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03 अप्रैल 2011

चक्क दे चक्क दे चक्क दे.....फट्टे !



खोसला का घोंसला फ़िल्म में कैलाश खेर का गाया यह गीत मुझे बेहद पसंद है। और......अंतत  भारतीय टीम ने फट्टे चक्क ही दिए। चार-पाँच साल पहले जब चक्क देफ़िल्म रिलीज़ हुई थी तो मेरे एक कलीग ने मुझसे पूछा था, चक्क दे का क्या मतलब होता है। अब विश्व कप सेमी फाइनल और फाइनल के बाद उन्हें अच्छी तरह अहसास हो गया होगा कि चक्क दे क्या होता है।

मेरा क्रिकेट के प्रति आकर्षण कभी नहीं रहा। मुझे लगता था कि इतने घंटों तक टी. वी. से चिपके रहने की तुलना में और भी महत्वपूर्ण काम है करने के लिए।  लोगों के उत्साह को देखकर जब-जब दिलचस्पी लेकर मैच देखा, तब-तब हम हार गए। परिणामस्वरूप रुझान कभी जम ही नहीं पाया। बस 2003 में डरते-डरते भारत-पाक मैच सेकेंड हाफ से देखा था, तब हम जीते थे। और इतने सालों बाद या यूं कहूं कि जीवन में पहली बार मैंने मोहाली सेमी फाइनल वाला मैच देखा। लोगों के जोश को देखते हुए मैं भी उस दिन ऑफिस से जल्दी घर लौट आई करीब साढ़े तीन बजे। ऑफिस से निकलने तक सहवाग आउट हो चुके थे। टालीगंज मेट्रो स्टेशन से बाहर निकलते ही दूसरा विकेट चला गया और घर पहुंच कॉलिंग बेल बजाते-बजाते तीसरा विकेट गया। टी. वी. ऑन करते ही स्क्रीन हेड लाइन्स में देखा कि चौथा विकेट भी गया। मुझे समझ नहीं आया कि चौथा विकेट आया कब और गया कब। बाद में पता चला कि चौथा विकेट युवराज सिंह का था। दिल धड़क रहा था पर फिर भी मैच देखने का मोह नहीं छोड़ा क्योंकि मीडिया और जनता कह रही थी कि भारत जीतेगा ही। उस दिन स्थानीय प्रभात खबर के ज्योतिषी की भविष्य वाणी सही साबित हो गई कि सचिन शतक से चूकेंगे और युवराज भी कुछ ख़ास नहीं करेंगे लेकिन जीत भारत की ही होगी। इसलिए ज़रा बेधड़क होकर पूरा मैच देखा और हम जीत गए। इस तरह मैंने भी एक रिकॉर्ड बनाया अपने अब तक के जीवन में पहली बार पूरा मैच देखने का। पहली बार अपना सारा काम-काज छोड़ कर तन्मयता से मैच देखा। मै सोच रही थी कि लोग इतने घंटों तक बैठ कैसे लेते हैं और खिलाड़ी लगातर इतने घंटों तक खेल कैसे लेते हैं। मैं तो बैठे-बैठे थक गई।
सेमी फाइनल की सुबह अखबारों में कवरेज और जनता का जोश देखकर तय किया था कि मैं भी मैच देखूंगी, भारत-पाक का तो जरूर ही। ऑफिस में यू ही एक कलीग से पूछ लिया कि फाइनल किस दिन है। उन्होंने बताया  शनिवार को। शनिवार की सुबह मेरा एफ. एम. पर प्रोग्राम है, यह तो पता था और दो अप्रैल के हिसाब से तय किया था कि अजय देवगन पर प्रोग्राम करना है, उनका जन्म दिन जो है। लेकिन. जैसे ही पता चला कि उस दिन फाइनल है तो फटाफट तय किया कि मैं भी उस दिन क्रिकेट से संबंधित प्रोग्राम ही करूंगी क्योंकि सारे श्रोता तो आकर विश्व कप की ही बात करेंगे। ख़ैर, मैंने क्रिकेट से संबंधित तथ्य एकत्रित किए। सोचा गाने तो अजय देवगन पर ही बजाऊंगी बातें क्रिकेट की होंगी। साथ ही श्रोताओं से आग्रह किया कि फोन पर तथा एस.एम.एस, द्वारा बताएं कि टीम इंडिया के लिए वे क्या शुभ कामना संदेश देना चाहेंगे और रात को कैसे सेलिब्रेट करेंगे, साथ ही यह भी कि प्रोग्राम में बज रहे गीतों की खा़सियत भी बताएँ। ज्यादातर श्रोताओं ने कहा कि गाने कुमार शानू और अलका के बज रहे हैं। एक एस.एम.एस. सबसे पहले मिल गया था कि सारे गीत अजय देवगन की फिल्मों के हैं। मैंने श्रोताओं को बता दिया कि एस.एम.एस के ज़रिए मुझे गीतों की ख़ासियत का जवाब तो मिल गया है लेकिन जब तक मुझे फोन वाले श्रोता से जवाब नहीं मिल जाता तब तक मैं ज़ाहिर नहीं करूंगी। पैतालीस मिनटों में कुल पाँच गीत ही बजे और पौने दस बजे जहांगीर ज़रीवाला ने आकर कहा कि शायद आज अजय देवगन का जन्मदिन है, उन्हीं के गीत आप बजा रही हैं। तो मैंने सस्पेंस ख़त्म करते हुए अजय देवगन को जन्म दिन की मुबारकबाद दी और इसके बाद टीम इंडिया के लिए गीत बजाया  खेलेंगे हम जी जान से। हमारे श्रोताओं ने फोन और एस.एम.एस के ज़रिए टीम इंडिय़ा को अपने-अपने अंदाज़ में शुभ कामनाएं दीं। सभी का कहना था कि कप तो हम ही जीतेंगे। प्रोग्राम के अंत में मैंने टीम इंडिया को शुभ कामनाएं देते हुए कैलाश खेर का गीत बजाया - चक्क दे चक्क दे चक्क दे.....फट्टे !
सुबह सात बजे की निकली हुई दोपहर पौने एक बजे घर पहुंची। ज़रूरी काम निपटा कर मैच देखने की क़वायद शुरू की। इस बार डरते-डरते नहीं बल्कि आत्मविश्वास के साथ कि आज तो हम ही जीतेंगे। लगभग पौने नौ बजे भाई का फोन आया, तीन वर्षीया भतीजी कुहु बात कर रही थी। मैंने पूछा क्या कर रही हो ? उसने कहा  मैच देख रही हूँ।  मैने पूछा  जीतेंगे न ? उसने कहा  हाँ। भला उस बच्ची को इस उम्र में क्या पता कि मैच क्या होता है और जीतना क्या होता है। सुना कि वह तिरंगा थामे कहती फिर रही थी कि ये मेरा इंडिया है। वह फोन पर अपने मूड के अनुसार ही बात करती है और कभी-कभी तो बीच में छोड़ कर भाग जाती है कि नहीं, बात करना का मन नहीं है। शुक्र है कि उस दिन उसका मूड भी ठीक था और उसने काफ़ी बातें भी कीं। भाई को जब मैंने बताया कि मैंने पहली बार सेमीफाइनल वाले दिन पूरा मैच देखा तो उसने कहा  यह तो मुझे मालूम था कि तुम भारत-पाक  का मैच ज़रूर देखोगी। यही भाई जब मैच देख रहा होता था तो मुझे कहा करता था कि दीदी तुम उठ  कर चली जाओ प्लीज़, हम हारना नहीं चाहते। तुम्हारे मैच न देखने से कोई फ़र्क नहीं पडे़गा लेकिन मैं नहीं चाहता कि तुम देखो और हम हारें।  ख़ैर, मैच शुरू होते ही जब सहवाग चलते बने और उसके बाद सचिन भी तो दिल धड़कने लगा। और फिर जब सचिन के जाते ही गंभीर का आत्मविश्वास डगमगाता सा लग रहा था तो मेरी भी धड़कनें तेज़ हो रहीं थीं लेकिन साथ ही यह भी विश्वास था कि सारे देशवासी कह रहे है कि हम जीतेंगे।  इस दौरान जब भारत की फील्डिंग चल रही थी तो एक दोस्त का और फोन आया कि सुबह तो आपका शुभकामनाओं वाला प्रोग्राम सुना, अब बताईए क्या लग रहा है आपको कि क्या होगा ? मैंने कहा लगने-लगाने की बात छोड़िए, हम जीतेंगे ही, बस। और वही हुआ। इन दो दिनों में 30 मार्च को 3.30 ले 9.45 तक और कल 2.00 बजे से रात 11.45 तक टी.वी. को समय देने का कोई मलाल नहीं है। पहली बार मैंने इतने घंटों तक टी.वी. देखा। शुक्र है कि मेरा एफ. एम. का प्रोग्राम शाम की शिफ्ट में नहीं था वर्ना घर आते-आते ही पौने दस बजे जाते और मैच देखने की हसरत भी पूरी ही नहीं हो पाती।
28 बरसों बाद भारत का सपना साकार हुआ और विश्व कप जीतने वाली टीम का हिस्सा बनने का सचिन का भी ख़्वाब 22 बरसों बाद हक़ीकत में बदला।
रोचक बात तो यह है कि वर्तमान टीम के बहुत से खिलाड़ी तो तब पैदा भी नहीं हुए थे। कुछ खिलाड़ी तो मात्र 22 वर्ष के हैं और सचिन को खेलते हुए शानदार 22 वर्ष हो गए है। मुझे तो वर्तमान खिलाडियों में से कुछ की शक्ल भी पता नहीं थी और पीयूष चावला, अश्विन, मुनाफ पटेल वगैरह की तो अभी भी पहचान नहीं है, हाँ, नामों से ज़रूर जानती हूँ।

तो... हमारी टीम इंडियो को ढेर सारी बधाईयां, उसने साबित कर दिया कि.........सबसे आगे होंगे हिंदुस्तानी और सचमुच फट्टे चक्क दित्ते। खिलाड़ियों की इस सफलता पर देश गौरवान्वित है। तरह-तरह के पुरस्कारों से नवाज़ कर उनकी हौसला अफ़ज़ाई की जा रही है।



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बाद में जोड़ा गया - 

आज सुबह (4-4-2011)  ऑफिस जाते वक्त मेट्रों में अचानक ये वाक्या याद हो आया, वह भी आपसे शेयर करना चाहंगी।  

2009 में आयकर विभाग का प्रत्यत्र कर राष्ट्रीय आकादमी, नागपुर में सेमीनार था। पूरे देश भर के अधिकारी आए हुए थे। अकादमी में आई. आर. एस. अधिकारियों के प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चलते हैं। टी ब्रेक के दौरान मैं और विजयलक्ष्मी मैडम(मदुरई) ट्वायलेट से लौट रहे थे तो सामने वाले गलियारे से अधिकारियों के एक ग्रुप के साथ धोनी आते दिखे। विजयलक्ष्मी जी ने कहा  - धोनी। मेरी कोई प्रतिक्रिया न देख उन्होंने फिर कहा - यार... धोनी।  मैंने कहा - तो। तीसरी बार उन्होंने फिर कहा - अरे यार धोनी है। मैंने छूटते ही कहा, तो क्या हुआ, अमिताभ बच्चन होते तो कोई बात होती  देखते ही देखते वो कार में बैठकर चले गए। हम चाहते तो आराम से हाय-हलो तो कर ही सकते थे। मुझे हैरानी भी हुई कि पत्रकारिता तथा मीडिया से जुड़ाव के वावजूद धोनी को देख कर मेरे मन में कोई हलचल क्यों नहीं हुई। धोनी  प्रशिक्षणाधीन नए आई. आर. एस अघिकारियों के सत्र में विशिष्ट फैकल्टी के तौर पर आमंत्रित थे और अपना सत्र ख़त्म कर वापस जा रहे थे। 

आज शाम  घर लौटते ही पहले विजयलक्ष्मी जी को फोन लगाया।  काफ़ी अरसे बाद उनसे बात हुई। फोन उठाते ही मैंने उनसे पूछा - पहचान रही हैं। जवाब में उन्होंने कहा - थोड़ी सी बात और कीजिए। मैंने कहा - यार धोनी है। सुनते ही वे हंस पड़ीं और कहा - हाँ मैडम बताईए कैसी हैं आप।  तो मैंने उन्हें विश्व कप की बधाई दी। उन्होंने फिर कहा- उस दिन धोनी का ऑटोग्राफ नहीं लिया। मैंने कहा - अगर आपने ऐसा कहा होता तो मैं ज़रूर धोनी को रोक कर बात करती और आपको ऑटोग्राफ दिलवा देती। उन्होंने कहा - मैं क्रिकेट के लिए बहुत क्रेजी हूं। साथ ही यह भी कहा कि चलिए इसी बहाने आपने मुझे याद किया, अच्छा लगा। जवाब में मैंने कहा कि हाः अब अगर इस तरह धोनी इतने पास से गुजरें तो मैं ज़रूर नॉक करके विश करूंगी। 

एक बात और..... उस वक्त भले ही मैंने उनसे ये कहा हो कि अमिताभ बच्चन होते तो कोई बात होती।  खैर अमित जी तो अमित जी हैं, उनके सामने धोनी तो शिशु हैं। लेकिन, कल मेरे दिमाग़ में एक सवाल कुलबुलाया कि फिल्मी कलाकारों और क्रिकेटरों में बड़ा कौन है ?  हलाँकि दोनों अलग-अलग फील्ड है। मैंने सोचा कि फ़िल्मी कलाकार दर्शकों के मनोरंजन के लिए काम करते हैं। उनके पास बेशक अदाकारी की कला है। परंतु है तो ऐक्टिंग ही  वह भी कभी बंद कमरों में तो कभी सिर्फ यूनिट के सौ-पचास या दो सौ लोगों के समक्ष। क्रिकेटर तो ऐक्टिंग नहीं हक़ीकत में लाइव परफॉर्म करते हैं वह भी इतनी बड़ी तादाद में उपस्थित दर्शकों के सामने जहाँ कोई रीटेक नहीं होता। आप अच्छा परफॉर्म करते हैं तो भारतीय जनता सर-आँखों पर बिठाती है और असफल रहते हैं तो जनता अर्श से फ़र्श पर उतारने में भी वैसी ही दरियादिली दिखाती है। क्रिकेटरों की परफॉर्मेंस कठिन काम है, रीटेक या रीशूट नहीं चलता। इसका अहसास मुझे अब हुआ ((फ़िल्मी कलाकारों के प्रति पूरी निष्ठा  रखते हुए) 


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2 टिप्‍पणियां:

  1. शुद्ध अभिव्यक्ति....मन की बात....सहज भाव से रख दी आपने...अच्छा लगा...आपको भी और भारतीय क्रिकेट टीम को भी ....शुभकामनाएं।

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  2. बहुत-बहुत आभार राजेश जी। आपने वक्त निकाल कर इसे सिर्फ़ पढ़ा ही नहीं बल्कि अपनी मूल्यवान टिप्पणी से मेरा उत्साहवर्धन भी किया ।

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