ढाई-तीन साल की रही होगी। भाई साहब मराठी भाषी और शोभा भाभी हिन्दी भाषी। परावदा मां से हिन्दी में और पापा से मराठी में बात करती और हम वहीं बैठे होते तो हमारे साथ भी हिन्दी में। इनती छोटी सी बच्ची कितनी आसानी से तुरंत एक भाषा से दूसरी भाषा में खुद कन्वर्ट कर लिया करती थी। और उसकी एक बात मुझे बहुत मज़ेदार लगती थी, मुझे कहती - आंटी तुम बंगाली ? मेरे हां कहने पर कहती- नहीं, मुझे मालूम है मेरे पापा मराठी, मेरी मम्मी हिन्दी और आप पंजाबी। ख़ैर कोलकाता छोड़ने के बाद उन्होंने कभी संपर्क नहीं किया। आदत के अनुसार मैंने ही एक बार उन्हें पुणे के ऑफिस का फोन नंबर तलाश कर फोन किया। अपना नंबर भी दिया पर जनाब के पास वह सुरक्षित नहीं रह पाया क्योंकि फिर उनकी तरफ से कोई संपर्क नहीं किया गया। अप्रैल-मई 2009 में मैंने नेट पर यूं ही अपने उस विभाग की वेबसाइट खोली तो सिस्टर कन्सर्न होने के नाते फिर से मिस्टर प्रकाश वंजारी जी का नाम दिख गया और पाया कि वे आजकल पुणे की बजाय मुंबई में है। मैंने विभागीय ईमेल आईडी पर जून-जुलाई में उनका ट्रांसफर पुन: कोलकाता हो गया। जुलाई में उन्होंने मेल देखा और मेरे वर्तमान ऑफिस के एक ट्रेनिंग सेंटर का नेट से फोन नंबर पाकर वहां फोन किया। वहां से नंबर लेकर उन्होंने मेरे दफ्तर का फोन मिलाया तो मुझे आउट ऑफ स्टेशन पाया। मुझसे मोबाइल पर बड़ी गर्मजोशी से बात हुई। उनकी व्यग्रता को देख, मैं जिस दिन कोलकाता लौटी उसी शाम उन्हें घर पर आमंत्रित किया। तो पिछले बारह वर्षों की बातें हुई। भाभी कह रही थी - आंटी आपको पता नहीं, मैं आपको वहां कितना मिस करती थी, आप नहीं जानती मैं आपको बहुत प्यार करती हूं। मैंने चुटकी लेते हुए कहा, तभी तो इतने साल लग गए संपर्क सूत्र बनाने में। ख़ैर, उस नन्हीं परावदा ने अब कोलकाता के कॉलेज में प्रवेश लिया है। अब बहुत खूबसूरत और गोलमटोल सी हो गई है। कोलकाता आकर पापा के साथ मिलकर नेट पर नीलम शर्मा को ढूंढकर जितनी जगह फोन लगाया, रॉन्ग नंबर ही लगा।
एक दोस्त और है जो हौज ख़ास दिल्ली में रहती है मीनाक्षी सहगल। जब भी दिल्ली जाती हूं तो मिलने का वक्त भले ही न मिले लेकिन मैं फोन पर उससे बात ज़रूर कर लेती हूं। पिछले महीने दिल्ली गई तो इस बार फोन पर बात भी न हो सकी शायद उसका नंबर बदल गया हो। ख़ैर ये तो रही दूसरे शहरों और विदेशों में रहने वाले दोस्तों की बात। कलकत्ते की दोस्त भी संपर्क बनाए रखने में आलसी है। फोन तक नहीं कर पातीं। व्यस्तता का बहाना। मैं तो कहती हूं कि काम करने का कोई बहाना नहीं, काम न करने के सैंकड़ों बहाने। रूमा दी और मैत्री दी इन्हीं में शामिल हैं। एक बार अपनी एक पुस्तक के लोकार्पण के मौके पर 2003 में मैत्री को मैंने उसकी बड़ा बाजा़र की ब्रांच से ढूंढ निकाला(यू.बी.आई में)। उसने पूछा - तूने मेरा पता कैसे लगाया। मैंने कहा, पत्रकार हूँ न, तो क्या मुश्किल है, बस पता होना चाहिए काम कैसे हो सकता है। ख़ैर वह प्रोग्राम में आई भी नहीं और अब कोई संपर्क भी नहीं रहा। फिर मैं सोचती हूं कि कुछ भी इकतरफा बहुत दिनों तक नहीं चल सकता। क्या मैंने ही ठेका ले रखा है सबसे संपर्क सूत्र बनाए रखने का। लेकिन भगवान ने दिल ही ऐसा दिया है कि मानता ही नहीं, पता है आज के ज़माने में जज़बातों की कोई कद्र नहीं हम लोग इस ज़माने में मिसफिट हैं। लेकिन कल अचानक फिर से याद हो आई तो सोचा क्यों नहीं ऐसे मंच को ज़रिया बनाए जाए ताकि मेरे जैसे दूसरे लोग भी अपने बिछड़े साथियों को तलाश सकें। देखें यह कोशिश कितनी सार्थक होती है जबकि लोग कितनी आसानी से कह देते हैं कि व्यस्तता इतनी है कि समय ही नहीं मिलता। लेकिन मुझसे रहा नहीं जाता फिर भी कभी-कभी पुराने परिचितों को नंबर मिलाकर क्लास ले ही लेती हूं, यह जानते हुए कि लोग चिकने घड़े हैं उन्हें कुछ फर्क ही नहीं पड़ता। इस वक्त अगर मैं यह सब लिखने बैठी हूं तो पता नहीं कितने दूसरे कामों से वक्त चुराकर इसमें लगा रही हूं। कुछ लोगों के नज़रिये से यह समय की बर्बादी भी हो सकती है। लेकिन लोग आजकल कितने संकुचित हो गए हैं, पहले जैसी गरमाहट रही ही नहीं रिश्तों की। मुझे याद है छोटे शहरों में कितनी आत्मीयता हुआ करती थी, सभी सबको जानते हैं। जब मुझे नौकरी मिली थी तो सारे शहर को ख़बर हो गई थी। उस वक्त वहां के कुछ साथियों ने कहा भी था, कलकत्ते जा रही हो वहां, यहां जैसा अपनापन नहीं मिलेगा। सोचती हूं आज लोग किसी से बात करते वक्त भी हिसाब-किताब ही करते हैं कि इससे मुझे कितना फ़ायदा हो सकता है। छोटा सा उदाहरण दूं - मेट्रो की ट्रेन हर छह मिनट के अंतराल में आती है। कभी कोई परिचित मिल जाए तो मैं उससे बात-चीत करने के लिए वह ट्रेन छोड़ देती हूं चलों अगली से चली जाऊंगी लेकिन लोग इतना भी नहीं करते। पता नहीं उन्हें ज़िंदगी की किस दौड़ में पीछे रह जाने का डर बना रहता है। अरे रोज तो आप उसी निर्धारित और निश्चित समय पर जाते हो, एक दिन दस मिनट लेट हो गए तो क्या हुआ।
-नीलम शर्मा 'अंशु'
(29-08-2009)

23 अगस्त 2009

अगस्त के एक ही हफ्ते में कोलकाता में
रेलवे के दो महत्वपूर्ण कदम

(क) हेरिटेज स्पेशल :
16 अगस्त को कोलकाता की जनता को सुखद आश्चर्य की अनुभूति हुई । 155 वर्ष पूर्व 15 अगस्त 1854 को हावड़ा से हुगली (क़रीब 24 मील) तक स्टीम इंजन से चलने वाली रेल चलाई गई थी । पूर्व रेलवे की 155 वीं वर्षगाँठ के अवसर पर उसी स्टीम इंजन से हेरिटेज स्पेशल ट्रेन (17 बोगियों वाली) हावड़ा से बंडेल के लिए चलाई गई । उपस्थित सभी ने रेल मंत्री की इस पहल की सराहना की । यह भी घोषणा की गई कि विशेष अवसरों पर इस हेरिटेज ट्रेन को चलाया जाएगा । यह इंजन सुबह के 11 बजकर 50 मिनट पर हावड़ा स्टेशन के न्यू कॉम्पलेक्स के 22 नंबर प्लेटफार्म से रवाना हुआ तथा 27 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से इसने ढाई घंटों में बंडेल का सफ़र तय किया । विभिन्न मंत्रियो, अतिथियों एवं पत्रकारों समेत 500 से अधिक यात्रियों ने इस ट्रेन का लुत्फ उठाया। रवानगी के वक्त आर. पी. एफ. बैंड भी बजाया गया । रवानगी से पूर्व उद्घाटन समारोह में केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री गुरुदास कामत, केन्द्रीय रेलवे राज्य मंत्री ई. अहमद, केन्द्रीय जहाजरानी राज्य मंत्री मुकुल राय ने लोगों को संबोधित किया । इस मौके पर रेलवे के महाप्रबंधक दीपक कृष्ण, हावड़ा के डी. आर. एम. मु. जमशेद, रेलवे बोर्ड के सचिव ए. मित्तल सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे । इस मौके़ पर स्टेशन परिसर में पूर्व रेलवे के विरासत सहायक द्वारा रेलवे संबंधी डाक टिकटों की प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया । रेलवे की विभिन्न उपलब्धियों का ज़िक्र करते हुए श्री अहमद ने हावड़ा मुंबई, दिल्ली, चेन्नई सहित चार रेलवे स्टेशन भवनों पर आधारित डाक टिकटों का भी लोकार्पण किया । श्री गुरुदास कामत ने रेलवे से संबंधित डाक टिकटों पर आधारित पुस्तक का लोकार्पण भी किया । इस दौरान आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में डॉ. पल्लव कीर्तनिया ने अपने गायन से सबका मन मोह लिया।

ख) मेट्रो रेलवे का विस्तार :
रेलमंत्री सुश्री ममता बंद्योपाध्याय ने 22 अगस्त शनिवार को टालीगंज ( बांग्ला फिल्मों के नायक के नाम पर अब नया नाम महानायक उत्तम कुमार) स्टेशन से गड़िया (कवि नजरूल) स्टेशन तक मेट्रो रेल सेवा के विस्तार का शुभारंभ किया । वर्ष 1999 में तत्कालीन रेल मंत्री सुश्री बंद्योपाध्याय ने ही आठ किलोमीटर के विस्तार परियोजना की घोषणा की थी । रेलमंत्री, राज्यपाल डॉ. गोपाल कृष्ण गांधी, व वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने संयुक्त रूप से हजारों लोगों और विभिन्न कलाकारों तथा गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में हरी झंडी दिखाकर ट्रेन को गड़िया के लिए रवाना किया । लोगों ने नि:शुल्क सवारी का लुत्फ़ उठाया । इस मौके पर दक्षिणेश्वर, बजबज, बैरकपुर, डायमंड हार्बर, राजारहाट आदि तक मेट्रो के विस्तार संबंधी प्रस्ताव की जानकारी भी दी गई ।
उल्लेखनीय है कि मात्र आठ किलोमीटर के विस्तार कार्य को अमली जामा पहनाने में नौ वर्ष का समय लग गया । कोलकाता मेट्रो लगभग 25 साल पुरानी है । 29 दिसंबर 1972 को प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने 16.74 कि. मी. के विस्तार की आधारशिला रखी थी तथा वास्तविक रूप से संरचना कार्य 1978 में शुरू हुआ । मेट्रो की प्रथम सेवा एसप्लानेड से भवानीपुर(अब नेताजी भवन) के बीच(तीन कि.मी.) 1984 में आरंभ हुई । फिर इसका विस्तार टालीगंज तक हुआ और टालीगंज से दमदम (यानी उत्तरी कोलकाता और दक्षिणी कोलकाता के बीच) 1995 में शुरू हुई । मेट्रो की अधिकतम गति 55 कि. मी. प्रति घंटा तथा न्यूनतम गति 30 कि.मी. प्रति घंटा है । प्रत्येक कोच में 48 यात्रियों के बैठने और 278 यात्रियों के खड़े होने की व्यवस्था है । पूरी ट्रेन की वहन क्षमता लगभग 2356 यात्री हैं । आज से यह दमदम से कवि नजरूल स्टेशन की 22.45 कि. मी. की दूरी 41 मिनटों में तय करेगी । दिल्ली में इसके काफ़ी बाद मट्रो कार्य शुरू हुआ और विस्तार तथा विकास की गति सराहनीय है । दिल्ली मेट्रो की सवारी करके सचमुच अहसास होता है कि आप किसी विदेशी शहर में घूम रहे हैं । महानायक उत्तम कुमार का निधन 1980 में हुआ और मेट्रो उसके पांच-छह वर्ष बाद शुरू हुई परंतु उनके नाम पर स्टेशन का नामकरण करने में इतने बरस लग गए । विस्तार सेवा के नए स्टेशनों के नाम क्रमश: मास्टर दा सूर्य सेन, काजी नजरूल इस्लाम, गीतांजलि, नेताजी सुभाष जैसी हस्तियों के नाम पर रखे गए हैं । अब बात करें किराए की, तो पांच किलोमीटर तक चार रुपए, पांच से दस कि.मी. के लिए छह रुपए, दस से पंद्रह कि.मी. के लिए आठ रुपए और पंद्रह से बीस कि.मी. के लिए बारह रुपए निर्धारित किए गए हैं । ख़ैर, बसों, टैक्सियों के मुकाबले मेट्रो की सवारी की मज़ा ही अलग है । समय की बचत बहुत होती है । आप किसी को दिए गए समयानुसार गंतव्य पर पहुंच सकते हैं । हाँ, इन दिनों मेट्रो में खुदकुशी की प्रवणता भी काफ़ी बढ़ी है क्योंकि जब तक चालक को अहसास हो पाता है और वह ब्रेक लगाए तब तक कई बोगियां शरीर के ऊपर से गुज़र चुकी होती हैं । खुदकुशी की इन घटनाओं पर अंकुश लगना आवश्यक है । आदमी खुद तो चलता बनता है, अपने घर-परिवार के बारे में भूल कर वह अपनी व्यक्तिगत तकलीफ़ को इतना महत्वपूर्ण समझ लेता है कि सब कुछ ताक पर रखकर जान दे देने को आतुर हो जाता है और ऐसा भयानक कदम उठा लेता है । इन घटनाओं के चलते लगभग घंटे भर तक तो यातायात सामान्य नहीं हो पाता । ऐसी ही एक घटना के मौके़ पर मेट्रो सेवा ठप्प थी और मुझे आकाशवाणी एफ. एम. पर लाईव शो पेश करने पहुंचना था तो किसी तरह गिरते-प़ड़ते टैक्सी पकड़ जाम की समस्या से जूझते हुए शो शुरू होने से सात-आठ मिनट पहले पहुंच पाई । मेट्रो के जहां इतने फ़ायदे हैं वहीं यह उसका दुखद पहलू है । इस दिशा में मेट्रो प्रशासन को दुरुस्त क़दम उठाने होंगे ।
प्रस्तुति – नीलम शर्मा ‘अंशु’( 23-08-2009)

13 अगस्त 2009


        भुलाए न भूले सफ़र मुहम्मद रफ़ी के गाँव का !




हमारे भारत ने हर क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई है तथा कई मिसालें क़ायम की हैं । तभी तो भारत की पवित्र माटी पर जन्मा भारतीय सपूत बड़े दावे के साथ कहता नज़र आता है कि -


‘तुम मुझे यूं भुला न पाओगे

जब भी सुनोगे गीत मेरे 
संग-संग तुम भी गुनगुनाओगे।’

इस शख्सीयत की आवाज़ की मिठास बरबस ही हमारे कानों में मधुर रस घोलती है और हम गुनगुना उठते हैं –


‘सौ बार जन्म लेंगे, सौ बार फ़ना होंगे

ऐ जाने वफ़ा फिर भी हम तुम न जुदा होंगे।’


जी हाँ, 24 दिसंबर, 1924 को अविभाजित हिंदुस्तान के पंजाब प्रांत के अमृतसर जिले के मजीठा ब्लॉक के गाँव कोटला सुल्तान सिंह में जन्म हुआ था आवाज़ के धनी इस फ़नकार का जिन्हें तब लोग फीको और आज हम मुहम्मद रफ़ी के नाम से जानते हैं। जिस माटी में बालक फीको ने आँखें खोलीं और किलकारी भरी, मुझे खुशी है कि मुझे भी उस माटी के दर्शन करने का अवसर मिला। एक बार नहीं बल्कि दो-दो बार। 12 अक्तूबर 2006 को मैं अपने परिवार सहित अमृतसर जिले के उस गाँव में गई थी और दूसरी बार 30 जुलाई 2008 को। यह गाँव अमृतसर शहर के बस अड्डे से 26 किलो मीटर के फासले पर है। दूसरी तरफ 26 किलोमीटर के फासले पर ही है ‘वाघा बॉर्डर' और फिर उस पार लाहौर। गाँव की सीमा में प्रवेश करते ही सबसे पहले दाँई तरफ़ नज़र आता है प्राइमरी स्कूल, जहाँ बालक फीको उर्फ़ मुहम्मद रफी़ ने शिक्षा प्राप्त की। मैंने स्कूल के भीतर जाकर स्कूल प्रबंधन से मुलाक़ात की। जैसे ही उन्हें पता चला कि मैं कोलकाता से विशेष रूप से आई हूँ तो वे उत्साहित हो उठे। हमें चाय पान करवाया।

खुले आसमां के नीचे बच्चों की क्लास चल रही थीं। बच्चों से मैंने पूछा कि आपका गाँव क्यों प्रसिद्ध है तो उन्होंने जवाब दिया कि मशहूर गायक मुहम्मद रफ़ी यहीं पैदा हुए थे इसलिए। तीसरी कक्षा की छात्रा खुशप्रीत कौर ने मैं जट्ट यमला पगला दीवाना गीत गुनगुना कर सुनाया। खुशप्रीत की ख़ासियत यह रही कि उसने रफी और आशा भोंसले द्वारा गाया पंजाबी गीत खुद ही डूयेट के रूप में सुनाया। स्कूल की हेल्पर श्रीमती लखविंदर कौर ने फिल्म बैजू बावरा का गीत ओ दुनिया के रखवारे गाकर सुनाया।


ज़रा सा आगे बढ़ने पर बाँई तरफ गाँव का हाई स्कूल है, श्री दश्मेश सीनियर सेकेंडरी स्कूल। 1979 में इसकी स्थापना की गई। स्कूल का प्रवेश द्वार रफ़ी साहब को समर्पित है। हाई स्कूल के प्रिंसीपल सरदार मलूक सिंह भट्टी ने बताया कि स्कूल का कंप्यूटर कक्ष भी मुहम्मद रफ़ी को समर्पित है। मुझे इस बात पर बहुत दु:ख हुआ कि प्राईमरी के बच्चों ने जहां इतने उत्साह से रफ़ी के गीत गुनगुनाए वहीं हाई स्कूल के बच्चे एक पंक्ति तक न गुनगुना सके। बहुत ज़ोर देने पर प्लस वन मेडीकल की छात्रा मंदीप कौर गिल ने कहा कि मुहम्मद रफ़ी बहुत बढ़िया गायक थे और बहारो फूल बरसाओ गीत गुनगुनाया।


मैट्रिक पास और चौथी कक्षा तक रफ़ी के सहपाठी रहे 85 वर्षीय सरदार कुंदन सिह ने बालक रफ़ी की बहुत सी यादें हमारे साथ बांटी। दोनों पड़ोसी थे, घर पास-पास थे। बालक रफ़ी पढ़ाई में ठीक-ठाक था, शरारती भी नहीं था। फीको के पिता हाजी मुह. अली का लाहौर में व्यवसाय था। फीको चाचा के पास गाँव में ही रहता था। गाँव के प्राइमरी स्कूल में पढ़ता था। चौथी कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद एक दिन उसने कुंदन सिंह से कहा कि मैं अगली जमात में दाखिला नहीं लूंगा क्योंकि मैं लाहौर जा रहा हूँ। बालक कुंदन ने कहा कि अपनी कोई निशानी तो देते जाओ। बालक रफ़ी ने घर के पास स्थित आम के बाग में एक पेड़ पर अपना नाम खोद दिय़ा – फ़ीको। ये अलग बात है कि कुछ वर्ष पूर्व बाग के मालिक ने अपनी ज़रूरतों की पूर्ति के लिए उस पेड़ को कटवा दिया। रफ़ी का पुश्तैनी घर अब बिक चुका है।




कुंदन सिंह जी क्षोभ से कहते हैं कि सरकार ज़रा सी भी जागृत होती तो उस घर को खरीद कर संग्रहालय का रूप दे सकती थी। गांव में कभी-कभार जन्म दिन के मौक़े पर रफ़ी यादगारी मेले का आयोजन किया जाता है। कुंदन सिंह कहते हैं कि रफ़ी से संपर्क करने पर रफ़ी ने बहुत बार कहा कि आप गाँव में जो कुछ भी बनाना चाहते हैं, बनाईए, मैं साथ देने को तैयार हूँ परंतु पहल तो आप लोगों को ही करनी होगी। परंतु गांव के तत्कालीन सरपंच या सरकार की तरफ से कोई पहल नहीं की गई। वे इस उदासीनता के लिए रफ़ी को भी कसूरवार ठहराते हैं कि रफ़ी ने गाँव छोड़ने के बाद या यूं कहें कि रफ़ी बनने के बाद गाँव से कोई संपर्क ही नहीं रखा जबकि वे देश विभा-जन के पश्चात् भी भारत में ही रहे। 1970 तक तो उनका मकान भी मौजूद था। अब किसी और ने उसे खरीद कर ढहा कर नया बना लिया है। वहाँ मवेशी बंधे रहते हैं।


मुहम्मद रफ़ी के पिता हाजी मुहम्मद अली बेहतरीन कुक थे। तरह-तरह के पकवान बनाने में माहिर थे। कुंदन सिंह बताते हैं कि वे एक ही देग में सात रंगों का पुलाव बना डालते थे। कुंदन सिंह जी ने रफ़ी को परफार्म करते हुए 1971 में कलकत्ते में सुना। लोगों ने मु. रफ़ी से अपनी पसंद का कोई भी गीत सुनवाने का आग्रह किया तो रफ़ी साहब ने कहा कि अपनी पसंद से मैं एक पंजाबी गीत सुनाना चाहूंगा और वह गीत था –दंद च लगा के मेखां, मौज बंजारा लै गिया। और एक बार रफ़ी 1956 में अमृतसर के एलेकजेंडर ग्रांउड में भी परफॉर्म करने आए थे तो गाँव वालों सहित कुंदन सिंह भी उनसे मिलने गए। तीन रातों तक लगातार शो चलता रहा।
उन्होंने बताया कि 1945 में कोटला सुल्तान सिंह में ही चाचा की बेटी बशीरा से रफ़ी की शादी हुई थी। बारात लाहौर से आई थी। बाद में उनसे रफी साहब का अलगाव हो गया। फिर दूसरी शादी हुई। उन्होंने बताया कि लाहौर के समीप किला गुज्जर सिंह में नाई की दुकान थी। अमृतसर से जाने के बाद बालक रफ़ी उसी दुकान पर नाखून काटने का काम करता था और कुछ न कुछ गुनगुनाते रहना उनका स्वभाव था।


ऐसे में एक दिन पंचोली आर्ट पिक्चर के कर्ता-धर्ता तथा ऑल इंडिया रेडियो, लाहौर के निदेशक वहां हजामत करवाने आए तो उन्होंने रफ़ी को एक कविता लिख कर दी और कहा कि अमुक प्रोग्राम में सुनानी है। बस इसी तरह सफ़र चल निकला और एक दिन रेडियो लाहौर के मार्फत् रफ़ी की आवाज़ घर-घर तक पहुंची। और वे छा गए। फिर कालांतर में उनके बंबई फिल्म इंडस्ट्री की पारी के विषय में तो सारी दुनिया परिचित है। कुंदन सिंह कहते हैं कि मैं जब पाकिस्तान दौरे पर गया था तो वहां उनके भाईयों से भी मिला। उन्हें अफसोस इस बात का है कि मेरी आँखें मुंद जाने के बाद इस गाँव में रफ़ी के बारे में बताने वाला कोई भी न होगा।






अब गाँव में मुहम्मद रफ़ी चैरीटेबल ट्रस्ट बनाया गया है। हाई स्कूल के विपरीत पंचायत ने एक किल्ला ज़मीन उपलब्ध करवाई है, जहां मुहम्मद रफ़ी की स्मृति में एक पुस्तकालय भवन बनाया जा रहा था(जो कि अक्तूबर 2006 और जुलाई 2008 में मेरे दूसरे दौरे तक निर्माणाधीन था, शायद अब बन कर तैयार हो गया हो)। वर्तमान सरपंच स। कुलदीप सिंह ने बताया कि कांग्रेस सरकार ने पाँच लाख का अनुदान दिया था जिससे पुस्तकालय भवन का सिर्फ़ ढाँचा ही तैयार हो पाया था। इतनी ही राशि की और आवश्यकता है तथा उन्हें ग्रांट का इंतज़ार है।
कुंदन सिंह चाहते हैं कि रफ़ी के नाम अस्पताल बनाया जाना बेहतर होता इससे जन-कल्याण का काम हो पाता। वे कहते हैं कि अफसोस है कि लता मंगेशकर के रहते ही उनके नाम पर इतना कुछ हो परंतु रफ़ी के गुज़र जाने के बाद भी कुछ ख़ास नहीं हो पाया उनकी स्मृति में। 





यह दिल रफ़ी साहब के प्रति बेहद शुक्रगुज़ार है कि उन्होंने बाकी लेखकों या कलाकारों की तरह देश-विभाजन के वक्त पाकिस्तान का रुख नहीं किया वर्ना आज हम उन के नाम पर फख्र से सर ऊँचा करने से वंचित रह जाते। धन्य हैं ये आँखें और पाँव जिन्हें एक बार नहीं बल्कि दो-दो बार उस माटी के दर्शन का अवसर मिला जो रफ़ी की जन्म भूमि कहलाती है। अंत में कोलकाता के ही जाने माने गायक मुहम्मद अज़ीज़ के गाए गीत से बोल उधार लेकर कहना चाहूंगी कि –


‘न फ़नकार तुझसा तेरे बाद आया,

मुहम्मद रफ़ी तू बहुत याद आया।’



यूं तो आकाशवाणी के एफ.एम. रेनबो पर पिछले 12 वर्षों में कई बार ऱफी साहब पर लाइव प्रोग्राम किए हैं। अभी 31 जुलाई 2010 को उनकी पुण्यतिथि के मौके पर भी प्रोग्राम पेश किया। इस बार पहली बार उपरोक्त गीत बजाने के लिए उपलब्ध हो पाया। इसी सिलसिले में मुहम्मद अज़ीज़ साहब से भी फोन पर बात हुई तो उन्होंने अपने संदेश में कहा - ‘रफ़ी साहब की जितनी तारीफ़ की जाए कम है। वे अपने आप में एक इंस्टीट्यूट थे। प्ले बैक को उन्होंने एक नया मोड़ दिया। उनसे पहले के सिंगर लो पिच में गाया करते थे । रफ़ी साहब के गायकी में वैरायटी थी, वे versatile singer थे । उनको सुनकर बहुत से लोगों ने गाना सीखा। मैं अपने आप को ख़ुशकिस्मत समझता हूँ कि जिनके गाने बचपन में हमने सुने, सुनकर गाना सीखा, अंत में मैं उनके लिए भी गा पाया।’






प्रस्तुति - नीलम शर्मा ‘अंशु’

11 अगस्त 2009

रेडियो की यादें तथा कुछ महत्वपूर्ण तथ्य
(26 अगस्त आकाशवाणी कोलकाता के जन्मदिन पर विशेष)

पुराने ज़माने में हमारे पास मनोरंजन के साधन न के बराबर हुआ करते थे। नानी, दादी के क़िस्सों से हम बच्चे खुश हो जाया करते। उनसे राजा-रानी, परियों की कहानियां सुनते-सुनते कब रात को नींद हमें अपने आगोश में ले लेती पता ही न चलता। और, अब वे क़िस्से कहीं पीछे छूट गए हैं क्योंकि आज बच्चों की नानी और दादी भी कहीं बहुत पीछे छूटती जा रही हैं । उन्हें अपने इस ‘छूटने’ का मलाल क़तई नहीं बल्कि (बकौल डॉ कुमार विनोद) उनकी परेशानी का आलम कुछ यूं हैं -
‘बड़ी हैरत में डूबी आजकल बच्चों की नानी है
कहानी की किताबों में न आजकल राजा है न रानी है।’


मुझे अच्छी तरह याद है......बचपन में नानी और दादी का आँचल तो नहीं मिला, हां मां ज़रूर रात को कहानियां सुनाया करती थीं। उनमें राजा-रानी के किस्सों के साथ-साथ पौराणिक कहानियां ज्यादा होतीं। मुझसे लगभग ग्यारह वर्ष छोटा मेरा भाई जब तीन-साढ़े तीन वर्ष का था तो जब तक मां रात को रसोई के काम से फ़ारिग होकर बिस्तर पर आती, वह मुझसे कहा करता कि दीदी तब तक तुम कोई कहानी सुनाओ। मैं जैसे ही सुनाना शुरू करती - इक सी राजा....., वह तुरंत अपने तुतलाते स्वर में कहता – इक नाणी ।
राजा – रानी और परियों की कहानी के साथ हमारे पास मनोरंजन का एक साधन और भी मौजूद था – रेडियो ! जी हां, उस ज़माने में रेडियो ही वह सशक्त माध्यम था, जो मनोरंजन के साथ-साथ सूचनाएं भी देता था। उससे भी बहुत पहले उसकी पहुंच हर किसी के वश की बात नहीं थी। जिस घर में रेडियो होता, उस घर के बाहर लोगों का मजमा इकट्ठा हो जाता। सभी एक जगह बैठकर एक साथ मिलकर सुनते। लोग हैरान होते कि उस डिब्बे में से आखि़र आवाज़ कैसे निकलती है। मेरा रेडियो से पहला परिचय शैशवावस्था में ही हुआ। मेरे पिता जिस कंस्ट्रक्शन कंपनी में कार्यरत थे उनके रसोईये को रेडियो सुनने की बहुत आदत थी। रेडियो का हैंडल पकड़े वह इधर-उधर घूमता रहता, काम भी करता। एक दिन उसी के रेडियो में दिल से संबंधित कोई गाना बज रहा था, वह गाना सुनकर मैंने मेरी मां से तुतलाती हुई आवाज़ में कहा था – 'मम्मी, मम्मी! डीडी (रेडियो) कैंहदा, दिल्ला मेरा ' (मुझे तो याद नहीं घर वाले बताते हैं)। हमारे घर में रेडियो बजाने की अनुमति नहीं थी, हां यह अलग बात है कि घर के सामने डेकोरे़टर्स की दुकानों पर दिन भर फिल्मी गीत बजा करते थे। व्यक्तिगत रूप से रेडियो से जुड़ाव कॉलेज के दिनों में हुआ। भाई साहब ने रेडियो खरीद कर लाकर दिया। तब मैं रेडियो पास रखकर ही पढ़ा करती। परीक्षा की तैयारी भी इसी तरह होती। रेडियो धीमे स्वर में बजता रहता, भले ही उसके कार्यक्रमों की तरफ ध्यान रहता हो या नहीं। कॉलेज का वक्त पंजाब में गुज़रा, उन दिनों पंजाब में आतंकवाद चर्मोत्कर्ष पर था पर हमें उससे कोई मतलब नहीं था। हमारी अपनी ही दुनिया था, आवाज़ के साथियों की दुनिया। वहां ऑल रेडियो दिल्ली की उर्दू सर्विस खूब सुनी जाती थी। प्रसारण भी बहुत स्पष्ट होता था मीडियम वेव पर। तरह-तरह के फ़रमाईशी गीतों के प्रोग्राम, ख़तों के प्रोग्राम, बच्चों के प्रोग्राम, फ़िल्मों से संबंधित तरह-तरह के प्रोग्राम। हम आवाज़ के ज़रिए प्रोग्राम के आर. जे. को पहचाना करते या फिर उनकी प्रस्तुति के विशेष अंदाज़ से भी। बस यहीं से रेडियो से गंभीरता से जुड़ाव हुआ। ऑल इंडिया रेडियो की उर्दू सर्विस ज़िंदगी का अहम् हिस्सा बन गई थी 1980 से 86 तक। 1986 के बाद वापिस बंगाल आए तो भी दुआर्स में शॉर्ट वेव पर उसे सुन लेते परंतु 1989 में कोलकाता आने के बाद उर्दू सर्विस का साथ छूट गया क्योंकि यहां शॉर्ट वेव पर उसे ट्यून करने में बहुत मशक्त करनी पड़ती, तिस पर प्रसारण भी स्पष्ट सुनाई नहीं देता। आज भी जब-जब पंजाब जाना होता है तो हम उसे बड़ी शिद्दत से सुनते हैं। रेडियो के जुनून का सिलसला ऐसा रहा कि जब - जब मौका मिलता खाली वक्त में कोलकाता में ऑफिस में भी ड्रॉयर में रख रेडियो सुना करती। इसके बाद 1998 में आकाशवाणी कोलकाता की एफ. एम. सेवा शुरू हुई तो पता चला कि सुबह नौ बजे और शाम छह बजे तक बड़े बढ़िया हिन्दी गीत बजा करते हैं तो उसे सुनने का सिलसिला शुरू हुआ, जो आज तक जारी है। इसी दौरान रेडियो पर घोषणा सुनकर एफ. एम के आकस्मिक आर. जे. के लिए आवेदन किया और अब विगत ग्यारह वर्षों से खुद ऑल इंडियो रेडियो एफ. एम पर परफार्म कर रही हूं। बल्कि इस तरह रेडियो का वह जु़ड़ाव और मजबूत हो गया। रेडियो से जुड़ा एक क़िस्सा और शेयर करना चाहूंगी। 1990 में दिल्ली रेडियो गई तो वहां अपने क़ालेज के ज़माने में सुने आर. जे. से मुलाक़ात की। रेडियो के रिसेप्शन रजिस्टर में मैंने अपने नाम के साथ सिर्फ़ 6, एस्पलानेड ईस्ट, कोलकाता - 69 लिखा था, अपने ऑफिस का नाम नहीं लिखा था । फिर भी रजिस्टर से प्राप्त अधूरे पते पर ही रेडियो के किसी स्टाफ द्वारा भेजा गया पत्र मेरे ऑफिस में मुझ तक पहुंच गया। उन दिनों तो कोलकाता में मुझे ज़्यादा लोग जानते भी नहीं थे, शहर में आए साल भर हुआ था। रेडियो अब भी मेरे पास ऑफिस ड्रायर में रखा रहता है, यह अलग बात है कि अब सुनने की उतनी फुर्सत नहीं मिलती, ज़रूरी होने पर न्यूज़ बुलेटिन कभी-कभार अवश्य सुन लेती हूं।

रेडियो से जुड़ा यादगार वाक्या : बतौर आर. जे. दो यादगार घटनाओं का ज़िक्र करना चाहूंगी, पहली यह कि मैंने आकाशवाणी की 75वीं वर्षगांठ के मौके पर छायालोक की विशेष तैयारी की थी। मेरा प्रोग्राम 6 बजे से शुरू होना था। उससे पहले लखनऊ केन्द्र से आकाशवाणी के वार्षिक पुरस्कार वितरण से संबंधित लाइव प्रोग्राम का प्रसारण चल रहा था। वह लाइव प्रोग्राम इतना लंबा चला कि मेरे प्रोग्राम का समय भी उसी में कवर हो गया और मैं स्टुडियो में माइक्रोफोन के सामने बैठी इंतज़ार ही करती रह गई। दूसरी घटना है, उन दिनों अभिनेता प्रदीप कुमार साहब अपनी अस्वस्थता के दिनों में कोलकाता में थे। मैंने उन पर पूरे एक घंटे का लाइव शो पेश किया, जिसे उन्होंने अपने आवास पर सुना। उनकी गुज़रे ज़माने की यादें ताज़ा हो गई और उन्होंने सुनकर उस प्रोग्राम को सराहा। यह मेरी विशेष उपलब्धि रही कि इतने बड़े कलाकार ने मेरी परफार्मेन्स को सुना। एफ. एम. से ज़ुड़ने के बाद रेडियो कोलकाता को जितना मैंने जाना चलिए आप को भी बता दूं।
जी हां, 15 अगस्त और 26 जनवरी इतिहास के पन्नों में क्यों दर्ज हैं इससे तो शहर का बच्चा-बच्चा परिचित होगा लेकिन 26 अगस्त के बारे में ही शायद किसी को याद हो। 26 अगस्त 1927 को आकाशवाणी के कोलकाता केन्द्र की स्थापना हुई। बंगाल के तत्कालीन राज्यपाल सर स्टेनली जैक्सन ने इसकी स्थापना की थी। आरंभ में इसका कार्यालय 1 गरस्टिन प्लेस में (अब बी. बी. डी. बाग़) में था। इसके पश्चात् 15 सितंबर 1958 में इसे इडेन गार्डन के मौजूदा भवन में स्थानांतरित किया गया। 1 अप्रैल 1930 को ही रेडियो का प्रसारण सरकार के सीधे नियंत्रण में आ गया था। Deptt. of Industries & Labour के अधीन इसका Indian Broadcasting Service नामकरण किया गया। 1 जनवरी 1936 को Indian State Broadcasting Service के दिल्ली केन्द्र की स्थापना की गई। 8 जून 1936 को इसक नामकरण किया गया – All India Radio. पुन: 1938 में इसका नामकरण किया गया - ‘आकाशवाणी’। रवीन्द्रनाथ टैगोर रचित कविता ‘आकाशवाणी’ के आधार पर यह नामकरण किया गया। 1935 तक रेडियो से दो समाचार बुलेटिन प्रसारित होते थे, एक अंग्रेजी में और दूसरा भारतीय भाषा में। 1947 तक आते-आते इनकी संख्या बढकर 74 हो गई। इसके बाद रेडियो की अपनी पत्रिका भी प्रकाशित की जाने लगी, अंग्रेजी में ‘ All India Times’ और बांग्ला में ‘बेतार जगत’। 20 अक्तूबर 1941 को आकाशवाणी को सूचना मंत्रालय में शामिल किया गया। आकाशवाणी से प्रसारित सर्वश्रेष्ठ नाटक, फीचर तथा संगीतप्रधान नाटकों के लिए 1974 से आकाशवाणी के वार्षिक पुरस्कार शुरू किए गए।

कविगुरु रवीन्द्ननाथ की कविता जिस के आधार पर ऑल इंडिया रेडियो
का नामकरण
‘आकाशवाणी’ हुआ :

आकाशवाणी

धौरार आंगिना होईते एई शोनो
उठिलो आकाशवाणी।
अमोर लोकेर मोहिमा दिलो जे मर्तोलोकेरे आनि।
शरोशोतीर आशोन पातिलो
नील गगोनेर माझे
आलोक बीनार शौभा मौंडले
मानूषेर बीना बाजे।
शूरेर प्रबाहो धारा शुरोलोके
दूर के शे नैय चिनि
कोवी कौल्पोना बोहियो चोलिलो
औलोख शौदामिनि
भाषारौश धाए पूर्बे-पोश्चिमे
सूर्जोरौशेर शाथी
उधाऊ रोइलो मानोब चित्तो
शौर्गेर शीमानाते। ( रवीन्द्र नाथ ठाकुर )

हिन्दी प्रसारण : 1954 में आकाशवाणी कोलकाता से हिन्दी सेवा का प्रसारण आरंभ हुआ और 1980 में उर्दू सेवा का। एफ. एम.सेवा भी 1980 से शुरू हुई जिसकी समय-सीमा थी सुबह 7 बजे से 11 बजे तक। 1995 में इस समय-सीमा को बढ़ाकर 24 घंटे कर दिया गया।

हिन्दी एफ. एम : एफ. एम. की हिन्दी सेवा (107 मेगाहर्टज् पर) जून 1998 से शुरू हुई। इसके तहत् फिल्मी गीतों का कार्यक्रम सिर्फ़ शाम को प्रसारित किया जाता था। 18 अगस्त 1998 से यह कार्यक्रम सुबह भी प्रसारित किया जाने लगा। सितंबर 1998 में इसका नामकरण किया गया – ‘छायालोक’ ।


चैनलों का नया नामकरण
: 1 सितंबर 2001 को एफ. एम के द्वितीय चैनल (100.2 मेगा.) का प्रसारण शुरू हुआ। अप्रैल 2002 में एफ. एम. के इन दोनों चैनलों का नया नामकरण
किया गया क्रमश: रेनबो और गोल्ड। ट्रैफिक संबंधी जानकारी का प्रसारण 16 फरवरी 2002 से हुआ।

रेडियो पर प्रथम : विश्व के प्रथम अनांउसर थे, हंगरी के वुडापेस्ट शहर के एडे शर्टसई। 1901 में उन्होंने प्रथम बार माइक्रोफोन का सामना किया था। वहीं आकाशवाणी कोलकाता की प्रथम महिला एनांउसर थीं - श्रीमती इंदिरा देवी। महिला महल कार्यक्रम की प्रथम संचालिका थी श्रीमती बेला दे।

अभिलेखागार : आकाशवाणी कोलकाता की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर महत्वपूर्ण अभिलेखों को संरक्षित किया गया। आकाशवाणी के पूरे गौरवशाली इतिहास को 52 एपिसोडों में सहेजा गया है। इसके लिए केन्द्रीय अभिलेखागार बनाया गया और आकाशवाणी के प्रोड्यूसर प्रदीप कुमार मित्रा ने लगभग 7250 अभिलेखों को संरक्षित किया। ज्योति बसु, महाश्वेता देवी, शैलेन मन्ना जैसे विशिष्ट और प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों पर तीन-तीन घंटों की रिकॉर्डिंग उपलब्ध है। लोगों की मांग को देखते हुए आंचलिक संगीत पर ज़ोर देते हुए ड्रामा, लोक नाट्य और साहित्य से संबंधित प्रोजेक्ट तैयार किए गए हैं। बंगाल के लोकगीत, भक्ति संगीत, देश भक्ति गीत के साथ-साथ विभिन्न भाषाओं की सर्व भारतीय श्रेष्ठ कहानियों के ‘चिरंतन कौथा’ शीर्षक से 26 एपिसोड तैयार किए गए हैं। लोक कला की श्रृंखला के तहत् विभिन्न थीमों पर सात ऑडियो जात्राओं को संरक्षित किया गया है। लोक नाट्य की श्रृंखला पर आधारित 11 एपीसोड, साहित्य पर 75 तथा बंगाल के साहित्यकारों पर 75 और साहित्यकारों की पुस्तकों के चुनिंदा अंशों पर आधारित ‘चिरंतन’ शीर्षक से 5 मिनटों के 534 धारावाहिकों का निर्माण किया गया है। विज्ञान से संबंधित कार्यक्रमों की श्रृंखला में बंगाल के प्रसिद्ध वैज्ञानिकों पर आधारित ‘लिंटन टू लेजर’ नामक 5 एपिसोड उपलब्ध हैं। नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध विरासत से परिचित करवाने के लिए आंचलिक अभिलेखों को संरक्षित कर रिलीज करने में प्रयासरत है आकाशवाणी। इसके तहत् रवीन्द्र संगीत की दो सी डी जारी की गई हैँ।

वर्तमान में आकाशवाणी के एफ. एम. चैनलों सहित पाँच चैनल प्रतिदिन 91 घंटों का प्रसारण प्रस्तुत करते हैं तथा फोन इन कार्यक्रमों के माध्यम से 31 घंटे का।
रेडियों का महत्व इस बात में भी है कि कई कलाकारों ने रेडियो पर दिग्गज कलाकारों के गाने को अपना प्रेरणा-स्त्रोत माना। पार्शव गायक सुदेश भोंसले ने कभी अपने साक्षात्कार में इस लेखिका से कहा था कि रेडियो पर रफ़ी और किशोर साहब के गीत सुन-सनुकर ही मैंने गाना सीखा।

- नीलम शर्मा ‘अंशु’ (11-8-2009)

31 मई 2009

स्मृति - ( 1 ) नवेन्दु घोष रचित 'चुनिन्दा कहानियां' का लोकार्पण ।

हिन्दी फिल्म उद्योग की देवदास, सुजाता, बंदिनी, आर-पार,परिणीता, बिराज बहू, यहूदी तीसरी कसम, अभिमान तृषाग्नि जैसी फिल्मों को दर्शक भला कैसे भुला सकते हैं और इन्हीं फिल्मों से जुड़ा जाना-माना नाम है नवेन्दु घोष । इन क्लासिक फिल्मों के वे पटकथा लेखक रहे। पटना में पले-बढ़े, आजीविका के लिए बंबई में कार्यरत और पुणे के फिल्म इंस्टीट्यूट में सिनेमा के अध्यापन के साथ-साथ उनमें साहित्यिक लेखक भी बसता था। गीतकार प्रदीप, नीरज, शैलेन्द्र की भांति वे भी विशुद्ध साहित्यिक धारा के वाहक थे। फ़र्क सिर्फ़ इतना था कि वे सभी काव्य जगत से थे और नवेन्दु गद्य से। वे सभी हिन्दी साहित्य के संवाहक होते हुए फिल्म जगत से जुड़े और नवेन्दु घोष ने बागंला साहित्य से हिन्दी फ़िल्म जगत में प्रवेश किया। जब वे 1951 में बंबई गए तो बिमल राय ने उन्हें बतौर पटकथा लेखक अपनी टीम में शामिल होने का आमंत्रण दिया।
यूं तो उनके साहित्य लेखन में सारे भारत के दर्शन होते हैं फिर भी उसमें राष्ट्रीय आंदोलन, बंगाल का अकाल, विभाजन पूर्व दंगे, पचास के दशक का औद्योगीकरण, साठ के दशक की राजनीतिक उथल-पुथल, सत्तर के दशक के परमाणु परीक्षण आदि का रेखांकन मिलता है। संभवत: फिल्मों में पटकथा लेखन की वजह से ही बांगला में उनकी डाक दिए जाई, फीयर्स लेन, अजोब नौगरेर काहिनी जैसी कहानियां स्कूल एवं कॉलेज के पाठ्यक्रमों से भले ही अलग-थलग रहीं हों लेकिन बांगला पाठकों का उनके लेखन से नियमित जुड़ाव रहा । साथ ही फिल्म लेखन जगत में उनका अवदान अविस्मरणीय रहेगा। हां, कुछेक अनूदित कहानियां हिन्दी की धर्मयुग, कहानी, माया, हंस, राष्ट्र भारती, मनोरमा, बायस्कोप जैसी पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हुई। इन्हीं चुनिंदा कहानियों को संकलित कर हिन्दी में कहानी संग्रह प्रकाशन का उन्होंने सपना संजोया था, जिसे अभी हाल ही उनके निधन के बाद उनकी बेटी रत्नोतमा ने साकार किया। हाल ही में 27 मई 2009 को कोलकाता के भारतीय भाषा परिषद के सहयोग से परिषद सभागार में नवेन्दु घोष के हिन्दी कहानी संग्रह ‘चुनिन्दा कहानियां’ का लोकार्पण बांग्ला के जाने-माने अभिनेता सौमित्र चटर्जी ने किया । इस मौके पर उन्होंने कहा कि नवेन्दु घोष एक ऐसा नाम है जो किंबदंती बन गया है। उनकी कहानियों में आज़ादी का स्वर मुखरित हुआ। घोष के लेखन का फणीश्वर नाथ रेणु के साथ सामंजस्य बताते हुए सौमित्र चटर्जी ने कहा कि हिन्दी संकलन के माध्यम से उनका लेखन बांग्ला की सीमा से निकल अनेकों तक जा पहुंचा है। इस अवसर पर भारतीय भाषा परिषद के निदेशक विजय बहादुर सिंह ने कहा कि उनकी कहानियां हाथ पकड़कर सीधे जीवन के सम्मुख खड़ा कर देती हैं। हिन्दी की सुपरिचित लेखिका अलका सरावगी ने भी इस पहल की सराहना करते हुए नवेंदु घोष के लेखन पर संक्षिप्त रौशनी डाली।
कार्यक्रम के आरंभ में परिषद के मंत्री नंदलाल शाह ने स्वागत वक्तव्य दिया। रंगकर्मी वीना किचलू ने

‘फ़ातिमा का क़िस्सा' कहानी का भावपूर्ण पाठ किया। श्रद्दांजलि के तौर पर शुभंकर घोष निर्देशित वृ्त्त चित्र ‘मुकुल’ प्रदर्शित किया गया तथा नवेन्दु घोष निर्देशित फ़िल्म ‘तृषाग्नि’ भी दिखाई गई। आशा है नवेंदु घोष लिखित क्लासिक फ़िल्मों की भांति रोशनाई प्रकाशन द्वारा प्रकाशित ‘चुनिंदा कहानियां’ का उनके प्रशंसकों तथा हिन्दी पाठकों द्वारा बड़े पैमाने पर स्वागत किया जाएगा ।
- नीलम शर्मा ‘अंशु’
31-5-2009

तसलीमा नसरीन - मेरे विरोधी तलवार लेकर चलते हैं और मैं क़लम लेकर ।





बात 1993-94 की है। मैं उन दिनों मध्यमग्राम (कोलकाता का निकटवर्ती एक उपनगर) में रहा करती थी। कोलकाता में हर जगह उन दिनों तसलीमा नसरीन का ज़िक्र सुनने को मिलता था। यहां तक कि उपनगरीय बनगांव लोकल के महिला कूपे में यह नाम अकसर सुनने को मिलता था। फिर धीरे-धीरे तसलीमा के विषय में विस्तार से जानने का मौका मिला। मैंनें उन्हें पत्र लिख कर ‘लज्जा’ के हिन्दी अनुवाद की अनुमति चाही थी । अचानक नौ महीनों बाद मुझे उनका पत्र मिला जिसके द्वारा सूचित किया गया था कि मेरा कॉपी राईट अमुक प्रकाशक के पास है, आप उनसे संपर्क करें। ढाका में भूमिगत रहने के कारण पत्रोतर में विलंब के लिए क्षमा याचना की थी। जब मैं उनके बांग्ला प्रकाशक से मिली तो पता चला कि हिन्दी अनुवाद हेतु किसी अन्य को अनुमति दी जा चुकी है। ख़ैर ! क्या किया जा सकता था।

........... ऐसे में सालों बाद एक दिना अचानक पता चला कि तसलीमा शहर में हैं और पीयरलेस इन में ठहरी हैं, दो सप्ताह रहेंगी। रोज़ नियमित रूप से सुबह - शाम  पब्लिक बूथ के सिक्के वाले फोन से उन्हें फोन करती। पता नहीं कितने सिक्के खर्च किए। उनका एक ही जवाब होता, अच्छा आप अमुक समय फोन कीजिएगा। उन दिनों मेरे एकाध अनूदित आलेख छपने शुरू हुए थे जनसत्ता में । कोई विशेष पहचान भी नहीं थी मेरी शहर में । मैं सिर्फ एक बार उस महिला को साक्षात़् देखना चाहती थी, जिसने सारी दुनिया में हलचल मचा रखी थी, जिसका नाम सबकी जुबां पर था। मेरे भी धैर्य का जवाब नहीं। मैं रोज धैर्य सहित उन्हें फोन करती। अंतत: जिस दिन वे कलकत्ते से जाने वाली थीं, उस दिन सबह नौ बजे की मुलाक़ात का समय उन्होंने दे ही दिया। (सोचा होगा कि यह कन्या इतने दिनों से डटी है मोर्चे पर तो मिल ही लिया जाए।) साधारण सी उभरती हुई अनुवादक थी, कोई स्थापित पत्रकार तो थी नहीं। ख़ैर निर्धारित समयानुसार अपनी एक दोस्त (मेरी वजह से उसे भी तसलीमा नसरीन को देखने का सुअवसर मिल गया) को साथ ले मैं पीयरलेस इन पहुंची। रिसेप्शन से फोन लगाया तो उन्होंने ऊपर आने के लिए कहा। ऊपर पहुंचने पर लोगों का इतना जमघट देख मैंने अपनी उस दोस्त से कहा, चलो वापस चलते हैं, मुझे नहीं मिलना। उस ने पलट कर कहा, बेवकूफ हो, रोज फोन करती रही, और अब मौका आया है तो वापस जाने की बात करती हो। तब तक कमरे से निकलती तसलीमा दिखीं, आते ही उन्होंने भीड़ की तरफ मुख़ातिब हो कहा, आप में से नीलम शर्मा कौन है, जिन्होंने फोन किया था। और हमें साथ ले कमरे में चली गई। भीतर जाते ही उन्होंने कहा, आज तो आमी चोले जाबो, आमी आमीर जिनिश गुलो गोछाते-गोछाते तोमार सौंगे कौथा बोले निच्छी केमोन ? यानी आज तो मैं वापिस जा रही हूं, मैं अपना सामान सहेज लूं, साथ-साथ हम बातें भी कर लेते हैं।


छूटते ही मैंने उन पर सवाल दागा, अच्छा बताईए तो बांग्ला में 'शुए आछे' का अर्थ क्या है ( मुझे अच्छी तरह बांग्ला आती है, लेकिन उनकी पुस्तक ‘लज्जा’ के हिन्दी अनुवाद के पहले वाक्य का तरजुमा ही ग़लत था, यह बात अनुवादक स्व मुनमुन सरकार से मैंने कभी नहीं कही जो कि मुझसे ज़्यादा अनुभवी रही हैं और उनकी तो मातृभाषा भी बांग्ला थी जबकि मेरी नहीं। अब मौक़ा था तो सीधे लेखिका से मैंने सवाल किया। तसलीमा ने कहा, इसका अर्थ है लेटना। मैंने कहा - बिलकुल सही कहा आपने। लेटा हुआ व्यक्ति सोच-विचार में तल्लीन हो सकता है, सोया हुआ व्यकित क़तई नहीं। उन्होंने कहा, मैं सहमत हूं तुमसे। मैंने कहा आपके अनुवादक ने तो सुरंजन को सुला दिया जबकि वह लेटा हुआ था और अंग्रेजी अनुवाद में भी यही लिखा है Suranjan was sleeping. उन्होने कहा कि हां वह हिन्दी से अंग्रेजी में अनूदित हुआ है, इसलिए वही ग़लती उसमें रिपीट हो गई है। (मुझे नहीं पता इसके बाद हिन्दी और अंग्रेजी वर्जनस् में इस ग़लती को सुधारा गया या नहीं या अब तक इसी तरह प्रकाशित किया जा रहा है।) इस दौरान मैंने देखा कि काम और बातें करते हुए उन्होंने एक के बाद एक कई सिगरेट सुलगाए। (कहां मुझे स्मोक से एलर्जी और कहां चेन स्मोकर तसलीमा। ) यानी यह थी एक आम पाठक  की हैसियत से(चूँकि उन दिनों मैंने पत्रकारिता शुरु नहीं की थी) इतनी चर्चित हस्ती से बगैर किसी बिचौलिए के पहली मुलाक़ात ।




दूसरी मुलाकात हुई, मार्च 2000 को होटल ताज बंगाल में, बकायदा prior appointment लेकर। छह वर्ष पूर्व (1994) में कोलकाता के पीयरलेस इन होटल के कक्ष में जिस तसलीमा नसरीन से मुलाक़ात की थी, आज की तसलीमा उससे कहीं अलग, कहीं ज़्यादा आत्मविश्वास से परिपूर्ण दिखीं। मैंने उनका इंटरव्यू लिया जिसे पंजाब केसरी ने प्रकाशित किया था। इस इंटरव्यू के लिए मुझे देश के कई हिस्सों से पत्र प्राप्त हुए थे। कुछ तो उर्दू में थे । कुछ पत्र तसलीमा नसरीन के लिए मिले जो मैंने तीसरी मुलाक़ात के दौरान उन्हें सौंप दिए थे । यहां तक कि लंदन के ‘अमरदीप वीकली’ ने भी वह इंटरव्यू प्रकाशित किया, जिसके विषय में मुझे लंदन से हिन्दी के जाने-माने लेखक तेजेन्द्र जी ने बताया कि भई वाह, आप तो लंदन में भी छपने लगीं और उसकी कटिंग भी भेजी।


तीसरी मुलाक़ात तो और भी मज़ेदार रही। इस बार वे ग्रेट ईस्टर्न होटल में थीं।  यह मुलाक़ात संभवत: साल भर बाद हुई। हुआ यूं कि मेरे पत्रकार भाई को ‘प्रभात ख़बर’ के लिए उनका साक्षात्कार चाहिए था। संपादक साहब का हुक्म था कि चाहे जैसे भी आपको उनका interview लेना ही है हर क़ीमत पर। भाई ने कई बार ग्रेट ईस्टर्न होटल जहां उन दिनों वे ठहरी हुई थीं फोन लगाया पर बात नहीं बनी। भाई ने मुझसे कहा दीदी, आप बात करके appointment दिलवाईए, आपको तो वे जानती हैं। अंतत: मैंने फोन लगा कर कहा, दीदी मुझे आपसे मिलना है । उन्होंने अगले दिन का समय दे दिया । प्रभात खबर जैसे बड़े और राष्ट्रीय स्तर के अख़बार के पत्रकार को मैंने appointment लेकर दिया । आज वही भाई प्रभात खबर - अमर उजाला से रिपोर्टर का सफ़र तय करते हुए दैनिक भास्कर में चीफ न्यूज़ एडीटर के पद पर आसीन है। अब तो तसलीमा नसरीन कई बार कोलकाता आईं, लेकिन उनसे मिलना अब नामुमकिन सा है । अब तो खुद तसलीमा नसरीन को ही नहीं पता होता कि उन्हें कहां ठहराया गया है । आज की तारीख़ में नीलम शर्मा नाम उनके ज़ेहन में है भी या नहीं, पता नहीं। 

प्रस्तुत है फ्लैश बैक में लौटते हुए पंजाब केसरी में प्रकाशित उस साक्षात्कार के कुछ चुनिंदा अंश :


पांच सितारा होटल ताज बंगाल में दो मार्च 2000 की शाम साढ़े छह बजे उनसे बातचीत का सिलसिला कुछ यूं शुरू हुआ –



0 आज आपका इतना नाम है, लोकप्रियता है, लोग आपसे स्नेह करते हैं। आपके प्रति लोगों में एक अलग सा आकर्षण है, यह सब देखकर कैसी अनुभूति होती है ?


= अच्छा लगता है। लोगों का स्नेह पाकर यही लगता है कि मुझे लिखते रहना है। अगर मैं हाथ पर हाथ धरे बैठी रहूं तो यह उनका अपमान होगा। यूरोप में रहकर बांग्ला में लिखती हूं, बांग्लादेश के बाद पश्चिम बंगाल में आकर जब इतनी संख्या में अपने पाठकों को देखती हूं तो बहुत प्रेरणा मिलती है। अपनी भाषा, अपनी संस्कृति से कटकर, प्रेरणा न पाकर बहुत दिनों तक तो लिख ही नहीं पाई। अब यहां के लोगों के स्नेह को संजोकर साथ ले जाऊंगी और खूब लिखूंगी।



0 अपने लेखन के प्रति अपने देश के लोगों की ऐसी प्रतिक्रिया देखकर आप क्या अनुभव करती है ?

= सभी तो नहीं, कुछ लोग उसके विरद्ध आवाज़ उठा रहे हैं। आंदोलन कर रहे हैं। एक न एक दिन बदलाव आएगा। जब वे शिक्षित हो जाएंगे और इस बात को महसूस करेंगे कि एक स्वस्थ्य समाज के लिए एक लेखक की ‘वाक स्वाधीनता’ बेहद ज़रूरी है।



0 क्या कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ या अफ़सोस नहीं हुआ कि यदि मैं इस देश में पैदा न होकर किसी दूसरे देश में जन्मी होती दो ज़्यादा सहयोग मिलता, ज़्यादा बेहतर होता ?


= इस बात को लेकर मुझे कोई क्षोभ नहीं। जन्म स्थान तय करना तो इंसान के हाथ में नहीं होता। यदि मैं इस देश में पैदा न होकर कहीं और पैदा होती तो शायद मैं लेखिका ही न बन पाती, यह बोध ही न पैदा होता शायद। लोग तो मुझसे भी बदतर स्थिति में रहकर या कारावास में रहकर भी मास्टरपीस लिख गए हैं। हम लोग आज भी मध्य युग में जी रहे हैं, तभी तो हमारे लेखकों को गिरफ्तार किया जाता है, कारावास दिया जाता है। लेखकों पर तो स्वस्थ समाज निर्माण का दायित्व होता है। सभी तरह की सुख-सुविधाएं पाकर शायद मैं यह सब न लिख पाती। मैं इस दायित्व को समझती हूं और लिख रही हूं, इसे लेकर मुझे कोई क्षोभ नहीं। मेरे लेखन के लिए कठमुल्लावादियों ने जो मुझे मार डालने का फतवा जारी किया है, वह सिर्फ़ इसलिए कि वे मेरे लेखन से डर गए हैं, आतंकित हो गए हैं। वे तलवार लेकर चल रहे हैं तो मैं कलम लेकर। वे मेरी कलम से आतंकित हैं, वर्ना मैं देश में रहूं या न रहूं, कुछ भी क्यों न लिखूं, किसी को क्या फ़र्क पड़ता है।

0 या फिर आप महिला लेखक हैं, इसलिए ऐसा ज़्यादा हो रहा है ?

= हां, महिलाओं के मुंह से ऐसी बातें सुनने के तो वे लोग अभ्यस्त नहीं हैं । जो कुछ भी कहा जाता है, सिर्फ़ पुरुषों द्वारा ही । महिला लेखक के मुंह से यह सब सुनकर लोगों को बहुत ‘शॉक’ लगा है । इसलिए वे लोग ज़्यादा आक्रमण कर रहे हैं।


0 कभी-कभी तो लगता है कि अपने पड़ोसी देशों की तुलना में हमारे देश में महिलाओं की स्थिति ज़्यादा अच्छी है । आप क्या सोचती है ?

= एक जैसी ही है । ज़्यादा फ़र्क नहीं है परंतु यह सोचकर खुश होने जैसी कोई बात नहीं है । आप पड़ोसी देशों से तुलना क्यों करते हैं ? अन्य उन्नत देशों के साथ तुलना करें । यह सोचें कि क्या भारतीय महिलाओं की दशा स्वीडन या नार्वे की महिलाओं से बेहतर है ? अत: अपने से बड़े देशों की तरफ देखना चाहिए।


0 ये जो आठ मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है, आपके विचार में इसकी कितनी महत्ता है ?

= महिलाओं के लिए मात्र एक दिन और पुरुषों के लिए 364 दिन । इससे तो महिलाओं की उन्नति नहीं होगी । ज़्यादातर महिलाएं तो यह जानती ही नहीं कि आठ मार्च क्या है ? 8 मार्च को जिन महिलाओं के साथ बलात्कार होता है, चालान होता है, कईयों को भगा दिया जाता है, कईयों का क़त्ल होता है, क्या वे जानती हैं कि आज 8 मार्च है ? यह सब जो घट रहा है, यह स्वभाविक है । आज भी तृतीय विश्व में जहां महिलाओं की कोई स्वाधीनता नहीं, वहां तो यह अर्थहीन है ।


0 आपने पहली बार कब महसूस किया कि आपके भीतर एक लेखक है, उसे बाहर आना चाहिए ?


= काफ़ी छोटी थी, तब से ही लिखने की इच्छा होती थी । स्कूल के दिनों से ही पहले लघु पत्रिकाओं में लिखना शुरू किया । कई लोग बहुत बातूनी होते हैं, पर मैं मितभाषी थी, मन की बातें लिखा करती थी। यह अभिव्यक्ति का एक माध्यम था । बहुत किताबें पढ़ा करती थी।


0 आप तो मेडिकल डॉक्टर हैं, इतनी चेन स्मोकिंग क्यों करती हैं ?

= जानती हो, डॉक्टर बहुत बुरे मरीज़ होते हैं।  स्मोक करती हूं और लोगों को न करने का उपदेश देती हूं । वैसे यह एक बुरी आदत है, बस छोड़ नहीं पा रही हूं। दार्शनिकता जैसी कोई बात नहीं है ।


0 आप तो काफ़ी अर्से से विदेश में रह रही हैं । हमारे पूरबी पुरुषों और पश्चिमी पुरुषों की मानसिकता में क्या अंतर या समानताएं हैं ?


= लगभग सब जगह के पुरुष एक जैसे ही हैं । उनके वहां तो बहुत दिनों से समानाधिकार चल रहे हैं ।


0 हमारे यहां साहित्यिक पुस्तकों पर अनेक फ़िल्में बनी हैं और बनती हैं । यह कहां तक सही है या उपयोगी है । एक लेखक के तौर पर आप क्या सोचती हैं ?

= यह बेहद ज़रूरी है ।

0 यदि आपकी आत्मकथा पर यहां कोई फ़िल्म बनाना चाहे तो ?


= वह प्रामाणिक होनी चाहिए।







साभार – पंजाब केसरी (मार्च 2000) तथा


अमरदीप हिन्दी वीकली, लंदन (12-4-2000)


साक्षात्कार - नीलम शर्मा 'अंशु '