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07 मई 2011

प्रेम धवन को याद करते हुए.....





अब तो सोने दे ऐ दिल घड़ी दो घड़ी
देख तारों को भी नींद आने लगी।


आज ही के दिन 2001 में हृदयाघात से गीतकार, संगीतकार, नर्तक, नृत्य निर्देशक पद्मश्री प्रेम धवन का मुंबई के जसलोक अस्पताल में 77 वर्ष की आयू में निधन हो गया था।

13 जून 1924 को हरियाणा में जन्में प्रेम धवन लाहौर से स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद बंबई की प्रसिद्ध संस्था इप्टा से जुड़ गए।

1946 में इप्टा द्वारा ही निर्मित और के. ओ. अब्बास निर्देशित हिन्दी फ़िल्म धरती के लाल से बतौर गीतकार प्रेम धवन ने फ़िल्म क्षेत्र में पदार्पण किया। गीत के बोल थे सुनो मनुवा नैया ये। इसी फ़िल्म के लिए लिखे उनके अन्य चार गीत थे जय धरती मैया/केकरा केकरा नाम बताव/ आज सूखे खेतों में/ बढ़ता जा।

इसके बाद बॉम्बे टॉकीज़ में प्रवेश करते हुए 1948 में फ़िल्म ज़िद्दी के लिए कई गीत लिखे, जिसमें लता मंगेशकर का गाया गीत जादू कर गए किसी के नैना बहुत हिट हुआ। फिर 1951 में फ़िल्म तराना के लिए लिखा उनका गीत सीने में सुलगते है अरमां बेहद हिट रहा।

बचपन में हफ़ीज़ और वारिस शाह जैसे लेखकों के लेखन और माँ द्वारा गाए जाने वाले भजनों और दोहों ने उनके जीवन का रुख गीतकार, संगीतकार, कोरियोग्राफी के करियर की तरफ मोड़ा।

प्रेम धवन के पिता लाहौर जेल के वॉर्डन थे, वहाँ प्रेम धवन को स्वतंत्रता सेनानियों को क़रीब से देखने का मौका मिला।सय्याद मुतालवी और शहीद भगत सिंह के बाई कुलबीर सिंह जैसे सेनानियों ने उनके मन में देश प्रेम का वीजवपन किया और उसे मजबूती प्रदान की। अगर आप गौर करें तो पाएंगे कि देशप्रेम पर लिखे उनके गीत ज़्यादा लोकप्रिय हुए ।

उन्होंने प. रविशंकर से संगीत और उदय शंकर ट्रुप से नृत्य की तालीम ली। शहीद, पवित्र पापी जैसी फिल्मों का संगीत निर्देशन भी किया।  फ़िल्म नया दौर के गीत उड़ें जब जब ज़ुल्फें तेरी और विमल राय की दो बीघा ज़मीन में हरियाल सावन ढोल बजाता आया गीतों में उनकी कोरियोग्राफी काबिल-ए-तारीफ़ है।

बकौल शायर सरदार अली जाफ़री  - प्रेम धवन के गीतों और नज़्मों में देश की माटी की सुगंध और ध्वनि देखते ही बनती है।

 बकौल प्रेम धवन फ़िल्मों में मेरे देशभक्ति के गीत ज़्यादा मशहूर हुए हैं, इसलिए ज़्यादातर लोग मुझे इन्क़लाबी और तरक्कीपसंद शायर के रूप में ही जानते हैं लेकिन मैंने हर तरह के गीत लिखे हैं।
बतौर गीतकार, संगीतकार, कोरियोग्राफर उन्होंने 55 वर्षों का सफ़र तय किया। वे अपने गीतों, ग़ज़लों और नज़्मों का संग्रह दिलों के रिश्ते प्रकाशित करवाना चाहते थे परंतु उनकी इस ख्वाहिश को उनके निधन के उपरांत उनकी पत्नी उमा प्रेम धवन ने प्रकाशित करवा कर पाठकों तक पहुँचाया। उनकी नज़्मों की बानगी देखें -

(1)   

दिलों के रिश्ते बहुत ही अजीब होते हैं
जो दूर हो वही अक्सर करीब होते हैं
मिले कई हसीं सनम मगर तेरी कमी रही
तेरे ही रुख ये आज तक नज़र मेरी जमी रही।


(2)

 ज़िंदगी जब समझ में कुछ आने लगी
ज़िंदगी छोड़कर हमको जाने लगी
जब किनारा नहीं तो भंवर ही सही
अपनी कश्ती कहीं तो ठिकाने लगी
बुझ गए रास्ते के सभी जब दीये
रौशनी दिल की रास्ता दिखाने लगी
चटकी है बाग में कोई ताज़ा कली
आज सारी फिज़ा मुस्कुराने लगी
कूकी कोयल तो फिर याद आई तेरी
इक घटा गम की फिर दिल पर छाने लगी
ख़ैर हो ऐ खुदाया के इस उम्र में
एक कमसिन नज़र दिल लुभाने लगी
अब तो सोने दे ऐ दिल घड़ी दो घड़ी
देख तारों को भी नींद आने लगी।


प्रस्तुति - नीलम अंशु

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपने वक्त निकाला और हौंसला-अफ़ज़ाई के लिए आभार !

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  2. इतनी सुंदर गज़ल पढ़वाने के लिए शुक्रिया। बहुत ही अच्छी पोस्ट नीलम जी।

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति..

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