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20 अक्तूबर 2009


तेरी मेरी उसकी बात - 5



संसद से चलकर जूतियां........


पिछले चालीस वर्षों में
कई बार हुआ है
यह सब-
संसद में चलकर जूतियां-
जब-
सचिवालय में घुसकर
कार्यालय में टूटी थीं
तो ताली पीटी थी
- लोगों ने।
कुछ ने यह समझा
कि - शायद
खेल शुरू होगा अब
और कुछ ने – कि
खेल ख़त्म हो गया
था अब।

और मैं जिसने कि
- तय किया था
यह सफ़र -
दफ़्तर से सचिवालय
और फिर-
संसद तक का।

और लौटा था
कुछ शॉर्ट कट से
- इस सड़क तक
- लोगों के हजूम में
पिछली बार भी
जब -
संसद से चलकर
जूतियां.......


मुस्करा दिया था
या कि ठहाका लगाकर
- हंसा भी था –
उन सब की नज़र बचा कर
शायद इसलिए कि
रंग में भंग पड़ता देख
पूछ न बैठें-
भई, यह क्या ?

पर मैं सहम गया था -
फ़िर अचानक-
सोचकर- यह जो भी जानता था
उन्हीं की चमड़ी से खिंचीं
यही जूतियां- जब बरसेंगी
इन सब के सिरों पर
और बनेंगी-
फांसी का फंदा-
तो फ़िर - एक बार
- एक और व्यक्ति- मुझसा-
पहुंचेगा- उसी राह से
- कार्यालय, सचिवालय
- और संसद तक
तो पीटेंगे लोग
तालियां !
पीटेंगे लोग
तालियां !



- के. प्रमोद

1 टिप्पणी:

  1. इसमें एक सशक्त हास्य-व्यंग्य के अनेक लक्षण मौज़ूद हैं।

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