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14 सितंबर 2010

हिन्दी दिवस




हर हिन्दुस्तानी और हिन्दी प्रेमी को हिन्दी प्रेमी को
हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं !



दृश्य  ए


सुबह-सुबह सवा सात बजे कुहु का फोन आया -  बुआ, जै माता दी (वैसे पहले वह जै माता दी ही कहा करती थी और इधर कुछ दिनों से अपने मम्मी-पापा की देखादेखी पैरीपैणा कहना शुरू कर दिया था)  मैं अज्ज स्कूल जा रहीं आं, खाणा लैके। मैंने पूछा, खाणे विच्च की लै के जा रही एं। उसने शायद राईस कहा। (वह इतनी तीव्र गति से बोलती है कि अभी भी उसका स्वर स्पष्ट समझ में नहीं आता)। फिर, कहा, मेरी बस्स आ गई। मैंने कहा, ठीक है, स्कूलों मुड़ के आ के गल्ल करीं। तो यह थी कुहु की आज हिन्दी दिवस के दिन स्कूली जीवन के पहले दिन की शुरूआत। बच्चों में स्कूल जाने का कितना उत्साह है। वैसे पहले के ज़माने में हम बच्चों को रोते हुए ही स्कूल जाते और लौटते देखते थे।
 आकाशवाणी पर बजने वाला एक विज्ञापन मुझे बहुत ही अच्छा लगता है -  


सुबह सुबह जब चिड़िया जगतीं,
मेरी मां भी मुझे उठाती,
अभी न उठने को मन करता,
थोड़ा सोने को जी करता।
तब मां मुझे गोद उठाती,
प्यार से मुझे वो समझाती,
पढ़-लिख कर जग में छा जाओ
उठो चलो तुम स्कूल जाओ।
सौ बातों में बात सही है,
स्कूल की ही राह सही है
उठो चलो तुम स्कूल जाओ।


कुहु के स्कूल जाने का मतलब है अनायास ही हिन्दी भी सीख लेना। मैंने भाई से कहा था कि उससे पंजाबी में ही बात किया करो, हिन्दी तो स्कूल जाकर भी सीख लेगी। अपनी ज़बान तो घर से ही सीखेगी। मुझे नहीं याद आता कि हमने हिन्दी और बांगला कैसी सीखी।  
  
कुहु के पापा का जन्म बंगाल में ही हुआ था लेकिन जब वह डेढ़-दो साल का था तब हम पंजाब चले गए थे और वापिस जब प. बंगाल आए तो वह चौथी में पढ़ता था। पढ़ता मॉडल स्कूल में था हिन्दी, अंग्रेजी सब। लेकिन वहां स्कूल में पंजाबी ही बोली जाती थी। परिणाम- स्वरूप उसे हिन्दी में बात करने का अभ्यास नहीं था। जब चौथी में वह वापिस बंगाल आया तो हमारे डैडी के कुलीग्ज़ कहते, अरे पंडित जी आपके बड़े बच्चे तो ठीक हैं, पर छोटे बेटे के साथ तो बात भी नहीं हो पाती। वह हिन्दी बोलता ही नहीं। कमाल है हिन्दी पढ़ता है, लिखता है लेकिन बोलता क्यों नहीं। खै़र धीरे-धीरे उसे फिर से हिन्दी और बांगला बोलने का अभ्यास हो गया।



दृश्य दो

बंगाल में हिन्दुस्तानी का अर्थ हिन्दी भाषी से लिया जाता है। अच्छे-खासे शिक्षित व्यक्ति भी इस शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में करते हैं। मेरे पड़ोस में रहता है नन्हा रिक, उम्र होगी लगभग दस वर्ष की। जब वह छोटा था और स्कूल नहीं जाया करता था, तब मेरे पास अक्सर आ जाया करता था। घर वाले कहते कि तुम पिशीमोनी (बुआ) को तंग करोगे, लेकिन वह ज़िद करके आ जाता। मैं कंप्यूटर पर काम करती और उसके लिए गाने चला देती, वह बैठकर सुनता। उनके घर में उन दिनों हिन्दी का माहौल न के बराबर ही था। फिल्म बंटी और बबली का गीत धड़क धड़क धुआं उड़ाए रे, सीटी बजाए रे उसे बहुत पसंद था। पहली बार गीत सुनकर उसने कहा, पिशीमोनी इसमें रेल चल रही है। मैंने चौंककर पूछा - कहां ? उसने कहा, कंप्यूटर के भीतर। मुझे हैरानी हुई कि उसे हिन्दी नहीं आती लेकिन उसने संगीत से समझ लिया कि रेल चलने की बात हो रही है। वह जब भी आता कहता, वो धड़क धड़क वाला गाना बजाओ। कभी-कभी कहता रेडियो पर भी बजाना हां। मैंने वह गीत उसे कॉपी करके सीडी में डाल कर दे दिया। फिर उसने स्कूल में दाखिला लिया। दूसरी कक्षा से उसके स्कूल में हिन्दी एक विषय के रूप में थी। मैंने देखा कि पहले वह हिन्दी में सवाल पूछने पर समझ लिया करता था और जवाब बांगला मे देता था। स्कूल में हिन्दी पढ़ना सीखने के बाद वह हिन्दी में जवाब भी देने लगा। और कहता है कि मेरी माँ को हिन्दी नहीं आती, मेरी मां मुझसे सीखती है।(उसकी मां अध्यापिका हैं लेकिन स्कूल में कभी हिन्दी नहीं पढ़ी)।

एक दिन मै उसके घर गई तो वह हिन्दी किताब का वर्णक्रम वाला पेज खोले बैठा था। मैंने पूछा, क्या कर रहे हो? उसने कहा अल्फाबेट पढ़ रहा हूँ हिन्दी का। मुझे बच्चों से मस्ती करने में मज़ा आता है, मैंने पूछा वह क्या होता है। उसने कहा, अरे राम यह भी नही जानती। मैंने कहा कि हमें तो स्कूल में नहीं पढ़ाया गया। उसने झट से कहा, ऐसा कैसे हो सकता है, तुम तो इतनी बड़ी हो। मैंने कहा, भई हमारे स्कूल में नहीं पढ़ाया। फिर उसने कहा, लेकिन तुम तो हिन्दुस्तानी हो। मैंने कहा, तुम भी तो हिन्दुस्तानी हो। तब पास बैठी उसका माँ और दादी कहने लगी, ऐसा नहीं कहते। सोचने वाली बात यह है कि उसने यह शब्दावली सीखी कहाँ से? खैर, दरअसल वह कहना चाहता था कि तुम तो हिन्दी में पारंगत हो, हिन्दी में पढ़ाई-लिखाई की है लेकिन उसने भी स्थानीय चलन के हिसाब से हिन्दुस्तानी शब्द का प्रयोग किया। अब वे दोनों भाई हिन्दी पढ़ और समझ लेते हैं तो मैं उन्के जन्मदिन के उपहार के तौर पर उन्हें हिन्दी की राईमस सीडी और कहानियों की किताबें देती हूँ, जिसे उनका परिवार बहुत पसंद करता है कि आप इनके काम की चीजें देती हैं। उन्होंने अभी से मेरे पास देख कर फादर कामिल बुल्के का अंग्रेजी-हिन्दी शब्दकोश और एक हिन्दी शब्दकोश भी खरीद लिया है बच्चों के लिए जो कि जिंदगी भर उनके लिए उपयोगी साबित होगा।


दृश्य तीन

मुझे जब भी कोई कविता, नज़म या ग़ज़ल अच्छी लग जाती है तो मैं उन्हें डायरी में नोट कर लेती हूँ। हिन्दी दिवस पर ऐंकरिंग के लिए कल रात डायरी के पन्ने टटोले तो इसी क्रम में  हमारे कलकत्ते के कवि, लेखक सेराज खान बातिश जी की यह ग़ज़ल दिख गई। हलांकि यह ग़ज़ल तब से डायरी में दर्ज़ है जब उनसे परिचय भी नहीं था। आईए आप सबकी नजर है वह ग़ज़ल


शहर के ग़ज़ालों में दिलबरी नहीं मिलती,
दोस्तों में रहकर भी दोस्ती नहीं मिलती।

चुप पड़े अंधेरे में गुम हुए हुनर कितने,
बिन किसी सहारे के नामवरी नहीं मिलती।

कितनी ख़ाक छानी हमने तब ये शेर आए हैं,
बस ग़ज़ल की कोशिश में शायरी नहीं मिलती।

प्यार चाहने वालो ज़िंदगी गंवाओं भी,
दो घड़ी की चाहत में उर्वशी नहीं मिलती।

तुम भरी जवानी में गो कलन्दरी ले लो,
पर जवान उम्रों में सादगी नहीं मिलती।

राम बनके आए हो तो वन गमन ज़रूरी है
रहके सिर्फ़ महलों में ईश्वरी नहीं मिलती।

उसने नागरी पढ़ कर कौन तीर मारा है,
कह दो उससे हिन्दी से अफसरी नहीं मिलती।

हां, हमारे हिस्से का दिन मिला मगर बातिश
काग़ज़ी चिरागों से रोशनी नहीं मिलती।

० ० ०


'उसने नागरी पढ़ कर कौन तीर मारा है, कह दो उससे हिन्दी से अफसरी नहीं मिलती।बातिश साहब की इन पंक्तियों से मैं सहमत नहीं हो पा रही। आज कल तो हिन्दी पढ़कर अफसरी मिल रही है भले ही वे हकीक़तन इस काबिल हों या न हों। भले ही उन्हें खुद को यह न पता हो कि तूफान आता है या आती है/पुरस्कार मिलता है या मिलती है/ ए. सी. चल रहा है या चल रही है/ सही उच्चारण, विभाग होगा या बिभाग, भाषा होगा या भासा, शहर या सहर। लेकिन साहब अफसरी तो ज़रूर मिल जाती है भले ही लोग डिजर्व करते हों या नहीं क्योंकि हिन्दी की योग्यता वाले कम मिलते हैं न सो अंधों में काना राजा। कई लोग मुझसे सहमत नहीं होंगे, लेकिन यह क़ोरी गप्प भी नहीं है आस-पास के अनुभव से यह जाना है।



ख़ैर, हिन्दी के चाहने वालों को पुन: हिन्दी दिवस की शुभ कामनाएं, लेकिन हिन्दी केवल हिन्दी दिवस तक ही सिमट कर न रह जाए, यह कोशिश भी हमारी ही होनी चाहिए।



- नीलम शर्मा अंशु

4 टिप्‍पणियां:

  1. हिन्दी दिवस की बहुत बहुत बधाई !

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  2. बात गहरी है और पोस्ट रोचक। फिर भी शिकायत है कि कुहू के चित्र बहुत छोटे हैं। उसकी बातों से अपने एक पंजाबी भतीजे का बचपना याद आ गया।

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  3. गान्धी जी ने हिन्दी भाषा के एक रूप को हिन्दुस्तानी कहा था, भारतीय संगीत की एक शाखा भी हिन्दुस्तानी कहलाती है, इसलिये भारत के भीतर भी हिन्दुस्तानी शब्द सहजता से हिन्दी/उर्दु/हिन्दुस्तानी भाषा, हिन्दी पट्टी या हिन्दी भाषी का मासूम प्रतीक हो सकता है।

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  4. जी शुक्रिया !

    1. चलिए, आपकी शिकायत दूर किए देते हैं,तस्वीरों को बड़ा कर देते हैं। लेकिन छोटी तस्वीरों में स्पष्टता ज़्यादा थी, शायद।

    कुहु का पहला दिन उसके लिए काफ़ी रोचक रहा। उसने स्कूल में बिलकुल किसी को तंग नहीं किया और सुस्सु तक घर पर आकर किया। और आज दूसरे दिन स्कूल जाते वक्त वह इतना उत्साहित थी कि उसे बस में चढ़कर पीछे मुड़कर मम्मी को बाय तक करना भी याद नहीं रहा या ज़रूरी नही लगा। ऐसा बताया गया।

    2. मैं इसे भाषा विशेष के साथ जोड़ कर नहीं देखती। मुझे अहिन्दी प्रदेश में पैदा होने और हिन्दी को अपना माध्यम बनाने पर फख्र है।

    आपकी बातों से सहमत हूं, लेकिन स्थानीय तौर पर इसे यहां दूसरे अर्थ में लिया जाता है।

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